दोस्ती हो तो ऐसी… 60 की उम्र पार, फिर भी फ्रेंडशिप बरकरार, जमशेदपुर के रो बाबू-श्रवण कुमार की कहानी दिल जीत लेगी

दोस्ती हो तो ऐसी… 60 की उम्र पार, फिर भी फ्रेंडशिप बरकरार, जमशेदपुर के रो बाबू-श्रवण कुमार की कहानी दिल जीत लेगी


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Jamshedpur Friendship story: जमशेदपुर में रो बाबू और श्रवण कुमार की 42 साल पुरानी दोस्ती मिसाल है. दोनों 18 साल की उम्र से मिट्टी के चूल्हे पर डोसा बेच रहे हैं, जो आज भी कोयले की आंच पर तैयार होता है. बीएसएनएल एक्सचेंज के पास शाम 6 बजे दुकान लग जाती है. यहां स्वाद के दीवानों की भीड़ लग जाती है.

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जमशेदपुर: अगर जमशेदपुर में दोस्ती की मिसाल की बात की जाए, तो रो बाबू और श्रवण कुमार का नाम जरूर याद आता है. इन दोनों की दोस्ती करीब 42 साल पुरानी है. जब दोनों की उम्र महज 18 साल थी, तब उन्होंने एक छोटे से ठेले पर डोसा बनाकर बेचने की शुरुआत की थी. आज दोनों की उम्र 60 साल से पार हो चुकी है, लेकिन न उनकी दोस्ती में कोई कमी आई है और न ही उनके डोसे के स्वाद में कोई बदलाव हुआ है. आज भी दोनों साथ मिलकर मिट्टी के चूल्हे पर डोसा बनाते हैं और लोगों को अपने हाथों का वही पुराना स्वाद परोसते हैं.

₹1 से शुरू हुआ था डोसे का सफर

रो बाबू बताते हैं कि जब उन्होंने शुरुआत की थी, तब एक डोसे की कीमत महज ₹1 हुआ करती थी. उस समय संसाधन भी सीमित थे, लेकिन मेहनत करने का जज्बा और दोस्ती का साथ हमेशा मजबूत रहा. धीरे-धीरे लोगों को उनके डोसे का स्वाद पसंद आने लगा और उनकी दुकान की पहचान बढ़ती गई. आज समय बदल चुका है और एक डोसे की कीमत ₹40 हो गई है, लेकिन उनके डोसे की लोकप्रियता अब भी बरकरार है. सबसे खास बात यह है कि इतने वर्षों में दोनों ने अपना पारंपरिक अंदाज भी नहीं बदला है.

कोयले की आंच पर तैयार होता है खास डोसा

इनके डोसे की सबसे बड़ी खासियत इसे बनाने का पारंपरिक तरीका है. आज जहां अधिकतर दुकानों में गैस पर डोसा तैयार किया जाता है. वहीं, रो बाबू और श्रवण कुमार आज भी कोयले की आंच और मिट्टी के चूल्हे का इस्तेमाल करते हैं. हल्का मसाला, स्वादिष्ट चटनी और कुरकुरा डोसा लोगों को खूब पसंद आता है. यही वजह है कि इनके यहां डोसा खाने के लिए दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं. कई लोगों के लिए यहां डोसा खाना सिर्फ स्वाद का अनुभव नहीं, बल्कि पुरानी यादों को फिर से जीने जैसा है.

दोस्ती ऐसी कि आज भी साथ कर रहे काम

रो बाबू और श्रवण कुमार की कहानी सिर्फ एक डोसे के ठेले की कहानी नहीं है, बल्कि वर्षों से कायम दोस्ती, भरोसे और मेहनत की मिसाल भी है. करीब चार दशक से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी दोनों एक-दूसरे के साथ खड़े हैं. उम्र बढ़ने के बावजूद दोनों रोजाना अपने काम पर पहुंचते हैं और मिलकर लोगों के लिए डोसा तैयार करते हैं. शहर में उनकी दोस्ती की चर्चा भी खूब होती है. दोनों ने साबित किया है कि सच्ची दोस्ती केवल साथ घूमने-फिरने तक सीमित नहीं होती, बल्कि जीवन के हर उतार-चढ़ाव में एक-दूसरे का साथ निभाने का नाम है.

शाम 6 बजे से लगती है दुकान

अगर आप भी जमशेदपुर में पुराने अंदाज का डोसा और मिट्टी के चूल्हे पर बने खाने का स्वाद चखना चाहते हैं, तो बीएसएनएल एक्सचेंज के समीप पहुंच सकते हैं. यहां शाम ठीक 6 बजे रो बाबू और श्रवण कुमार का ठेला लग जाता है. ठेला लगते ही ग्राहकों का आना शुरू हो जाता है. ₹40 में मिलने वाला इनका डोसा स्वाद के साथ-साथ दोस्ती और संघर्ष की एक खूबसूरत कहानी भी सुनाता है. चार दशक से ज्यादा पुराना यह सफर आज भी उसी अपनापन और मेहनत के साथ जारी है.



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