कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर की गई टिप्पणी को लेकर विवादों में हैं. 25 अक्टूबर 2026 को पटना में पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह की 139वीं जयंती के कार्यक्रम में खड़गे भाषण दे रहे थे. इसी दौरान दर्शकों में मौजूद एक व्यक्ति ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी कहीं नहीं जाएंगे. इसके जवाब में खड़गे ने कहा, ‘मोदी का बाप भी जाएगा.’ इस टिप्पणी के बाद कार्यक्रम और राजनीतिक गलियारों में विवाद खड़ा हो गया. यह बयान ऐसे समय आया है, जब कांग्रेस चुनावी प्रक्रिया, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और कथित ‘वोट चोरी’ जैसे मुद्दों पर केंद्र सरकार तथा निर्वाचन आयोग को घेर रही है. खरगे ने पटना में भी इन्हीं मुद्दों पर हमला बोला और प्रधानमंत्री पर काले धन को वापस लाने के वादे को पूरा न करने का आरोप लगाया. लेकिन राजनीतिक बहस का केंद्र उनके आरोपों के बजाय उनकी भाषा बन गई.
सवाल यही है कि प्रधानमंत्री पर खरगे की बार-बार तीखी और व्यक्तिगत टिप्पणी के पीछे क्या राजनीतिक रणनीति है? क्या इससे कांग्रेस अपने समर्थकों में जोश भर पाती है, या फिर बीजेपी को कांग्रेस पर पलटवार करने का मौका मिल जाता है?
खड़गे ने कब-कब क्या कहा?
पटना की घटना में खड़गे की टिप्पणी एक श्रोता के बीच में बोलने के जवाब में आई. इसलिए इसे केवल पहले से तैयार राजनीतिक बयान मान लेना सही नहीं होगा. हालांकि, यह भी तथ्य है कि खरगे पहले भी प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी पर हमलावर टिप्पणियों को लेकर विवादों में रहे हैं. अप्रैल 2023 में कर्नाटक विधानसभा चुनाव के दौरान खरगे ने प्रधानमंत्री मोदी की तुलना ‘जहरीले सांप’ से की थी. गुजरात चुनाव 2022 के दौरान उन्होंने मोदी के बार-बार चुनाव प्रचार में शामिल होने पर ‘रावण के सौ सिर’ वाला तंज कसा था. अप्रैल 2026 में असम के चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी और आरएसएस की तुलना जहरीले सांप से करने वाला उनका बयान भी विवादों में आया.
कांग्रेस और बीजेपी आमने-सामने
इन घटनाओं से एक राजनीतिक पैटर्न जरूर दिखाई देता है. खड़गे सरकार और बीजेपी पर हमला करते समय कई बार ऐसी भाषा इस्तेमाल करते हैं, जो मूल राजनीतिक आरोप से ज्यादा चर्चा में आ जाती है. लेकिन केवल इन बयानों के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना मुश्किल है कि हर टिप्पणी किसी सुनियोजित रणनीति का हिस्सा होती है.
क्या उम्र और जाति का उठा रहे हैं फायदा?
खड़गे की राजनीति को समझने में उनकी उम्र, अनुभव और सामाजिक पृष्ठभूमि भी चर्चा का विषय बनती है. 84 वर्षीय खरगे कांग्रेस के वरिष्ठ दलित नेताओं में शामिल हैं और पार्टी अध्यक्ष के तौर पर विपक्ष की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. उनके समर्थक उनकी आक्रामक शैली को सत्ता से सीधे सवाल पूछने और वंचित वर्गों के मुद्दे उठाने के तरीके के रूप में देखते हैं. कांग्रेस की राजनीति में सामाजिक न्याय, संविधान और दलित अधिकारों पर जोर देने के लिए भी खरगे लगातार बीजेपी और आरएसएस की आलोचना करते रहे हैं.
कांग्रेस को फायदा कैसे हो सकता है?
मोदी सरकार के खिलाफ आक्रामक भाषा पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों को यह संदेश दे सकती है कि नेतृत्व सीधे मुकाबले के लिए तैयार है. विवादित बयान व्यापक कवरेज पाते हैं, जिससे पार्टी के नेता और उनका राजनीतिक संदेश सुर्खियों में आते हैं. अगर बयान के साथ चुनावी पारदर्शिता, सामाजिक न्याय या संविधान जैसे मुद्दे जुड़े हों, तो कांग्रेस उन्हें अपने व्यापक राजनीतिक अभियान का हिस्सा बना सकती है. खरगे के पटना वाले बयान में कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि पार्टी जिन मुद्दों को उठाना चाहती है, वे पीछे छूट सकते हैं. पहला, मतदाता सूची, चुनावी प्रक्रिया और काले धन जैसे मुद्दों पर चर्चा होने के बजाय बहस प्रधानमंत्री के परिवार को लेकर की गई टिप्पणी पर केंद्रित हो सकती है.
खरगे ने पटना में विवादित बयान दिया. (PTI)
खड़गे के बयान के बाद बीजेपी का कांग्रेस पर राजनीतिक मर्यादा तोड़ने का मुदद्दा फिर मिल गया है. पटना की टिप्पणी के बाद बीजेपी नेताओं ने खरगे की भाषा की आलोचना की और कांग्रेस से माफी की मांग की. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी कांग्रेस पर प्रधानमंत्री और उनके परिवार के खिलाफ अपमानजनक भाषा इस्तेमाल करने का आरोप लगाया.
कुलमिलाकर खड़गे के बयान कांग्रेस को सुर्खियों में जरूर ला सकते हैं, लेकिन सुर्खियां अपने आप में चुनावी फायदा नहीं होतीं. अगर विवाद के बाद भी पार्टी मतदाता सूची, रोजगार, महंगाई, सामाजिक न्याय और संविधान जैसे मुद्दों पर चर्चा बनाए रखती है, तो बयान का असर सीमित रह सकता है. लेकिन अगर बहस लगातार भाषा और व्यक्तिगत हमलों तक सिमट जाती है, तो कांग्रेस के लिए अपने मूल राजनीतिक संदेश को सामने रखना मुश्किल हो सकता है.