मिट्टी के रावण को पैरों से कुचलते हैं पहलवान, कोटा में 150 साल पुरानी परंपरा
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Unique Ravan Dahan In Kota: कोटा में विजयादशमी पर रावण दहन की अनोखी परंपरा है. यहां जेठी समाज के लोग आग से नहीं, बल्कि मिट्टी से बने रावण को पैरों तले रौंदकर उसका अंत करते हैं. इसके बाद अखाड़े में कुश्ती का दंगल होता है. मिट्टी में दूध, दही, शक्कर और शहद मिलाए जाते हैं, ताकि रावण को कुचलने के बाद होने वाले कुश्ती के दंगल में पहलवानों को चोट लगने की आशंका कम रहे.
कोटा. देशभर में विजयादशमी पर रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व मनाया जाता है, लेकिन कोटा में दशहरे की एक ऐसी परंपरा भी है, जो इसे सबसे अलग बनाती है. यहां जेठी समाज के लोग रावण के पुतले को आग से नहीं जलाते, बल्कि मिट्टी से बने रावण को पैरों तले रौंदकर उसका अंत करते हैं.
नांता स्थित ऐतिहासिक लिम्बजा माता मंदिर के अखाड़े में मंगलवार को यह अनूठी परंपरा निभाई गई. इस दौरान छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्ग पहलवानों तक ने हिस्सा लिया. रावण को कुचलने के बाद अखाड़े में कुश्ती का दंगल भी आयोजित किया गया.
रियासतकाल से चली आ रही परंपरा, कच्छ से कोटा आए थे जेठी पहलवान
जेठी समाज के मंदिर सेवक सोहन जेठी के अनुसार, मिट्टी के रावण को कुचलने की परंपरा रियासतकाल से चली आ रही है. जेठी समाज मूल रूप से गुजरात के कच्छ क्षेत्र का रहने वाला पहलवान समुदाय है. ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, जब कच्छ की राजकुमारी का विवाह कोटा राजघराने में हुआ, तब उनकी सुरक्षा और सेवा के लिए जेठी पहलवान भी उनके साथ कोटा आए थे. पहलवानों की कुश्ती कला और शारीरिक क्षमता से प्रभावित होकर तत्कालीन कोटा दरबार ने उन्हें यहीं बसा दिया. उनके लिए अखाड़ों और समाज की कुलदेवी लिम्बजा माता के मंदिरों की स्थापना करवाई गई. तभी से किशोरपुरा और नांता क्षेत्र में जेठी समाज के लोग अपनी इस विशिष्ट परंपरा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ा रहे हैं.
श्राद्ध पक्ष की अमावस्या से शुरू होती है रावण बनाने की तैयारी
इस परंपरा में मिट्टी के रावण को तैयार करने की प्रक्रिया भी खास होती है. श्राद्ध पक्ष की अमावस्या से ही रावण बनाने का काम शुरू हो जाता है. इसके लिए अखाड़े की मिट्टी का इस्तेमाल किया जाता है. मिट्टी में दूध, दही, शक्कर और शहद मिलाए जाते हैं, ताकि रावण को कुचलने के बाद होने वाले कुश्ती के दंगल में पहलवानों को चोट लगने की आशंका कम रहे. रावण को विशाल और डरावना रूप देने के लिए उसकी मिट्टी पर गेहूं के बीज बोए जाते हैं. नवरात्र के नौ दिनों में ये बीज अंकुरित होकर हरे-भरे हो जाते हैं, जिससे मिट्टी का पुतला अलग और विशाल स्वरूप ले लेता है.
दशहरे पर होती है कुलदेवी की विशेष पूजा
सोहन जेठी के मुताबिक, नवरात्र शुरू होने से पहले ही मंदिर परिसर में रावण बनाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है. इस दौरान मंदिर में आम श्रद्धालुओं का प्रवेश बंद रहता है और भक्त खिड़की से ही लिम्बजा माता के दर्शन करते हैं. विजयादशमी के दिन कुलदेवी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है. इसके बाद समाज के लोग मिट्टी के रावण को देखने के लिए अखाड़े में पहुंचते हैं और परंपरा के अनुसार उसे पैरों से कुचलते हैं. इसके बाद पहलवानों के बीच कुश्ती का आयोजन होता है. समाज के लोग अपने घरों से माता के लिए भोग भी लेकर आते हैं.
रावण मर्दन के साथ पहलवानी की विरासत का भी प्रदर्शन
नांता के लिम्बजा माता मंदिर अखाड़े में होने वाला यह आयोजन केवल रावण को कुचलने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जेठी समाज की ऐतिहासिक पहचान और पहलवानी की परंपरा को भी दर्शाता है. जहां देश के अधिकांश हिस्सों में रावण दहन के जरिए विजयादशमी मनाई जाती है, वहीं कोटा में मिट्टी के रावण का मर्दन और उसके बाद कुश्ती का दंगल सदियों पुरानी विरासत को जीवंत बनाए हुए है. यह परंपरा आज भी नई पीढ़ी को समाज के इतिहास, संस्कृति और अखाड़े की परंपराओं से जोड़ रही है.