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Koderma Gumo 500 Year Old Durga Puja: कोडरमा के गुमो में 500 वर्षों से अधिक पुरानी सार्वजनिक दुर्गा पूजा की परंपरा चली आ रही है. यहां 150 साल पुरानी हस्तलिखित संस्कृत पुस्तक से विशेष पूजा होती है और नवमी पर बड़े पैमाने पर बलि दी जाती है. जानते हैं इस यूनिक ट्रेडिशन के बारे में.
कोडरमा. कोडरमा जिले के गुमो में आयोजित होने वाली सार्वजनिक दुर्गा पूजा की परंपरा सदियों पुरानी है. यहां दुर्गा पूजा केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि गांव की ऐतिहासिक विरासत, आस्था और सांस्कृतिक परंपराओं का प्रतीक भी है. सार्वजनिक दुर्गा पूजा समिति गुमो का इतिहास 500 वर्ष से भी अधिक पुराना बताया जाता है. यहां आज भी कई ऐसी परंपराओं का निर्वहन किया जाता है, जो इस पूजा को विशिष्ट पहचान दिलाती हैं. इनमें करीब 150 वर्ष पुरानी हस्तलिखित संस्कृत पुस्तक से विशेष मंत्रों के साथ पूजा-अर्चना और नवमी के दिन बड़े पैमाने पर पाठा की बलि देने की परंपरा प्रमुख है.
राजा परिवार के बाद ब्राह्मण परिवार ने संभाली पूजा
समिति के मुख्य पुजारी दशरथ पांडे ने विशेष बातचीत में बताया कि गुमो में दुर्गा पूजा की शुरुआत राजा परिवार के द्वारा की गई थी. राजा परिवार ने करीब 300 वर्षों तक इस परंपरा का निर्वहन किया और दुर्गा पूजा का आयोजन कराया. इसके बाद पूजा की जिम्मेदारी सतघरवा ब्राह्मण परिवार ने संभाली. इस परिवार के द्वारा भी करीब 250 वर्षों तक पूजा का आयोजन किए जाने की परंपरा रही है. इस प्रकार पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती रही यह धार्मिक परंपरा आज भी लोगों की आस्था का केंद्र बनी हुई है.
150 साल पुरानी हस्तलिखित पुस्तक से होती है पूजा
गुमो की दुर्गा पूजा की सबसे खास विशेषताओं में से एक यहां सुरक्षित रखी गई प्राचीन हस्तलिखित संस्कृत पुस्तक है. मुख्य पुजारी दशरथ पांडे के अनुसार करीब 150 वर्ष पहले स्वर्गीय बालेश्वर पांडे ने संस्कृत में हस्तलिखित पुस्तक की रचना की थी. इसी पुस्तक में लिखे मंत्रों और विधि-विधान के आधार पर आज भी दुर्गा पूजा के दौरान विशेष अनुष्ठान संपन्न कराए जाते हैं. उन्होंने बताया कि सप्तमी से लेकर दशमी तक इसी प्राचीन पुस्तक के माध्यम से विशेष मंत्रों के साथ मां दुर्गा की पूजा अर्चना कराई जाती है. स्वर्गीय बालेश्वर पांडे के बाद उनके पुत्र स्वर्गीय नरसिंह पांडे ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया और कई वर्षों तक इसी पुस्तक के आधार पर पूजा कराई.
नवरात्र के पहले दिन से नवमी तक होती है बलि
गुमो की दुर्गा पूजा में बलि देने की परंपरा भी विशेष रूप से प्रचलित है. दशरथ पांडे ने बताया कि नवरात्र के पहले दिन कलश स्थापना के साथ ही बलि देने का सिलसिला शुरू हो जाता है. जो नवमी तक जारी रहता है. इस दौरान प्रतिदिन पाठा की बलि दी जाती है. नवमी के दिन इस परंपरा का व्यापक स्वरूप देखने को मिलता है. इस दिन पूरे गांव के लोग गुमो गढ़ में बलि देते हैं और करीब 2400 बकरों की बलि दी जाती है.
शादी के बाद बेटियों की संतानों का पहला मुंडन दुर्गा मंडप में
गुमो गांव की एक और अनूठी परंपरा यहां की पारिवारिक और सामाजिक संस्कृति से जुड़ी हुई है. दशरथ पांडे ने बताया कि गांव की जिन बेटियों की शादी हो जाती है. उनकी संतानों का पहला मुंडन संस्कार दुर्गा पूजा के दौरान दुर्गा मंडप परिसर में कराया जाता है. इस परंपरा के तहत शादी के बाद गांव से विदा हुई बेटियां अपनी संतानों के साथ दुर्गा पूजा के अवसर पर मायके आती हैं और मंडप परिसर में मुंडन संस्कार संपन्न कराती हैं.