Indonesia Rupiah Crisis: बुरी तरह गिरा इंडोनेश‍िया का रुपिया, क्या लौट रहे हैं 1998 जैसे संकट के दिन?

Indonesia Rupiah Crisis: बुरी तरह गिरा इंडोनेश‍िया का रुपिया, क्या लौट रहे हैं 1998 जैसे संकट के दिन?


इंडोनेशिया की मुद्रा रुपिया की हालत खराब होती जा रही है. एक डॉलर खरीदने के लिए अब करीब 18000 रुपिया खर्च करने पड़ रहे हैं. देश का शेयर बाजार भी बुरी तरह हिल गया है. विदेशी निवेशक अपना पैसा निकाल रहे हैं और सरकार को डर है कि कहीं हालात और न बिगड़ जाएं. इसी वजह से 1998 में आए उस आर्थिक संकट की चर्चा फिर शुरू हो गई है, जब इंडोनेशिया की मुद्रा बुरी तरह टूट गई थी और देश की अर्थव्यवस्था लड़खड़ा गई थी. लेकिन रुपिया गिरने से किसी देश को इतना बड़ा नुकसान कैसे हो सकता है?

इंडोनेशिया की मुद्रा का नाम रुपिया है. जैसे भारत में रुपये चलते हैं, वैसे ही वहां रुपिया चलता है. मान लीजिए कुछ समय पहले एक डॉलर खरीदने के लिए आपको 15000 रुपिया खर्च करने पड़ते थे. अब उसी एक डॉलर के लिए करीब 18000 रुपिया देने पड़ रहे हैं. यानी डॉलर खरीदने के लिए पहले से ज्यादा पैसे खर्च करने होंगे. यही रुपिया का कमजोर होना है.

कहां आती है द‍िक्‍कत

इसका नुकसान तब समझ आता है, जब इंडोनेशिया को विदेश से सामान खरीदना होता है. मान लीजिए, वहां की कोई कंपनी विदेश से तेल खरीदती है और उसका भुगतान डॉलर में करती है. डॉलर महंगा होने पर कंपनी को उतना ही तेल खरीदने के लिए ज्यादा रुपिया खर्च करना पड़ेगा. कंपनी की लागत बढ़ेगी तो वह सामान के दाम बढ़ा सकती है. आखिर में इसका असर आम आदमी की जेब पर पड़ सकता है. खाना पकाने, यात्रा करने और रोजमर्रा की चीजें खरीदने का खर्च बढ़ सकता है.

21 अक्टूबर 2026 को इंडोनेशियाई रुपिया करीब 18,008 रुपिया प्रति डॉलर पर कारोबार कर रही थी. साल की शुरुआत से अब तक यह डॉलर के मुकाबले करीब 7.3% कमजोर हो चुकी है.

शेयर बाजार में अचानक इतनी बड़ी गिरावट क्यों आई?

इंडोनेशिया के बाजार में एक बड़ी चिंता MSCI नाम की कंपनी के फैसले से पैदा हुई है. यह कंपनी दुनिया के शेयर बाजारों के सूचकांक बनाती है. दुनिया के कई बड़े निवेशक इन्हीं सूचकांकों को देखकर तय करते हैं कि किस देश के शेयरों में पैसा लगाना है. अभी इंडोनेशिया को उभरते बाजारों की श्रेणी में रखा गया है. MSCI ने इस बात पर विचार शुरू किया है कि इंडोनेशिया को इस श्रेणी से हटाकर अलग श्रेणी में रखा जाए या नहीं.

अगर इंडोनेशिया को बड़े वैश्विक सूचकांकों से हटा दिया जाता है, तो उन सूचकांकों के हिसाब से पैसा लगाने वाले विदेशी फंड अपने शेयर बेच सकते हैं. इससे बाजार में और गिरावट आ सकती है. 16 अक्टूबर को इंडोनेशिया का प्रमुख शेयर सूचकांक एक ही दिन में करीब 12% गिर गया. गिरावट इतनी तेज थी कि कारोबार कुछ समय के लिए रोकना पड़ा. 19 अक्टूबर को बाजार फिर गिरा और सूचकांक करीब छह साल के निचले स्तर पर पहुंच गया. हालांकि, 20 अक्टूबर को इसमें करीब 5.65% की बढ़त भी आई.

विदेशी निवेशक पैसा निकालेंगे तो क्या होगा?

  • जब विदेशी निवेशक इंडोनेशिया के शेयर बेचते हैं और अपना पैसा अपने देश वापस ले जाते हैं, तो उन्हें अक्सर रुपिया को डॉलर में बदलना पड़ता है. ऐसे में बाजार में रुपिया बेचने और डॉलर खरीदने वालों की संख्या बढ़ सकती है. इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपिया पर और दबाव पड़ सकता है.
  • UOB नाम की वित्तीय संस्था के अनुमान के मुताबिक, अगर MSCI इंडोनेशिया को अपने उभरते बाजारों के सूचकांकों से बाहर करती है, तो ऐसे फंडों के जरिए करीब 5.6 अरब डॉलर की निकासी का जोखिम हो सकता है. अगर FTSE Russell नाम की दूसरी सूचकांक कंपनी भी ऐसा कदम उठाती है, तो करीब 2.7 अरब डॉलर का अतिरिक्त निवेश प्रभावित हो सकता है. ये अनुमान हैं, पक्के आंकड़े नहीं. लेकिन अगर बड़ी मात्रा में विदेशी पैसा निकलता है, तो शेयर बाजार और मुद्रा दोनों पर दबाव बढ़ सकता है.
  • MSCI ने इस मामले में लोगों और संस्थाओं से राय लेने की प्रक्रिया शुरू की है. राय देने की आखिरी तारीख 30 अप्रैल 2027 है और अंतिम फैसला 30 जून 2027 तक आने की उम्मीद है. यानी इंडोनेशिया के पास अपने बाजार में सुधार करके निवेशकों का भरोसा जीतने का समय है.

रुपिया को संभालने के लिए क्या कर रहा है इंडोनेशिया?

जब किसी देश की मुद्रा तेजी से गिरती है, तो वहां का केंद्रीय बैंक कई कदम उठा सकता है. मसलन, ब्याज दर बढ़ाना, बाजार में डॉलर उपलब्ध कराना या दूसरी नीतियों के जरिए निवेशकों को भरोसा देना. ब्याज दर बढ़ाने का मतलब है कि बैंकों से कर्ज लेना महंगा हो सकता है. लेकिन इसका एक फायदा यह है कि उस देश में पैसा रखने पर मिलने वाला रिटर्न बढ़ सकता है. इससे कुछ निवेशक अपना पैसा वहां बनाए रख सकते हैं.

इंडोनेशिया के केंद्रीय बैंक ने 21 अक्टूबर को अपनी मुख्य ब्याज दर 5.75% पर ही रखी. हालांकि, उसने एक खास जमा सुविधा की दर 4.75% से बढ़ाकर 5% कर दी. यानी केंद्रीय बैंक ने मुख्य ब्याज दर नहीं बढ़ाई, लेकिन बाजार में स्थिरता बनाए रखने के लिए दूसरा कदम उठाया. इसके सामने मुश्किल यह है कि रुपिया को संभालने के लिए सख्ती की जाए, तो कर्ज महंगा हो सकता है. इससे कंपनियों के नए काम और लोगों का खर्च प्रभावित हो सकता है.

महंगा तेल भी बढ़ा रहा है परेशानी

इंडोनेशिया की समस्या सिर्फ विदेशी निवेशकों के पैसा निकालने तक सीमित नहीं है. देश को विदेश से तेल भी खरीदना पड़ता है. जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है, तो उसे खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं.जनवरी से अगस्त 2026 के बीच इंडोनेशिया का कुल आयात करीब 19.8% बढ़कर 186.4 अरब डॉलर हो गया. इसी दौरान तेल और गैस के आयात में करीब 39% की बढ़ोतरी हुई. दूसरी तरफ, देश का कुल निर्यात भी बढ़ा, लेकिन आयात तेजी से बढ़ने के कारण व्यापार का बचा हुआ पैसा ज्यादा नहीं रहा. तेल खरीदने पर ज्यादा डॉलर खर्च होने से रुपिया पर दबाव बढ़ सकता है.

जंगलों में आग से भी बढ़ी मुसीबत

इंडोनेशिया में सुमात्रा और कालीमंतन के कई इलाकों में जंगलों और जमीन पर आग लगने से धुआं फैल रहा है. इस धुएं का असर पड़ोसी देशों मलेशिया और सिंगापुर तक पहुंचा है. इससे लोगों की सेहत को खतरा है और कई जगह सामान्य कामकाज भी प्रभावित हो सकता है. सरकार ने आग बुझाने के लिए अतिरिक्त संसाधन लगाने का आदेश दिया है. हालांकि, यह साफ नहीं है कि आग से अर्थव्यवस्था को कुल कितना नुकसान हुआ है. इंडोनेशिया पहले से ही महंगे तेल और कमजोर मुद्रा से जूझ रहा है. अगर आग और धुएं के कारण कारोबार भी प्रभावित होता है, तो आर्थिक विकास का लक्ष्य हासिल करना और मुश्किल हो सकता है.

1998 में क्या हुआ था?

  1. 1998 में इंडोनेशिया की मुद्रा बहुत बुरी तरह गिर गई थी. कई कंपनियों ने विदेश से डॉलर में कर्ज लिया हुआ था. जब रुपिया कमजोर हुई, तो उन्हें वही कर्ज चुकाने के लिए कई गुना ज्यादा स्थानीय पैसा खर्च करना पड़ा.
  2. कंपनियां मुश्किल में आईं, बैंकों पर दबाव बढ़ा और लोगों को अपनी नौकरियों व जमा पैसे की चिंता होने लगी. महंगाई बहुत बढ़ गई और देश में राजनीतिक उथल-पुथल मच गई. उस साल इंडोनेशिया की अर्थव्यवस्था करीब 13% सिकुड़ गई थी. तत्कालीन राष्ट्रपति सुहार्तो को मई 1998 में पद छोड़ना पड़ा.
  3. आज रुपिया कमजोर होने और शेयर बाजार में बड़ी गिरावट आने से उस दौर की याद जरूर आती है. लेकिन सिर्फ मुद्रा का भाव देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि इंडोनेशिया फिर उसी संकट में पहुंच गया है.
  4. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष को उम्मीद है कि 2026 में इंडोनेशिया की अर्थव्यवस्था करीब 5.1% बढ़ सकती है. विश्व बैंक का अनुमान भी करीब 5.2% वृद्धि का है. यानी मौजूदा दबाव के बावजूद आर्थिक विकास की उम्मीद अभी बनी हुई है.

क्या इंडोनेशिया में फिर वैसा संकट आएगा?

फिलहाल सबसे बड़ी चिंता यह है कि क्या विदेशी निवेशक लगातार पैसा निकालते रहेंगे और क्या रुपिया और कमजोर होगी. अगर ऐसा होता है, तो सामान खरीदने की लागत बढ़ सकती है, महंगाई पर दबाव आ सकता है और कारोबार करना मुश्किल हो सकता है. लेकिन अगर इंडोनेशिया शेयर बाजार के नियमों और पारदर्शिता को बेहतर बनाता है, निवेशकों का भरोसा लौटता है और विदेशी पूंजी का बाहर जाना कम होता है, तो हालात संभल भी सकते हैं.



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