नेपाल में सैलाब के 24 दिन बाद भी रास्ते अधूरे… भारत और चीन मिलकर भी क्यों नहीं कर पा रहे मदद?

नेपाल में सैलाब के 24 दिन बाद भी रास्ते अधूरे… भारत और चीन मिलकर भी क्यों नहीं कर पा रहे मदद?


नेपाल में सैलाब आए 24 दिन बीत चुके हैं. बाढ़ में बहे अभी भी हजारों लोगों का पता नहीं चल सका है. कई इलाके ऐसे हैं जो अभी भी कटे हुए हैं. उन तक पहुंचने के लिए बने पुल और सड़कें बह चुकी हैं. खास बात ये है कि भारत और चीन की कई टीमें मिलकर भी नेपाल में हालात पटरी पर नहीं ला पा रही हैं. इसका सबसे बड़ा कारण सैलाब के साथ आया दलदल और चट्टानें बन गईं हैं. खास तौर चीन बॉर्डर की ओर जाने वाली सड़क बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हुई है.

26 अगस्त को नेपाल तिब्बत सीमा पर आई विनाशकारी बाढ़ ने हजारों लोगों की जिंदगी तबाह कर दी थी. इस बाढ़ में नेपाल और चीन के बीच सड़क मार्ग भी प्रभावित हुआ था. दर्जनों सड़कें, पुल और संपर्क मार्ग बह गए थे. कई जगहों पर सड़कें नदी में समा गईं तो कहीं दलदली जमीन और खड़ी चट्टानें मुश्किल बन रही हैं. चीन, भारत और नेपाल की टीमें मिलकर काम कर रही हैं, मगर अब तक सड़कों को दुरुस्त नहीं किया जा सका है. काठमांडू पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक काठमांडु से रसुवा होते हुए रसुवागढ़ी बॉर्डर तक जाने वाला रास्ता तकरीबन 16 किलोमीटर तक बुरी तरह प्रभावित हुआ है.

सड़क खोलने में सबसे बड़ी मुश्किल क्या है?

सड़क विभाग के उप महानिदेशक और प्रवक्ता शुभराज नेउपाने के हवाले से काठमांडू पोस्ट ने लिखा है कि समस्या असल में सिर्फ टूटी सड़क नहीं है. कुछ इलाकों में जमीन इतनी दलदली हो चुकी है कि भारी मशीनें वहां पहुंचते ही धंस जा रही है. कुछ जगहों पर खड़ी चट्टानें और पहाड़ सड़क निर्माण को कठिन बना रहे हैं.

अभी तक गलछी-बिदुर खंड पर कोलपु खोला नदी पर बने पुल की मरम्मत कर उसे फिर से खोल दिया गया है. नेपाली सेना ने देवीघाट पर एक अस्थायी एक्रो पुल स्थापित किया है. देवघाट और त्रिशूली के धुंगे बाजार के बीच के हिस्सों से श्रमिकों ने कीचड़, रेत और मलबा हटा दिया है, लेकिन बेत्रावती के आसपास की सड़क को साफ करना मुश्किल साबित हो रहा है क्योंकि मशीनरी दलदली जमीन में धंस रही है. अधिकारियों के मुताबिक सड़क बनाने के साथ फंसी मशीनों को निकालना पड़ रहा है.

किन हिस्सों में ज्यादा समस्या?

बाढ़ से सबसे ज्यादा नुकसान गेरखुटार में हुआ है, जहां डेढ़ किलोमीटर से ज्यादा सड़क गायब हो गई है. भैंसे की मुख्य सड़क ही पूरी तरह नष्ट है. दोनों कस्बों को जोड़ने वाली सड़क को भी नुकसान पहुंचा है, जहां तकरीबन आधा किलोमीटर की सड़क बह गई है. कई स्थानों पर सड़क के नीचे की जमीन नदी बहाकर ले गई है, जिससे पूरा का पूरा मार्ग ही ध्वस्त हो गया है. राहत टीमों ने कुछ जगहों पर वैकल्पिक ट्रैक बनाकर यातायात शुरू किया है.

भारत और चीन कैसे कर रहे मदद?

भारत अब तक तीन 70 मीटर लंबे बेली ब्रिज उपलब्ध करा चुका है, जबकि चीन ने 100 मीटर लंबे दो बेलीब्रिज दिए हैं. नेपाल के पास भी 70 मीटर लंबे तीन बेली ब्रिज मौजूद हैं. इसके अलावा सड़क विभाग के पास 48 मीटर तक के अस्थायी पुल हैं, फिलहाल जिनकी मदद से सड़कों को दुरुस्त करने का काम चल रहा है.इनमें भारत से मिले ब्रिज को बेत्रावी के फलाखु खोला में लगाया जा रहा है, काम पूरा होने के बाद रसुवा और नुवाकोट के बीच सीधा सड़क संपर्क मार्ग बहाल हो जाएगा.

बेली ब्रिज क्या होता है?

यह पहले से तैयार स्टील का पुल होता है, जिसके फ्रेम होते हैं. बेहद कम समय में जोड़कर इसे तैयार किया जा सकता है. युद्ध, प्राकृतिक आपदा या आपातकालीन परिस्थितियों में इसका व्यापक उपयोग किया जाता है क्योंकि इसे भारी निर्माण कार्य के बिना जल्दी स्थापित किया जा सकता है. नेपाल में फिलहाल इन्हीं पुलों के सहारे सड़क संपर्क बहाल करने की कोशिश कर रहा है.

अक्टूबर तक खोलना है दशैं बॉर्डर

नेपाल सरकार का लक्ष्य अक्टूबर के दूसरे सप्ताह में शुरू होने वाले दशैं पर्व से पहले चीन सीमा तक सड़क संपर्क बहाल करना है. रसुवागढ़ी नेपाल-चीन व्यापार का प्रमुख रास्ता है.यह कैलाश-मानसरोवर यात्रा, सीमा व्यापार और चीन से आने वाले सामानों की आपूर्ति के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है.अगर यह मार्ग लंबे समय तक बंद रहता है तो व्यापार, पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर पड़ सकता है. नेपाल के अवसंरचना विकास मंत्रालय ने चीन से रसुवागढ़ी सीमा की ओर से स्याब्रुबेसी तक सड़क ट्रैक खोलने में मदद मांगी है.

सबसे बड़ी चुनौती फुर्के खोला पुल क्यों है?

बाढ़ में फुरके खोला पर बना स्थायी पुल भी बह गया, जो धादिंग जिला मुख्यालय तक सीधा संपर्क देता था. विशेषज्ञों के मुताबिक यहां 94 मीटर लंबा पुल जरूरी है. नेपाल के अवसंरचना विकास मंत्रालय के संयुक्त सचिव सुशील बाबू ढकाल के मुताबिक चीन से 100 मीटर लंबा पुल मिला है उसे फुरके नदी पर नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि इसके लिए बीच में एक सहारा चाहिए होगा. ऐसा हो सकता है या नहीं इसके लिए चीन के दो इंजीनियर वहां पहुंचे हैं. यदि पुल नहीं फिट होता तो नया पुल बनेगा. इस वजह से नेपाल ने संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका और फ्रांस से भी लंबे पुल मांगे हैं.



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