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SIM Binding : दूरसंचार विभाग ने अगले साल से सिम बाइंडिंग सिस्टम लागू करने का ऐलान किया है. विभाग का मानना है कि इसे भ्रामक सूचनाओं के प्रसार और ऑनलाइन ठगी पर रोक लगाने में मदद मिलेगी. सिम बाइंडिंग एक तरह की सुरक्षा व्यवस्था है, जिसमें सिम और मोबाइल के बीच संबंधों की पुष्टि की जाती है. इस व्यवस्था के लागू होने के बाद सिम निकालकर वॉट्सऐप या अन्य मैसेजिंग ऐप नहीं चलाया जा सकेगा.
दूरसंचार विभाग ने अगले साल से सिम बाइंडिंग सिस्टम लागू करने का ऐलान किया है.
नई दिल्ली. दूरसंचार विभाग ने सिम बाइडिंग (SIM Binding) का नियम लागू करने की बात कही है. जब से इसका खुलासा हुआ है, हर यूजर के मन में इसे लेकर तमाम सवाल उठ रहे हैं. हर कोई यह जानना चाहता है कि आखिर सिम बाइंडिंग होती क्या है और यह कैसे काम करती है. टेलीकॉम विभाग ने अगले साल 1 जनवरी से सिम बाइंडिंग नियम लागू करने का ऐलान किया है. इसका मकसद ऑनलाइन फ्रॉड और डिजिटल धोखाधड़ी पर रोक लगाना है.
सिम बाइंडिंग एक तरह की सुरक्षा व्यवस्था है. यह किसी ऐप या डिजिटल सर्विस को आपके मोबाइल की सिम और फोन के बीच पुष्टि करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. सिम बाइंडिंग यह सुनिश्चित करता है कि मोबाइल नंबर का इस्तेमाल करने वाला यूजर उसी डिवाइस पर सर्विस ले रहा है, जिस पर सिम को यूज करने के लिए नंबर वेरिफिकेशन कराया गया है. ऐसे समझें कि अगर आपके मोबाइल नंबर से वॉट्सऐप या अन्य कोई मैसेजिंग सर्विस जुड़ी है तो सिम बाइंडिंग यह जांचने में मदद कर सकती है कि संबंधित सिम उस फोन में मौजूद है या नहीं.
ओटीपी से अलग होता है सिम बाइंडिंग
वैसे तो वेरिफिकेशन के लिए ओटीपी का भी इस्तेमाल होता है, लेकिन सिम बाइंडिंग और ओटीपी दोनों अलग चीजें हैं. ओटीपी से संबंधित मोबाइल नंबर पर नियंत्रण की पुष्टि होती है, जबकि सिम बाइंडिंग में डिवाइस और सिम के बीच संबंध की जांच की जाती है. इसी जांच के लिए दूरसंचार विभाग ने पिछले साल 28 नवंबर को वॉट्सऐप, टेलीग्राम और सिगनल जैसे मैसेजिंग ऐप के लिए सिम बाइंडिंग लागू करने का निर्देश दिया था.
सिम बाइंडिंग से क्या फायदा
सिम बाइंडिंग तकनीक की मदद से साइबर ठगी पर नियंत्रण पाया जा सकेगा. हालांकि, सिम बाइंडिंग होने पर भी यूजर को अनजान लिंक, स्क्रीन शेयरिंग ऐप और संदिग्ध कॉल से सावधान रहना होगा. सिम बाइंडिंग का मुख्य उद्देश्य मोबाइल नंबर से जुड़े मैसेजिंग अकाउंट के दुरुपयोग को रोकना है. अभी मोबाइल में सिम डालकर वॉट्सऐप एक्टिवेट हो जाता है और बाद में सिम निकालने के बाद भी वॉट्सऐप चलता रहता है. ऐसा कई मामले में देखा गया है कि वॉट्सऐप समेत तमाम मैसेजिंग ऐप का इस्तेमाल बिना सिम के ही किया जा रहा है. ऐसे में किसी अपराध के बाद आरोपी की पहचान आसान नहीं रह जाती है.