देहरादून: पहाड़ की खुरदुरी और चढ़ाई भरी पगडंडियों पर जब उम्रदराज पैरों के छाले और युवाओं का जोश एक साथ कदमताल करते हैं, तो वह महज कोई सैर नहीं होती वह व्यवस्था की सुस्ती के खिलाफ एक गूंज बन जाती है. उत्तराखंड के कर्णप्रयाग के सिमली से शुरू हुई दस दिनों की लंबी पदयात्रा जब 20 अक्टूबर को देहरादून के गांधी पार्क पहुंची, तो यह सिर्फ कुछ ग्रामीणों का हुजूम नहीं था, बल्कि उन तमाम उम्मीदों का कारवां था जो पिछले चौदह सालों से फाइलें ढो-ढोकर थक चुकी हैं.
घोषणाओं के मकड़जाल में उलझी पहाड़ की सेहत
साल 2012 के गलियारों में लौटिए, जब तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के कार्यकाल में सिमली में बेस अस्पताल की घोषणा हुई थी. पहाड़ के गरीब और दूरदराज के मरीजों के लिए यह घोषणा किसी जीवनदान से कम नहीं थी. तब लगा था कि अब पहाड़ की माताओं को प्रसव पीड़ा के दौरान दर्जनों किलोमीटर का सफर तय नहीं करना पड़ेगा, लेकिन यह घोषणा धीरे-धीरे सियासी वादों और प्रशासनिक फाइलों की धूल फांकने लगी. कभी इसे ‘महिला बेस चिकित्सालय’ बनाने की बात उठी, तो कभी साल 2019 में तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत द्वारा दस करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए. भवन बनकर तैयार हुआ तो लोगों में उम्मीदें जगीं कि शायद अब इलाज के दरवाजे खुलेंगे. साल 2022 की रिपोर्ट ने कुछ राहत दी जब छह डॉक्टरों, फार्मासिस्टों और नर्सिंग अधिकारियों की नियुक्ति के निर्देश जारी हुए.
ग्रामीणों का टूटा सब्र का बांध
अगस्त से पहले अस्पताल शुरू होने की उम्मीद बंधी थी लेकिन पहाड़ की बदकिस्मती देखिए भवन खड़ा हो गया, मशीनें आ गईं, पर वे या तो धूल फांकती रहीं या बेकार पड़ी रहीं. एक्स-रे और अल्ट्रासाउंड की मशीनें हैं, पर उन्हें चलाने वाले हाथ यानी विशेषज्ञ डॉक्टर और टेक्नीशियन उपलब्ध नहीं हैं. जब उम्मीदें टूटीं, तो सड़कों पर उतरे ग्रामीण जून 2025 आते-आते जब सब्र का बांध टूट गया, तो सिमली के लोगों ने मेडिकल कॉलेज की संभावनाओं पर भी विचार किया. गढ़वाल सांसद अनिल बलूनी से उम्मीदें लगाई गईं. जून को साठ से अधिक ग्राम पंचायतों के लोग, महिला मंगल दल और जनप्रतिनिधि सिमली की महापंचायत में उमड़ पड़े. विधायक अनिल नौटियाल ने पंद्रह अगस्त तक शासनादेश जारी होने का भरोसा दिया. समय बीता, आश्वासन की मियाद खत्म हुई, पर सरकारी पन्नों पर स्याही नहीं उतरी.सितंबर में सिर्फ बोर्ड बदलकर ‘महिला बेस अस्पताल’ से ‘बेस अस्पताल’ कर दिया गया, लेकिन वह औपचारिक शासनादेश आज भी गायब है जो इस अस्पताल को कानूनी और प्रशासनिक मान्यता दे सके.बस, इसी कागजी टालमटोल ने पहाड़ के धैर्य को डिगा दिया.
अक्टूबर से चंडिका मंदिर में माथा टेककर निकले ग्रामीण
ग्यारह अक्टूबर को सिमली के चंडिका मंदिर में माथा टेककर जब पचास से ज्यादा गांवों के ग्रामीण देहरादून के लिए निकले, तो उनके पास खोने के लिए सिवाए दर्द के कुछ नहीं था. लगातार दस दिनों तक पहाड़ों के घाटियों और सड़कों को लांघते हुए, बारिश और धूप की परवाह किए बिना, ये ग्रामीण आज देहरादून की दहलीज़ पर आ पहुंचे हैं. डूंगा की निवासी प्रतिभा ने बताया कि उनके यहां के बेस अस्पताल में बिल्कुल भी सुविधा नहीं है. जब वह गर्भ से थी तब सातवें महीने में उन्हें प्रसव पीड़ा हुई, तबियत इतनी ज्यादा खराब थी तब उन्हें देहरादून के अस्पताल रेफर किया गया. उन्होंने कहा कि मरते -मरते वह बची हैं. उन्होंने कहा कि बच्चे का जन्म होने के बाद उनके टांके बिना इंजेक्शन लगाए दिल दिए जाते हैं, मशीने उपलब्ध नहीं है, पहाड़ी रास्तों के बीच मरीज की हालत खराब में रेफर किया जाता है. उन्होंने कहा कि शहरों तक लाते – लाते बच्चे और मां दम तोड़ देते हैं.
डॉक्टर न होने से दोस्त की गई जान
संजय कुमार ने बताया कि एक दिन अचानक उनके एक साथी को स्कूटर चलाते हुए हार्ट अटैक आ गया उन्हें तुरंत इस अस्पताल में लाया गया लेकिन यहां न हृदय विशेषज्ञ है और न ही उनसे जुड़े इक्विप्मेंट. उन्हें रेफर किया गया,श्रीनगर ले जाते हुए ही उनका निधन हो गया. दयाल सिंह ने बताया कि इनकी उम्र 75 साल है, वह बचपन से ही अस्पतालों की बदहाली देख रहे हैं, राज्य बनने के बाद उम्मीद थी कि सब ठीक हो जाएगा लेकिन समस्याएं जस की तस है. उन्होंने कहा कि अस्पताल में सुविधाएं और डॉक्टर्स नहीं है इसलिए वे लोग खुद जड़ी बूटियों के जरिए ही संभव इलाज करते हैं और ये दवाएं अपने साथ लेकर घूमते हैं. उनका आरोप है कि “बेस अस्पताल नहीं, तो वोट नहीं” यह सिर्फ एक नारा नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था के प्रति गहरा क्षोभ है जिसने चौदह साल तक एक अस्पताल को धरातल पर उतरने नहीं दिया.
सीएम पुष्कर सिंह धामी ने 2024 में की घोषणा, पर अभी तक नहीं हुआ पूरा
आज जब प्रशासन ने इन आंदोलनकारियों को गांधी पार्क में रोक लिया, तो उनकी आंखों में गुस्सा कम और लाचारी की पीड़ा ज्यादा थी. उनका साफ कहना है कि अगर जल्द ही पूर्ण बेस अस्पताल का शासनादेश जारी नहीं हुआ, तो वे न सिर्फ मुख्यमंत्री आवास का घेराव करेंगे, बल्कि आगामी दो हजार सत्ताईस के विधानसभा चुनाव का पूर्ण बहिष्कार करेंगे.इसके साथ ही, गैरसैंण में होने वाले विधानसभा सत्र के दौरान भी घेराव की चेतावनी दी गई है.पहाड़ का नागरिक अपने हक के लिए हमेशा से धैर्य की मूरत रहा है, लेकिन जब बात जीवन और स्वास्थ्य की हो, तो उसका सब्र भी अब कदमों की रफ्तार बनकर सड़क पर उतर आया है. अब देखना यह है कि देहरादून की ठंडी और एसी कमरों में बैठी सरकार इन थके हुए पैरों के छाले और उनकी चीख सुन पाती है या नहीं.साल 2024 में सीएम पुष्कर सिंह धामी ने घोषणा चमोली के सिमली गांव में 35 करोड़ की लागत से बेस अस्पताल बनाने की घोषणा की गई थी लेकिन आज तक कोई शासनादेश जारी नहीं हुआ है और ग्रामीण इसकी राह तक रहे हैं.