पंचायत चुनाव: एक परिवार, दो सगी बहनें और सरपंच की एक कुर्सी, हनुमान बेनीवाल के गांव में दिलचस्प मुकाबला

पंचायत चुनाव: एक परिवार, दो सगी बहनें और सरपंच की एक कुर्सी, हनुमान बेनीवाल के गांव में दिलचस्प मुकाबला


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Nagaur Panchayat Chunv Two Sisters Contest: नागौर में पंचायत चुनाव 2026 के बीच सांसद हनुमान बेनीवाल के पैतृक गांव बरणगांव में सरपंच की कुर्सी को लेकर दिलचस्प मुकाबला छिड़ गया है. यहां सात महिला प्रत्याशी मैदान में हैं, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा दो सगी बहनों की हो रही है. खास बात यह है कि दोनों रिश्ते में हनुमान बेनीवाल की भाभियां हैं. उनके दिवंगत बड़े भाई रामप्रसाद बेनीवाल की पत्नी मीरा बेनीवाल और दूसरे बड़े भाई प्रेमसुख बेनीवाल की पत्नी राजबाला बेनीवाल आमने-सामने हैं. दोनों सगी बहनें हैं और सरपंच बनने के लिए चुनाव लड़ रही हैं. रामप्रसाद बेनीवाल करीब 25 साल पहले गांव के सरपंच रह चुके थे. बरणगांव और उससे जुड़े बूढ़ी व अर्जुनपुरा क्षेत्र में कुल 2970 मतदाता बताए जा रहे हैं. इस पारिवारिक मुकाबले ने गांव की राजनीति को चर्चा में ला दिया है. अब सबकी नजर मतदाताओं के फैसले और हनुमान बेनीवाल के रुख पर है.

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सांसद हनुमान बेनीवाल के पैतृक गांव बरणगांव में सरपंच की कुर्सी को लेकर दिलचस्प मुकाबला छिड़ गया है.

 नागौर. सांसद हनुमान बेनीवाल के पैतृक गांव में सरपंच की कुर्सी को लेकर ऐसा पारिवारिक मुकाबला छिड़ गया है, जिसने सबका ध्यान अपनी तरफ खींच लिया है. चुनावी मैदान में सात महिला प्रत्याशी हैं, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा दो चेहरों की हो रही है और वजह है इन दोनों का रिश्ता. जी हां, सरपंच बनने की रेस में आमने-सामने हैं दो सगी बहनें. जो रिश्ते में हनुमान बेनीवाल की भाभियां भी हैं. अब सवाल ये है कि गांव की जनता किसे चुनेगी और इस मुकाबले में परिवार के सियासी समीकरण क्या रंग दिखाएंगे?

कहानी नागौर के बरणगांव की है. वही बरणगांव, जिसे सांसद और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के सुप्रीमो हनुमान बेनीवाल का पैतृक गांव कहा जाता है. यहां सरपंच पद के लिए कुल सात महिला प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं. लेकिन इस चुनाव की सबसे दिलचस्प बात है एक ही परिवार की दो महिलाओं का आमने-सामने होना. हनुमान बेनीवाल के बड़े भाई स्व. रामप्रसाद बेनीवाल की पत्नी मीरा बेनीवाल चुनाव लड़ रही हैं, तो उनके दूसरे बड़े भाई प्रेमसुख बेनीवाल की पत्नी राजबाला बेनीवाल भी सरपंच पद की दावेदार हैं.  सबसे खास बात मीरा और राजबाला सगी बहनें हैं.

पंचायत चुनाव में दो बहनें आमने-समाने

एक तरफ बहन मीरा तो दूसरी तरफ बहन राजबाला हैं. दोनों के सामने एक ही लक्ष्य है गांव की सरपंच की कुर्सी हासिल करना. लेकिन ये मुकाबला सिर्फ दो प्रत्याशियों के बीच नहीं, बल्कि राजनीतिक विरासत और परिवार से जुड़े पुराने सियासी समीकरणों के कारण भी चर्चा में है. अब जरा इस चुनाव की विरासत भी समझिए. स्व. रामप्रसाद बेनीवाल गांव की राजनीति में लंबे समय तक सक्रिय रहे थे और करीब 25 साल पहले सरपंच भी रह चुके थे. अब उनकी पत्नी मीरा चुनाव मैदान में हैं. दूसरी तरफ राजबाला भी अपनी दावेदारी के साथ मतदाताओं के बीच हैं. ऐसे में गांव में चर्चा है कि इस बार जनता पुराने राजनीतिक अनुभव, स्थानीय मुद्दों और विकास के वादों में से किसे ज्यादा अहमियत देती है.

मुकाबला सिर्फ दो बहनों के बीच नहीं बल्कि सात उम्मीदवारों के बीच है

इस चुनाव के आंकड़े भी दिलचस्प हैं. बरणगांव और उससे जुड़े बूढ़ी व अर्जुनपुरा क्षेत्र के बताए गए आंकड़ों के मुताबिक, यहां कुल 2,970 मतदाता हैं. सरपंच पद के लिए सात महिला प्रत्याशी मैदान में हैं. यानी मुकाबला सिर्फ दो बहनों के बीच नहीं बल्कि सात उम्मीदवारों के बीच है. हर प्रत्याशी को मतदाताओं का भरोसा जीतना होगा और गांव की समस्याओं के समाधान का भरोसा भी देना होगा. लेकिन बरणगांव की इस चुनावी कहानी में एक और सियासी एंगल है. बेनीवाल परिवार के पुराने चुनावी मतभेद. पिछले विधानसभा चुनाव में मीरा बेनीवाल की बेटी डॉ. अनीता बेनीवाल भी हनुमान बेनीवाल के सामने चुनाव मैदान में उतरी थीं. वहीं, हनुमान बेनीवाल की पत्नी कनिका बेनीवाल खींवसर विधानसभा उपचुनाव में चुनाव हार गई थीं. इन पुराने चुनावी घटनाक्रमों के बीच अब गांव का सरपंच चुनाव फिर से परिवार से जुड़े राजनीतिक समीकरणों को चर्चा में ले आया है.

हनुमान बेनीवाल के रूख पर टिकी सबकी नजरें

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि हनुमान बेनीवाल का रुख क्या रहेगा? क्या वे किसी प्रत्याशी के समर्थन में सामने आएंगे, या इस मुकाबले से दूरी बनाए रखेंगे? फिलहाल उनके समर्थन को लेकर किसी स्पष्ट रुख की पुष्टि नहीं है. इसलिए सबकी नजर इस बात पर भी रहेगी कि चुनाव के दौरान उनकी भूमिका क्या रहती है. फिलहाल बरणगांव में मुकाबला सात महिला प्रत्याशियों के बीच है, लेकिन सुर्खियों में दो सगी बहनें हैं. एक ही परिवार, एक ही गांव और सरपंच की एक कुर्सी. अब फैसला मतदाताओं के हाथ में है. देखना होगा कि बरणगांव की जनता किसे अपना सरपंच चुनती है और क्या इस चुनाव का असर बेनीवाल परिवार के सियासी समीकरणों पर भी पड़ता है?



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