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Visually Impaired Wakeel Khan: छतरपुर के रहने वाले वकील खान को आंखों से स्पष्ट दिखाई नहीं देता, जिसके चलते उनकी पढ़ाई छूट गई थी. हालांकि संगीत से लगाव होने के कारण उन्होंने इसे अपना सहारा बनाया और अब वे दिव्यांग संस्था में बच्चों को संगीत सिखा रहे हैं.
Visually Impaired Wakeel Khan: मप्र के छतरपुर के वकील खान जिन्हें आंखों से दिखाई नहीं देता. दरअसल, छतरपुर के वकील खान जो बचपन से ढोलक बजाना सीख गए थे. संगीत से लगाव था तो ग़ज़ल, कब्बाली और फिल्मी गीत गाते थे. धीरे-धीरे तबला और ढोलक बजाना सीख गए. फिलहाल, वह प्रगतिशील दिव्यांग संस्था में नौकरी करते हैं जहां दिव्यांग बच्चों को ढोलक बजाना सिखाते हैं.
वकील खान बताते हैं कि उन्हें बचपन से ही संगीत से लगाव हो गया था. बचपन में ही ग़ज़ल, कब्बाली और फिल्मी गीत अपने तरीके से गाता रहा. रेडियो में सुनता था. उसी को याद करता फिर गाता. धीरे-धीरे शौक़ बढ़ा तो तबला बजाना सीख लिया. तबला से लगा कि ढोलक सीखना चाहिए फिर ढोलक बजाने लगे. कब्बाली कार्यक्रम में ढोलक बजाने जाने लगा. आज भी कब्बाली लाइन में ढोलक बजाते हैं. इसी से खर्च भी चलता है. ढोलक बजाना मम्मी से ही सीखा था. वह महिलाओं के कार्यक्रम में बजाया करती थीं. उन्हें ही देखकर मैं भी बजाने लगा था.
वकील बताते हैं कि उन्हें पढ़ाई भी आगे करनी थी लेकिन बचपन से ही आंखों से 60 प्रतिशत दिखाई नहीं देता था. इसलिए मुश्किल से कक्षा 8वीं पास कर पाए थे. कक्षा 8वीं पास करने में सबसे बड़ा योगदान टीचर मैम का था.
आकाशवाणी में कर चुके कार्यक्रम
वकील बताते हैं उन्हें पढ़ाई में समझ आ गया था कि वह आगे नहीं पढ़ पाएंगे इसलिए संगीत को ही करियर बना लिया. जहां भी संगीत कार्यक्रम होते वहां कब्बाली, ग़ज़ल गाते और ढोलक भी बजाते. छतरपुर आकाशवाणी के युगवाणी कार्यक्रम में भी शिरकत कर चुका हूं. उस जमाने में 350 रुपए का चेक मिलता था. 3 माह में 1 प्रोगाम मिलता था.
दिव्यांग संस्था की शुरुआत
वकील बताते हैं कि साल 1987 में सिद्दिकी साहब के साथ छतरपुर में प्रगतिशील दिव्यांग संस्था की शुरुआत की थी. यहीं पर बच्चों को संगीत सिखाने लगे. हालांकि, बीच में दूसरी जगह जाकर संगीत कार्यक्रम करने लगा. इसके बाद साल 1999 से अभी तक इसी दिव्यांग संस्था से जुड़ा हूं. यहां चौकीदारी भी करता हूं. साथ ही बच्चों को संगीत में ढोलक बजाना सिखाता हूं. इस तरह मेरा जीवन संगीत को ही समर्पित रहा.