सुल्तानपुर: दुर्गा पूजा की पहचान अब देश ही नहीं, बल्कि विदेशों तक पहुंचने की तैयारी में है. यहां की अनोखी परंपराएं, भव्य पंडाल और मां दुर्गा के प्रति लोगों की अटूट आस्था हर किसी को आकर्षित करती है. इसी खासियत ने सात समंदर पार फिजी से आए एक युवक को भी सुल्तानपुर खींच लिया. आखिर फिजी से हजारों किलोमीटर का सफर तय कर यह युवक सुल्तानपुर क्यों पहुंचा? यहां की दुर्गा पूजा में ऐसा क्या खास है, जिसने उसे इतना प्रभावित किया?
फिजी से सुल्तानपुर पहुंचे कौशिक तरुण कुमार
सुल्तानपुर की सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक परंपराएं अब विदेशों में भी लोगों को आकर्षित कर रही हैं. इसकी मिसाल फिजी के रहने वाले कौशिक तरुण कुमार हैं, जो इन दिनों सुल्तानपुर में रहकर भारतीय संस्कृति और परंपराओं को करीब से समझ रहे हैं. कौशिक तरुण यहां प्रसिद्ध संगीतज्ञ राकेश्वर मालवीय से संगीत की शिक्षा ले रहे हैं. संगीत सीखने के साथ ही उनकी दिलचस्पी सुल्तानपुर की ऐतिहासिक दुर्गा पूजा में भी बढ़ी है. यही वजह है कि वे यहां की पूजा पद्धति, परंपराओं और सांस्कृतिक आयोजनों को सीखने में जुटे हैं.
चार पीढ़ी पहले भारत से फिजी पहुंचे थे पूर्वज
कौशिक तरुण कुमार का भारत से रिश्ता केवल संगीत और संस्कृति तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके परिवार का इतिहास भी भारत से जुड़ा हुआ है. उनके मुताबिक, उनके पूर्वज करीब चार पीढ़ी पहले भारत में रहते थे. ब्रिटिश हुकूमत के दौर में उनके पूर्वजों को मजदूरी कराने के उद्देश्य से फिजी ले जाया गया था. इसके बाद उनका परिवार वहीं बस गया. आज कौशिक तरुण का परिवार फिजी के लम्बासा द्वीप पर रहता है. भले ही उनकी कई पीढ़ियां विदेश में गुजर गईं, लेकिन भारतीय संस्कृति, परंपराओं और जड़ों से जुड़ने की उनकी चाह उन्हें सुल्तानपुर तक ले आई.
दुर्गा पूजा के साथ रामलीला और कर्मकांड की ले रहे शिक्षा
कौशिक कुमार सुल्तानपुर में केवल संगीत ही नहीं सीख रहे, बल्कि यहां की विशिष्ट धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को भी समझ रहे हैं. वे सुल्तानपुर दुर्गा पूजा महोत्सव की बारीकियों को सीख रहे हैं. इसके साथ ही रामलीला मंचन और विभिन्न धार्मिक कर्मकांडों की शिक्षा भी ले रहे हैं. सुल्तानपुर की दुर्गा पूजा में वर्षों से चली आ रही परंपराएं, पूजा की विधियां और सामूहिक भागीदारी उनके लिए खास आकर्षण हैं. इन परंपराओं को सीखकर वे भारतीय संस्कृति की उस विरासत को समझना चाहते हैं, जो पीढ़ियों से लोगों को अपनी जड़ों से जोड़े हुए है.
आयुर्वेद की शिक्षा लेकर भी संस्कृति से जुड़ रहे कौशिक
कौशिक कुमार की रुचि केवल संगीत और धार्मिकपरंपराओं तक सीमित नहीं है. वे सुल्तानपुर में चिकित्सक विवेक कुमार श्रीवास्तव से आयुर्वेद की शिक्षा भी ले रहे हैं. इस तरह वे भारतीय ज्ञान परंपरा के अलग-अलग पहलुओं को करीब से जानने का प्रयास कर रहे हैं. संगीत, रामलीला, कर्मकांड और आयुर्वेद की शिक्षा के जरिए कौशिक भारतीय संस्कृति को अपने जीवन में उतार रहे हैं. फिजी से सुल्तानपुर तक उनका यह सफर इस बात की मिसाल है कि संस्कृति और परंपराओं का रिश्ता भौगोलिक सीमाओं से कहीं बड़ा होता है. सुल्तानपुर की दुर्गा पूजा उनके लिए केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि अपनी ऐतिहासिक जड़ों और भारतीय विरासत को समझने का माध्यम भी बन रही है.