Westminster Abbey Skeleton: लंदन की ऐतिहासिक इमारत वेस्टमिंस्टर एबे में मिले एक रहस्यमयी कंकाल की कहानी ने करीब डेढ़ सदी तक आर्कियोलॉजिस्ट्स को उलझाए रखा. जिस पत्थर के ताबूत पर चौथी सदी के रोमन व्यक्ति का नाम खुदा था, उसके अंदर मिले कंकाल की उम्र उससे कई सौ साल बाद की निकली. सवाल था कि आखिर एक मध्यकालीन व्यक्ति को रोमन काल के ताबूत में क्यों दफनाया गया? वह कौन था और उसका इस चर्च से क्या संबंध था?
अब वेस्टमिंस्टर एबे के सलाहकार पुरातत्वविद् प्रोफेसर वारविक रॉडवेल ने इस रहस्य को सुलझाने की कोशिश की है. उनके मुताबिक, ताबूत में दफन व्यक्ति 10वीं या 11वीं सदी का कोई ऐसा ईसाई धर्मगुरु या एबट रहा होगा, जो किसी ऊंचे ओहदे पर हो. इसके दो नाम इस मामले में सामने आए हैं, लेकिन इनमें से एक को अधिक संभावित माना जा रहा है. हालांकि कंकाल की पहचान को लेकर अभी अंतिम पुष्टि नहीं हुई है. यह मामला सिर्फ एक पुराने कंकाल की पहचान का नहीं, बल्कि उस दौर की धार्मिक परंपराओं, रोमन विरासत के दोबारा इस्तेमाल और ब्रिटेन के मध्यकालीन इतिहास को समझने का भी है.
1820 में पहली बार मिला था ताबूत
इस कहानी की शुरुआत साल 1820 में हुई, जब लंदन में वेस्टमिंस्टर एबे के पास सेंट मार्गरेट चर्च के लिए कब्र खोद रहे मजदूरों को जमीन के नीचे एक भारी पत्थर का ताबूत मिला. यह चूना पत्थर से बना था और इसकी बनावट रोमन काल की थी. ताबूत पर खुदे लैटिन लेख में Valerius Amandinus का नाम था. इसका मतलब निकाला गया कि यह स्मारक उनके बेटों ने अपने पिता की याद में बनवाया था. इससे संकेत मिलता है कि अमांडिनस शायद रोमन ब्रिटेन के किसी संपन्न परिवार से ताल्लुक रखते थे.
ताबूत की कहानी यहीं खत्म नहीं हुई. 1820 में इसकी खोज के दौरान इसका ढक्कन तोड़ दिया गया. रिपोर्ट्स के मुताबिक, ढक्कन छह टुकड़ों में टूट गया था और अंदर की हड्डियां भी अस्त-व्यस्त हो गई थीं. इसके बाद ताबूत को दोबारा बंद करके दफना दिया गया. करीब 49 साल बाद, 1869 में, खुदाई के दौरान यह फिर सामने आया. इसके बावजूद अंदर दफन व्यक्ति की पहचान का रहस्य बरकरार रहा. उस समय यह भी स्पष्ट नहीं था कि ताबूत में मौजूद हड्डियां वास्तव में किस काल की थीं.
रोमन ताबूत पर बना क्रॉस बना सबसे बड़ा सुराग
इस रहस्य को समझने में ताबूत के ढक्कन पर बना एक बड़ा क्रॉस निर्णायक साबित हुआ. ताबूत का मूल हिस्सा चौथी सदी के रोमन काल का था, लेकिन उसके ढक्कन पर बना क्रॉस लगभग 10वीं या 11वीं सदी की एंग्लो-सैक्सन ईसाई कला से मेल खाता है. यानी ताबूत और उसके अंदर दफन व्यक्ति के बीच सदियों का अंतर हो सकता था. प्रोफेसर वारविक रॉडवेल के मुताबिक यह क्रॉस किसी सामान्य व्यक्ति की कब्र की बजाय ऊंचे धार्मिक पद पर आसीन व्यक्ति की ओर इशारा करता है. उस समय चर्च के धर्मगुरुओं को सम्मानजनक और विशिष्ट तरीके से दफनाया जा सकता था. पुराने रोमन ताबूत का दोबारा इस्तेमाल इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाता है.
आखिर क्या होता है सार्कोफेगस?
सार्कोफेगस (Sarcophagus) पत्थर से बना ऐसा ताबूत होता है, जिसका इस्तेमाल मृत इंसान के शव को रखने के लिए किया जाता था. प्राचीन रोम में संपन्न परिवारों और प्रभावशाली लोगों के लिए ऐसे ताबूत बनाए जाते थे. इस मामले में खास बात यह है कि ताबूत पर रोमन काल के इंसान का नाम मौजूद है, लेकिन अंदर का कंकाल उससे कई सदियों बाद का है. इससे पता चलता है कि पुरानी वस्तुओं और स्मारकों का इस्तेमाल बाद के दौर में भी नए मकसद के लिए किया जा सकता था.
2016 में खुला ताबूत तो अंदर मिला पूरा कंकाल
इस रहस्य की जांच में अगला बड़ा मोड़ 2016 में आया, जब संरक्षण के काम के लिए ताबूत को खोला गया. पहले के रिकॉर्ड से ऐसा माना जा रहा था कि अंदर का कंकाल शायद गायब हो चुका है. लेकिन ताबूत का ढक्कन हटाने पर इंसान के अवशेष मौजूद मिले. एक्सपर्ट्स ने हड्डियों की जांच की. हालांकि कंकाल पूरी तरह व्यवस्थित नहीं था. खोपड़ी में क्षति थी और हाथ-पैर की लंबी हड्डियां भी अपनी सामान्य स्थिति में नहीं थीं. पुरानी खुदाई और ताबूत के साथ हुई छेड़छाड़ के कारण अवशेषों की मूल स्थिति बिगड़ चुकी थी.
जांच-पड़ताल से पता चला कि मृत इंसान कोई पुरुष था. उसकी अनुमानित लंबाई करीब 5 फुट 9 इंच थी और मृत्यु के समय उसकी उम्र करीब 35 से 49 साल के बीच रही होगी. सबसे अहम सुराग रेडियोकार्बन डेटिंग से मिला. इस तकनीक के जरिए हड्डियों की उम्र का अनुमान लगाया गया और नतीजों ने संकेत दिया कि इंसान की मौत लगभग 987 से 1052 ईस्वी के बीच हुई थी. इससे यह साफ हो गया कि कंकाल रोमन काल का नहीं, बल्कि मध्यकालीन ब्रिटेन का था.
हड्डियों के पास सफेद पदार्थ, लकड़ी के ताबूत!
जांच के दौरान पुरातत्वविदों को पत्थर के ताबूत के अंदर सफेद पदार्थ का निशान भी मिला. यह निशान आयताकार आकार में था. एक्सपर्ट्स के मुताबिक यह चूने का अवशेष था, जो कभी अंतिम संस्कार या दफनाने की प्रक्रिया में इस्तेमाल किया गया होगा. रॉडवेल का अनुमान है कि मृत व्यक्ति के शव को पहले लकड़ी के ताबूत में रखा गया था. इसके बाद उसे चूने से ढककर पुराने रोमन पत्थर के ताबूत के भीतर रखा गया होगा.
समय बीतने के साथ लकड़ी का ताबूत पूरी तरह नष्ट हो गया, लेकिन चूने के निशान पत्थर की सतह पर रह गए. यह सुराग इसलिए अहम हैं क्योंकि इससे पता चलता है कि रोमन ताबूत को बाद में एक नई कब्र के तौर पर इस्तेमाल किया गया था. हालांकि, लकड़ी के ताबूत का इस्तेमाल कैसे और किस सटीक प्रक्रिया से हुआ, इसकी हर बात की स्वतंत्र तौर पर पुष्टि नहीं की जा सकी है.
कौन था वो रहस्यमयी व्यक्ति?
हड्डियों की उम्र और ताबूत की बनावट से यह संभावना मजबूत हुई कि मृत व्यक्ति वेस्टमिंस्टर एबे का कोई बड़ा धर्मगुरु था. इसके बाद एक्सपर्ट्स ने उस दौर में एबे के प्रमुख रहे धर्मगुरुओं के ऐतिहासिक रिकॉर्ड खंगाले. इनमें दो नाम सामने आए.
- एल्फविग: एल्फविग ने लगभग 993 से 1020 तक वेस्टमिंस्टर एबे के एबट के रूप में काम किया था. वह पहले से ही यहां के भिक्षु थे और करीब 27 वर्षों तक इस पद पर रहे. प्रोफेसर रॉडवेल के मुताबिक यह फैक्ट उन्हें संभावित उम्मीदवार बनाता है. उनकी मौत लगभग 1020 में हुई थी.
- वुल्फनोथ: वुल्फनोथ ने एल्फविग के बाद एबट का पद संभाला था और लगभग 1049 में उनकी मृत्यु हुई. कंकाल की अनुमानित उम्र और रेडियोकार्बन डेटिंग से मिली समय-सीमा उनके मामले में भी संभावित बैठती है.
आखिर रोमन काल के ताबूत का दोबारा क्यों इस्तेमाल?
दोनों इंसानों के जन्म की सटीक तारीखें उपलब्ध नहीं हैं. इसलिए केवल उम्र के अनुमान और मौत की तारीखों के आधार पर किसी एक की पहचान पक्की करना मुश्किल है. यही इस पूरी खोज का सबसे दिलचस्प सवाल है. यदि कंकाल वास्तव में किसी एबट का है, तो उसे चौथी सदी के रोमन ताबूत में क्यों दफनाया गया? इसका कोई पक्का जवाब अभी सामने नहीं आया है.
उनके जीवन, पेशे या रोमन समाज में उनकी वास्तविक हैसियत के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है. यह भी निश्चित नहीं है कि वह कहां दफनाए गए थे और उनका मूल मकबरा किस जगह था. ऐसा संभव है कि ताबूत कभी किसी रोमन समाधि का हिस्सा रहा हो. यह भी संभावना जताई गई है कि वेस्टमिंस्टर के आसपास रोमन काल का कोई ऐसा स्थल रहा हो, जिसके अवशेष अभी तक खोजे नहीं गए हैं. फिलहाल इन संभावनाओं की पुष्टि के लिए और पुरातात्विक सबूतों की जरूरत है.
150 साल बाद कितना सुलझा रहस्य?
इस खोज से कुछ अहम बातें सामने आई हैं. सबसे पहला तो ये कि कंकाल रोमन काल का नहीं था. रेडियोकार्बन डेटिंग के मुताबिक, वह लगभग 987 से 1052 ईस्वी के बीच का था. दूसरी बात मृतक के धर्मगुरु होने से जुड़ा है. ताबूत की बनावट, ढक्कन पर बना क्रॉस और दफनाने का तरीका इस संभावना को मजबूत करते हैं. आखिरकार करीब 150 साल से ज्यादा समय तक अनसुलझे रहे इस मामले में विज्ञान और इतिहास ने मिलकर एक अहम सुराग दिया है. फिर भी ताबूत में दफन व्यक्ति की पहचान और एक रोमन ताबूत को मध्यकाल में दोबारा इस्तेमाल करने की वजह से जुड़े कुछ सवाल अब भी बाकी हैं.