बहराइच के किसान त्रिलोकी गोवंशो के मूत्र को देशी जुगाड़ से सहेज कर बना रहे जैविक खाद, खेती की लागत होगी कम, बंपर होगी पैदावार

बहराइच के किसान त्रिलोकी गोवंशो के मूत्र को देशी जुगाड़ से सहेज कर बना रहे जैविक खाद, खेती की लागत होगी कम, बंपर होगी पैदावार


Last Updated:

बहराइच के किसान त्रिलोकी ने बिना महंगे उपकरणों के मवेशी मूत्र सहेजने का अनूठा जुगाड़ निकाला है. इस तकनीक से प्राकृतिक खेती की लागत काफी कम हो गई है और जैविक खाद बनाने में मदद मिल रही है. किसान त्रिलोकी ने अपनी गाय के शेड में एक छोटी सी व्यवस्था की है. उन्होंने मवेशी के बांधने वाले स्थान के ठीक पास एक 3 से 4 फीट लंबा पाइप लगाया है, जिसका दूसरा सिरा जमीन के बाहर रखे 5 लीटर के प्लास्टिक के डिब्बे से जोड़ा गया है.

ख़बरें फटाफट

​बहराइच: खेती की बढ़ती लागत से परेशान किसानों के लिए बहराइच जिले से एक प्रेरणादायक और अनूठी पहल सामने आई है. यहां के एक जागरूक किसान ने बिना किसी महंगे उपकरण के, एक बेहद साधारण और असरदार जुगाड़ के जरिए मवेशियों के मूत्र को सहेजने का गजब तरीका ढूंढ निकाला है. इस तकनीक से न सिर्फ संसाधनों का सदुपयोग हो रहा है, बल्कि प्राकृतिक खेती की लागत भी काफी हद तक कम हो गई है.

किसानों का जानें यह अनोखा जुगाड़

​जिले के ग्रामीण इलाकों में अब खेती किसानी के लिए नई और किफायती तकनीकों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है. इसी कड़ी में किसान त्रिलोकी ने अपनी गाय के शेड में एक छोटी सी व्यवस्था की है. उन्होंने मवेशी के बांधने वाले स्थान के ठीक पास एक 3 से 4 फीट लंबा पाइप लगाया है, जिसका दूसरा सिरा जमीन के बाहर रखे 5 लीटर के प्लास्टिक के डिब्बे से जोड़ा गया है. मवेशी द्वारा जब भी मूत्र त्याग किया जाता है, वह सीधे पाइप के जरिए सुरक्षित रूप से उस डिब्बे में एकत्रित हो जाता है.

​जीवामृत और खाद बनाने में हो रहा इस्तेमाल

​किसान त्रिलोकी के अनुसार, इस आसान सी व्यवस्था से उन्हें प्रतिदिन लगभग 5 लीटर मवेशी मूत्र प्राप्त हो जाता है. इस एकत्रित मूत्र का उपयोग वे खेतों के लिए जीवामृत, घनजीवामृत, काढ़ा और जैविक खाद बनाने में करते हैं. पहले खुले में मवेशी मूत्र इधर-उधर बहकर बर्बाद हो जाता था, लेकिन इस तकनीकी बदलाव से यह पूरी तरह सुरक्षित रहता है.

​यूट्यूब से मिली आइडिया, अब दे रहे दूसरों को संदेश

​किसान त्रिलोकी बताते हैं कि उन्होंने इस तकनीक को लगभग 4-5 साल पहले यूट्यूब पर देखा था, जिसके बाद उन्होंने इसे खुद अपने पशु शेड में आजमाने का फैसला किया. वर्तमान में उनके पास एक गाय और एक देशी बछिया सहित कुल दो मवेशी हैं. ​उनका मानना है कि यदि क्षेत्र के अन्य पशुपालक और किसान भाई भी इस तरह की छोटी-छोटी तकनीकों को अपना लें, तो खेती की लागत में भारी कमी लाई जा सकती है. त्रिलोकी का दावा है कि इस विधि से केवल एक गाय के माध्यम से लगभग 10 से 15 बीघा भूमि पर आराम से प्राकृतिक और जैविक खेती की जा सकती है.



Source link