Pahari Korwa Family Demand: छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग मुख्यालय अंबिकापुर से 35 किलो की दूरी पर स्थित गंझेर बस्ती जहां एक ऐसा परिवार रहता है, जो राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र कहलाते है. पहाड़ी कोरवा परिवार जो 21वीं सदी में भी जुगाड वाले घर में जिंदगी गुजार रहे हैं. क्योंकि पढ़े-लिखे नहीं है, जागरूक नहीं, जिससे उनकी बातों को दरकिनार किया जाता हैं. जन्मन का लाभ नही मिल पाता. सरकार तो जन्मन योजना चला रही है, जिससे पहाड़ी कोरवा इलाके में सड़क, बिजली, पानी और मकान लोगों को मिल सके. लेकिन बिफन कोरवा आज भी जन मन आवास का इंतजार कर रहा है कि आखिर कब मिलेगा पक्का मकान. ग्राउंड जीरो पर देखा कि दीवाल के बीच मे छेद, छप्पर में भी छेद, यानी घर के चारो तरफ से भले ही घर को जुगाड लगाकर ढक दिया गया हो, लेकिन खतरा बना रहता है. क्यों जंगली इलाका है, तो जाहिर सी बात है कि जंगली जानवरों का डर साप बिच्छू का डर बना रहता है. सबसे बडी बात आज भी पहाड़ी कोरवा परिवार मिटी के चूल्हे में खाना बनाते हैं और जमीन पर बिस्तर बिछाकर सोते हैं. यहां तक कि गैस चूल्हा भी नसीब नही हो सका है. ऐसे में लाइट की समस्या बरसात में बनी रहती हैं. जिससे रातभर आग जला कर जागना करना पड़ता है. कोरवा युवक अपने बच्चों को तालीम देना तो चाहता है, लेकिन स्कूल की दूरी बच्चो को नागवार गुजरती हैं. बच्चे जाना पसंद नही करते हैं. यही वजह है कि बच्चे शिक्षा से वंचित हो रहे है. पिता बीफान कहते हैं कि भले हमने पढ़ाई नहीं की, लेकिन अगर बच्चे स्कूल कम से कम जाए तो कुछ शिक्षित जरूर होंगे. नौकरी मिले चाहे न मिले लेकिन जागरूक जरूर होंगे, देखिए ये रिपोर्ट हर एक तस्वीर में छुपा है जिंदगी का कठिन संघर्ष और दर्द…
लकड़ी और मिट्टी से बनाया जुगाड़ का मकान, 35 साल बाद भी पक्के घर का इंतजार
बिफान कोरवा ने लोकल 18 को बताया कि उन्होंने लकड़ी के छोटे-बड़े टुकड़ों को काटकर और मिट्टी से छबाई करके अपना मकान बनाया था. इसी जुगाड़ के घर में उनका जीवन गुजर रहा है. परिवार के सदस्य इसी मकान में किसी तरह छत के नीचे दिन काट रहे हैं. बिफान के अनुसार, इस घर को बनाए हुए करीब 30 से 35 साल हो चुके हैं, लेकिन आज तक उन्हें पक्का मकान नसीब नहीं हुआ. उनका कहना है कि सरकार की योजनाओं का लाभ दूसरे लोगों को मिल रहा है, लेकिन उनका परिवार अब भी सुविधाओं से वंचित है.
पहाड़ी कोरवा परिवार को जनमन आवास का लाभ नहीं मिलने का दावा
बिफान कोरवा का कहना है कि वे पहाड़ी कोरवा समुदाय से आते हैं, जिसे विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह में शामिल किया गया है. इसके बावजूद उनके परिवार को अब तक जनमन आवास योजना का लाभ नहीं मिला है. उन्होंने बताया कि जिम्मेदार लोगों से कई बार उम्मीद जताई गई कि उन्हें आवास मिलेगा, लेकिन लंबे समय बाद भी उनका इंतजार खत्म नहीं हुआ. परिवार की मांग है कि उनकी स्थिति की जांच कराकर उन्हें सरकारी आवास योजना का लाभ दिया जाए, ताकि वे अपने बच्चों के साथ सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन जी सकें.
बरसात में बढ़ जाती है परेशानी, रोशनी के लिए लकड़ी जलाने की मजबूरी
जुगाड़ के मकान में रहने वाले परिवार की मुश्किलें बरसात के दिनों में और बढ़ जाती हैं. बिफान के मुताबिक, बारिश के मौसम में बिजली और रोशनी की समस्या के कारण उन्हें रात गुजारने के लिए लकड़ी जलानी पड़ती है. घर की परिस्थितियों के बीच परिवार को रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने में भी परेशानी होती है. उन्होंने बताया कि सरकार की ओर से मिलने वाला राशन तो उन्हें मिल जाता है, लेकिन खाना बनाने के लिए अब तक सरकारी गैस सिलेंडर और चूल्हा नहीं मिला है. ऐसे में परिवार आज भी पारंपरिक चूल्हे पर भोजन बनाने को मजबूर है.
चार बच्चे पढ़ाई से दूर, स्कूल की दूरी और बरसात बनी बड़ी बाधा
बिफान कोरवा ने बताया कि उनके पांच बच्चे हैं, जिनमें एक बेटी की शादी हो चुकी है और चार बच्चे उनके साथ रहते हैं. उनका कहना है कि ये चारों बच्चे फिलहाल पढ़ाई नहीं कर रहे हैं. इसकी एक बड़ी वजह आसपास स्कूल की सुविधा नहीं होना और स्कूल दूर स्थित होना है. बरसात के दिनों में धुंध और रास्ते की परेशानी के कारण बच्चों को भेजने में डर भी लगता है. बिफान का दर्द है कि अगर उनके बच्चे स्कूल जाते और पढ़ाई करते, तो भले ही उन्हें नौकरी नहीं मिलती, लेकिन वे शिक्षित जरूर होते और उन्हें ज्ञान मिलता. शिक्षा से दूर रहने के कारण उन्हें बच्चों के भविष्य की चिंता सताती रहती है.
सरकार से आवास, गैस और बच्चों की शिक्षा की मांग
बिफान कोरवा ने सरकार से मांग की है कि उनके परिवार को पक्का मकान और गैस चूल्हा उपलब्ध कराया जाए, ताकि बरसात के दिनों में भी खाना बनाने और परिवार के साथ रहने में सहूलियत हो सके. इसके साथ ही वे चाहते हैं कि उनके बच्चों की पढ़ाई के लिए उचित व्यवस्था हो. उनका कहना है कि शिक्षा से ही बच्चों को आगे बढ़ने का अवसर मिल सकता है. परिवार की मौजूदा परिस्थितियों के बीच उनकी सबसे बड़ी चिंता यही है कि उनके बच्चे भी पढ़-लिखकर जीवन में आगे बढ़ें और उन्हें उन परेशानियों का सामना न करना पड़े, जिनसे उनका परिवार वर्षों से जूझ रहा है.