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मुंबई की एक रिहाइशी सोसायटी में 10 साल की लड़की पर 18 महीने की बच्ची की हत्या का आरोप लगा है. ऐसे में सवाल ये है कि क्या 10 साल बच्ची के लिए कानून में कोई प्रावधान है? इलाहाबाद हाईकोर्ट की अधिवक्ता अंकिता तिवारी ने भारतीय न्याय संहिता में बच्चों के लिए कानून और जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड की भूमिका के बारे में विस्तार से जानकारी दी है.
भारत में दस साल के बच्चों के लिए क्या कानून है? (फोटो-Pixabay)
मुंबई के गोरेगांव में पुलिस ने एक 10 साल की बच्ची के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया है. उस पर एक 18 महीने की बच्ची को छठवीं मंजिल से नीचे फेंकने का आरोप है. पहले इस मामले को आकस्मिक घटना के तौर पर दर्ज किया गया था. बाद में मृत बच्ची की मां और सीसीटीवी फुटेज के आधार पर इसे हत्या के मुकदमे में बदला गया. इलाहाबाद हाईकोर्ट की अधविक्ता अंकिता तिवारी के मुताबिक भारतीय कानून में 7 साल से छोटे बच्चों को आपराधिक मुकदमों से पूरी तरह छूट है. हालांकि 7 से 12 साल तक के बच्चों के किसी अपराध पर ये देखा जाता है कि क्या उस बच्चे को अपनी हरकत से होने वाले परिणाम के बारे में अंदेशा था या नहीं.
10 साल की इस बच्ची को फिलहाल किशोर न्याय बोर्ड JJB के सामने पेश किया गया है. यहां बोर्ड ने उसकी काउंसिलिंग के आदेश दिए हैं. इसके लिए एक गैर सरकारी संगठन को नियुक्त किया गया है. बोर्ड ने बच्ची को अपनी उसके माता-पिता की देखरेख में ही छोड़ा है. TOI की एक रिपोर्ट के मुताबिक आरेापी बच्ची का परिवार दो सप्ताह पहले ही गोरेगांव की इस सोसायटी में रहने आया था जहां हादसा हुआ है. अब ये परिवार अपने रिश्तेदारों के यहां रह रहा है.
क्या है पूरा मामला?
गोरेगांव का यह मामला 14 अक्टूबर को रात 9 बजे के आसपास का है. यहां छठवीं मंजिल पर एक 18 महीने की बच्ची कॉमन कॉरिडोर में बिल्ली के साथ खेल रही थी. जब मां को वह दिखाई नहीं दी तो उन्होंने बच्ची के 12 साल के भाई को उसे तलाश करने भेजा. बच्ची नीचे बेसमेंट में दिखी. उसे अस्पताल ले जाया गया, लेकिन तब तक उसकी मौत हो चुकी थी. मृत बच्ची की मां के मुताबिक सीसीटीवी में दिख रहा है कि 10 साल की बच्ची ने मेरी बेटी को इशारे से पास बुलाया. इसके बाद उठाकर लिफ्ट के पास की सीढ़ियों से नीचे फेंक दिया. इसके बाद वह भाग गई. यानी उसे इस बात का अहसास था कि उसने अपरााध किया है. मां के बयानों के आधार पर पुलिस ने बच्ची के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया है.
भारत में बच्चों के लिए क्या आपराधिक कानून हैं?
इलाहाबाद हाईकोर्ट की अधिवक्ता अंकिता तिवारी के मुताबिक भारतीय न्याय संहिता में बच्चों की आपराधिक जिम्मेदारी तय करने का प्रावधान है. इसकी धारा 20 के मुताबिक सात साल से कम उम्र के बच्चों का कोई भी काम अपराध नहीं माना जाता. हालांकि सात साल पूरी होने के बाद 12 साल तक स्थिति बदल जाती है. मगर इसका ये मतलब नहीं कि इन्हें हर गलती के लिए अपराधी माना जा सकता है. ऐसे मामलों में कोर्ट ये देखता है कि बच्चे को अपनी गलती और उसके परिणामों के बारे में कितना पता था. यानी कानून ये मानता है कि इस उम्र में बच्चे अनजाने में गलती कर सकते हैं. भारतीय न्याय संहिता की धारा 21 में इसका प्रवधान है. इसके मुताबिक सात से 12 साल तक के बच्चों में ये देखा जाता है कि क्या वे जानते थे कि उनकी गलती का क्या परिणाम हो सकता है. अगर हां तो आपराधिक कानून बनता है और नहीं तो उन्हें छूट मिल सकती है. यह तय करने का किशोर न्याय बोर्ड JJB के पास होता है.
10 साल के बच्चे पर चल सकता है हत्या का मुकदमा?
एडवोकेट अंकिता तिवारी के मुताबिक ऐसे मामलों में FIR दर्ज की जा सकती है. दरअसल ये प्राथमिकी होती है जो पुलिस को जांच आगे बढ़ाने का अधिकार देती है. बच्चे पर आपराधिक मुकदमा चलेगा या नहीं यह तय करने का अधिकार किशोर न्याय बोर्ड के पास है. अगर बोर्ड को ये लगेगा कि बच्चा जानता था कि इस गलती का क्या परिणाम होगा तो फिर किशोर न्याय कानून के तहत मामले की सुनवाई होती है. नहीं तो मामले को काउंसिलिंग में भेज दिया जाता है और बच्चे को माता-पिता की देखभाल में ही छोड़ दिया जाता है.
किशोर न्याय बोर्ड क्या करता है?
किशोर न्याय अधिनियम 2015 के तहत 18 साल से कम उम्र के बच्चों के मामलों की सुनवाई किशोर न्याय बोर्ड करता है. बोर्ड का काम सिर्फ गलती की सजा देना नहीं है, बल्कि बोर्ड बच्चे की देखरेख, संरक्षण, विकास व सामाजिक पुर्नवास की व्यवस्था करता है. अधिनियम की धारा 10 के अनुसार, पुलिस बच्चे को अपने संरक्षण में लेकर बाल कल्याण पुलिस अधिकारी के जिम्मे रखती है. इन बच्चों को लॉकअप में नहीं रखा जा सकता न ही जेल भेजा जा सकता है. अधिनियम की धारा 12 में जमानत का प्रावधान भी है.