शहर से नौकरी छोड़ गांव लौटे बागेश्वर के गिरीश पांडे, पहाड़ी जायके से पेश की स्वरोजगार की मिसाल, अब दे रहे रोजगार

शहर से नौकरी छोड़ गांव लौटे बागेश्वर के गिरीश पांडे, पहाड़ी जायके से पेश की स्वरोजगार की मिसाल, अब दे रहे रोजगार


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Bageshwar News: महानगरों की चकाचौंध और 15 साल की नौकरी छोड़कर अगर कोई अपनी जड़ों की ओर लौटे, तो यह सिर्फ घर वापसी नहीं बल्कि एक नई शुरुआत होती है. बागेश्वर के छाती गांव निवासी गिरीश पांडे ने पहाड़ के पारंपरिक स्वाद को अपनी ताकत बनाकर न केवल स्वरोजगार की मिसाल कायम की है, बल्कि पलायन के दौर में स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए रास्ते भी खोले हैं.

बागेश्वर: जिले के छाती गांव निवासी गिरीश पांडे ने स्वरोजगार की अनोखी मिसाल पेश की है. महानगरों में करीब 15 साल तक काम करने के बाद उन्होंने अपने गांव लौटकर स्वरोजगार शुरू करने का फैसला लिया. पिछले 10 वर्षों से वह गांव में भोजनालय संचालित कर रहे हैं. यहां लोगों को कुमाऊं के पारंपरिक पहाड़ी व्यंजनों का स्वाद परोस रहे हैं, साथ ही वह अपने परिवार और स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के मौके दे रहे हैं.

गिरीश पांडे का मानना है कि पहाड़ों में रहकर भी मेहनत और लगन से रोजगार के मौके तैयार किए जा सकते हैं. इसी सोच के साथ उन्होंने शहरों की नौकरी छोड़कर अपने गांव में ही काम शुरू किया. उनके भोजनालय में कुमाऊं के पारंपरिक खानपान को महत्व दिया जाता है. यहां पहाड़ी भोजन पसंद करने वालों को स्थानीय स्वाद का अनुभव मिलता है. उनका प्रयास है कि पारंपरिक व्यंजनों को लोगों तक पहुंचाया जाए और गांव में रहकर ही आजीविका कमाई जाए.

80-100 रुपए में मिलती है थाली
गिरीश पांडे अपने भोजनालय में 80 और 100 रुपये की थाली उपलब्ध कराते हैं. 100 रुपये की थाली में रोटी, सब्जी, भांग की चटनी, सलाद, चावल, झोली, दाल और भट्ट के डुबके परोसे जाते हैं. पहाड़ के पारंपरिक भोजन को एक ही थाली में देने की यह पहल शानदार है. इससे स्थानीय खानपान को बढ़ावा देने के साथ लोगों को किफायती दर पर भोजन उपलब्ध कराने में मदद मिलती है.

पहाड़ी संस्कृति को सहेजने का प्रयास
कुमाऊं के खानपान में भांग की चटनी, झोली और भट्ट के डुबके जैसे खाने का खास महत्व है. ये व्यंजन पहाड़ की पारंपरिक पाक कला और स्थानीय खाद्य संस्कृति की पहचान हैं. ऐसे में गिरीश पांडे का भोजनालय केवल आजीविका का साधन ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय खानपान को जीवित रखने की एक छोटी लेकिन जरूरी कोशिश है. गिरीश पांडे के इस स्वरोजगार से उनका पूरा परिवार जुड़ा हुआ है. भोजनालय के संचालन में उनकी पत्नी और दोनों बच्चे भी सहयोग करते हैं. इसके अलावा उन्होंने दो स्थानीय लोगों को भी काम दिया है. इस तरह उनका व्यवसाय परिवार की आजीविका का आधार बनने के साथ दूसरे लोगों के लिए भी रोजगार का माध्यम बना है.

पलायन के दौर में ग्रामीण युवाओं के लिए बने प्रेरणा
पहाड़ी क्षेत्रों में रोजगार के सीमित अवसरों के कारण कई लोग गांव छोड़कर दूसरे शहरों में जाने को मजबूर हैं. ऐसे समय में गिरीश पांडे की पहल यह संदेश देती है कि स्थानीय संसाधनों, पारंपरिक खानपान और मेहनत के सहारे गांव में भी रोजगार खड़ा किया जा सकता है.



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