नैनीताल: उत्तराखंड में हालिया भूकंपीय गतिविधियों के बाद एक बार फिर हिमालयी क्षेत्रों में बड़े भूकंप और आपदा प्रबंधन की तैयारियों को लेकर चर्चा तेज हो गई है. भूकंप की दृष्टि से संवेदनशील उत्तराखंड में सुरक्षित निर्माण, पुरानी इमारतों की जांच और आम लोगों को जागरूक करना बेहद जरूरी है. अर्थक्वेक इंजीनियर भावेश पांडे ने नैनीताल में बने भवनों की भूकंपरोधी क्षमता पर चिंता जताते हुए कहा कि संभावित खतरे को देखते हुए अभी से ठोस कदम उठाने की जरूरत है.
उन्होंने कहा कि हिमालयी क्षेत्र में टेक्टोनिक प्लेटों की निरंतर हलचल के कारण धरती के भीतर भूगर्भीय तनाव जमा होता रहता है. जब यह तनाव अचानक मुक्त होता है, तो भूकंप के झटके महसूस किए जाते हैं. ऐसे में उत्तराखंड जैसे संवेदनशील राज्य में भूकंप के जोखिम को समझना और उससे निपटने की तैयारी करना बेहद महत्वपूर्ण है.
कपकोट से उत्तरकाशी तक संवेदनशील क्षेत्र
भावेश पांडे के मुताबिक, उत्तराखंड के कपकोट, बागेश्वर, धारचूला, चमोली और उत्तरकाशी जैसे क्षेत्रों में भूकंपीय गतिविधियों को गंभीरता से लेने की जरूरत है. बीते दिनों कपकोट के आसपास केंद्रित एक भूकंप के झटके महसूस किए गए थे. हालांकि, इसकी तीव्रता कम थी, लेकिन ऐसी घटनाएं हिमालयी क्षेत्र की भूकंपीय संवेदनशीलता की ओर ध्यान दिलाती हैं. उन्होंने बताया कि हिमालय में भूगर्भीय हलचल लगातार जारी रहती है. ऐसे में छोटे भूकंप आने के बावजूद भविष्य में बड़े भूकंप की आशंका को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता. हालांकि, किसी बड़े भूकंप के आने का सटीक समय और स्थान बताना वैज्ञानिक रूप से संभव नहीं है. इसलिए किसी निश्चित समयावधि में बड़े भूकंप आने की भविष्यवाणी के बजाय जोखिम कम करने और तैयारी पर ध्यान देना जरूरी है.
नैनीताल की इमारतों पर क्यों जताई चिंता?
नैनीताल की भौगोलिक परिस्थितियों और यहां बने भवनों का जिक्र करते हुए भावेश पांडे ने कहा कि शहर में कई इमारतों की भूकंपरोधी क्षमता को लेकर सवाल उठते हैं. उनके मुताबिक, पहाड़ी क्षेत्रों में कुछ स्थानों पर चार से पांच मंजिला भवन बिना पर्याप्त नींव और निर्धारित भूकंपरोधी मानकों का पालन किए बनाए गए हैं. तेज भूकंप आने की स्थिति में ऐसे भवनों को नुकसान पहुंचने का खतरा अधिक हो सकता है. उन्होंने कहा कि पुराने भवनों की संरचनात्मक सुरक्षा की जांच कराना और नए निर्माण के दौरान निर्धारित इंजीनियरिंग मानकों का पालन करना जरूरी है. पहाड़ी क्षेत्रों में निर्माण करते समय जमीन की स्थिति, ढलान, नींव और भवन की संरचना का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए. केवल इमारत की सुंदरता और मंजिलों की संख्या पर ध्यान देने के बजाय उसकी मजबूती को प्राथमिकता देनी होगी.
हिमालय में जमा हो रहा तनाव, बड़े भूकंप का खतरा
भावेश पांडे ने बताया कि हिमालयी क्षेत्र में टेक्टोनिक प्लेटों की गति के कारण भूगर्भीय तनाव लगातार जमा होता है. उन्होंने हिमालय में लगभग 40 मिलीमीटर प्रतिवर्ष और नैनीताल-हल्द्वानी क्षेत्र के संदर्भ में लगभग 25 से 28 मिलीमीटर उत्तर की तरफ खिसकने के बारे में बताया है, जिससे ऊर्जा संचित हो रही है. और भविष्य में भूकंप आने का खतरा है. उन्होंने ऐतिहासिक भूकंपों का जिक्र करते हुए कहा कि हिमालयी क्षेत्र में पहले भी विनाशकारी भूकंप आ चुके हैं. ऐसे इतिहास से सबक लेते हुए भविष्य के जोखिम को कम करने की दिशा में काम करना जरूरी है.
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि छोटे भूकंप आने का अर्थ यह नहीं है कि बड़े भूकंप का खतरा समाप्त हो गया है. भूकंप की तीव्रता को लेकर उन्होंने बताया कि रिक्टर पैमाने पर एक अंक का अंतर भी महत्वपूर्ण होता है. उदाहरण के तौर पर, तीव्रता 6 और 7 के भूकंप के बीच निकलने वाली ऊर्जा में लगभग 32 गुना अंतर हो सकता है, जबकि तीव्रता 6 और 8 के बीच यह अंतर लगभग 1,000 गुना तक होता है. इसलिए बड़े भूकंप के संभावित प्रभाव को समझना और पहले से तैयारी करना बेहद जरूरी है.
भूदेव ऐप से मिल सकती है चेतावनी
भावेश पांडे ने भूकंप की पूर्व चेतावनी प्रणाली का जिक्र करते हुए कहा कि उत्तराखंड में भूदेव ऐप के माध्यम से भूकंप आने से पहले कुछ सेकंड की चेतावनी मिलने की व्यवस्था की गई है. हालांकि, चेतावनी मिलने के बाद लोगों को क्या करना चाहिए, इसकी जानकारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है. कुछ सेकंड की चेतावनी भूकंप को रोक नहीं सकती, लेकिन सही प्रतिक्रिया से चोट और नुकसान का जोखिम कम करने में मदद मिल सकती है. उन्होंने कहा कि भूकंपरोधी भवन का निर्माण सामान्य निर्माण की तुलना में हमेशा बहुत महंगा हो, ऐसा जरूरी नहीं है. शुरुआत से ही निर्धारित मानकों के अनुसार निर्माण करने से भविष्य में बड़े नुकसान की आशंका कम की जा सकती है.