Best Goat Breeds For Bihar: बिहार में बकरी पालन किसानों और पशुपालकों के लिए कमाई का एक अच्छा जरिया बन सकता है. हालांकि, इस व्यवसाय में सफलता केवल बकरियों की संख्या बढ़ाने से नहीं, बल्कि सही नस्ल का चुनाव करने और उनके बेहतर प्रबंधन पर भी निर्भर करती है. अगर आप भी बकरी पालन शुरू करने की योजना बना रहे हैं, तो बिना जानकारी किसी भी नस्ल की बकरी खरीदने से बचें. बिहार पशु विज्ञान विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. दुष्यन्त यादव ने लोकल 18 के जरिए पशुपालकों को बताया कि राज्य की जलवायु और परिस्थितियों के अनुकूल नस्लों से शुरुआत करना ज्यादा फायदेमंद हो सकता है. उन्होंने ब्लैक बंगाल को सबसे बेस्ट ऑप्शन बताया. साथ ही, सिरोही जैसी नस्लों को भी अपनाने की बात कही.
ब्लैक बंगाल बकरी मांस उत्पादन के लिए बेहतर विकल्प
डॉ. दुष्यन्त यादव की मानें तो बिहार में बकरी पालन की शुरुआत करने वाले पशुपालकों के लिए ब्लैक बंगाल एक अच्छी नस्ल है. यह नस्ल बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल सहित पूर्वी भारत के क्षेत्रों में पाई जाती है. इसका शरीर छोटा होता है और रंग काला होता है. ब्लैक बंगाल बकरी की खासियत इसकी प्रजनन क्षमता और मांस की गुणवत्ता है. इस नस्ल की बकरियां एक बार में दो से तीन बच्चे दे सकती हैं. यही वजह है कि मांस उत्पादन के उद्देश्य से बकरी पालन करने वाले किसानों के लिए यह एक उपयोगी ऑप्शन हो सकती है.
दूध और मांस दोनों के लिए बीटल बकरी
अगर आप ऐसी बकरी पालना चाहते हैं जिससे दूध और मांस दोनों का लाभ मिल सके, तो बीटल नस्ल पर विचार कर सकते हैं. डॉ. दुष्यन्त यादव ने डबल प्रॉफिट वाली नस्ल बताया. इस नस्ल की बकरियां लंबी होती हैं और इनमें दूध उत्पादन के साथ मांस उत्पादन की भी क्षमता होती है. बीटल बकरी की देखभाल में उसके आवास पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है. यह नस्ल ऊंचाई पर चढ़ना पसंद करती है. इसलिए इसके रहने की जगह ऐसी होनी चाहिए, जहां सुरक्षित रूप से चढ़ने-उतरने और घूमने की सुविधा हो. इसके अलावा, ऊंचे प्लेटफॉर्म पर आवास तैयार करते समय फर्श को सूखा, साफ और फिसलन रहित रखना जरूरी है. इससे नमी और गंदगी से जुड़ी समस्याओं को कम करने में मदद मिल सकती है.
जमुनापारी बकरी के लिए जरूरी है बेहतर आवास प्रबंधन
दूध उत्पादन के उद्देश्य से जमुनापारी बकरी भी एक विकल्प है. उन्होंने बताया कि बिहार की गर्म और आर्द्र परिस्थितियों में इस नस्ल को पालते समय विशेष सावधानी बरतनी चाहिए. स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल आवास और उचित देखभाल के बिना इसके पालन में परेशानी हो सकती है. उन्होंने बताया कि बेहतर प्रबंधन के लिए बकरियों को ऊंचे और सूखे प्लेटफॉर्म पर रखा जा सकता है. जमुनापारी बकरी की दूध देने की क्षमता लगभग एक से दो लीटर प्रतिदिन हो सकती है.
सिरोही बकरी भी हो सकती है अच्छा विकल्प
बिहार पशु विज्ञान विश्वविद्यालय में पाली जा रही सिरोही नस्ल को भी डॉ. दुष्यन्त यादव ने राज्य के लिए बेस्ट विकल्पों में शामिल किया. इस नस्ल की बकरियों के शरीर पर सफेद और भूरे रंग के चकत्ते दिखाई देते हैं. नर का आकार मादा से बड़ा होता है. सिरोही बकरी का वजन ब्लैक बंगाल की तुलना में लगभग डेढ़ से दो गुना तक हो सकता है. मांस उत्पादन के उद्देश्य से बकरी पालन करने वाले किसान इस नस्ल पर भी विचार कर सकते हैं. लेकिन
बिहार के अनुकूल चुने नस्ल
उन्होंने यह भी कहा कि कुछ पशुपालक बोर नस्ल और तोतापरी नाम से पहचानी जाने वाली बकरियां भी पालते हैं. हालांकि, किसी भी नस्ल को चुनने से पहले यह देखना जरूरी है कि वह स्थानीय जलवायु में कितनी अच्छी तरह रह सकती है और उसके पालन पर कितना खर्च आएगा. किसी नस्ल की लोकप्रियता या सोशल मीडिया पर उसकी खूबियां देखकर ही बकरी खरीद लेना सही रणनीति नहीं है. पशुपालकों को नस्ल की उपलब्धता, आहार की जरूरत, रोगों के प्रति संवेदनशीलता, प्रजनन क्षमता और बाजार में मांग जैसे पहलुओं पर भी ध्यान देना चाहिए.
बकरी पालन शुरू करने वालों के लिए क्या है विशेषज्ञ की सलाह?
पशु एक्सपर्ट डॉ दुष्यन्त यादव ने पशुपालकों को सलाह दी कि वे शुरुआत में ऐसी नस्लों का चुनाव करें जिनके बारे में स्थानीय परिस्थितियों में पर्याप्त अनुभव और जानकारी उपलब्ध हो. बिहार में ब्लैक बंगाल और सिरोही जैसी नस्लों से शुरुआत करने पर विचार किया जा सकता है. इसके साथ ही, बकरियों के लिए साफ-सुथरा आवास, संतुलित आहार, स्वच्छ पानी, समय पर टीकाकरण, परजीवी नियंत्रण और नियमित स्वास्थ्य जांच की व्यवस्था जरूरी है.