Sindoor Khela 2026 today Why Bengali Women Play With Vermilion and Perform Dhunuchi Naach | क्या है सिंदूर खेला की परंपरा? विदाई से पहले क्यों करते है

Sindoor Khela 2026 today Why Bengali Women Play With Vermilion and Perform Dhunuchi Naach | क्या है सिंदूर खेला की परंपरा? विदाई से पहले क्यों करते है


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क्या है सिंदूर खेला की परंपरा? माता की विदाई से पहले क्यों करते धुनुची नृत्‍य

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Sindoor Khela 2026: आज दुर्गा पूजा का अंतिम दिन है और इस दिन सुहागिन महिलाएं सिंदूर खेला की रस्म निभाती हैं. दुर्गा विसर्जन से ठीक पहले बंगाली समुदाय में सिंदूर खेला की परंपरा बहुत खास मानी जाती है. विजया दशमी के दिन मां दुर्गा को विदा करने से पहले सुहागिनें एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं और मां से अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मांगती हैं. इस रस्म के दौरान चेहरे पर पान का पत्ता रखने और प्रसिद्ध धुनुची नृत्य करने का भी विशेष धार्मिक महत्व होता है, जो उत्सव के उल्लास को और बढ़ा देता है.

Sindoor Khela 2026: नवमी तिथि के साथ ही शक्ति उपासना संपन्न हो गई है. दुर्गा पूजा के अंतिम दिन, 20 अक्टूबर को देशभर में धूमधाम से दशहरे का त्योहार मनाने की तैयारी की जा रही है. इस वर्ष पश्चिम बंगाल में बड़े पैमाने पर दुर्गा पूजा की गई. विजयादशमी पर मां दुर्गा की प्रतिमा के विसर्जन से ठीक पहले बंगाल में ‘सिंदूर खेला’ की रस्म पूरी की जाती है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्र के दौरान मां दुर्गा अपने मायके अर्थात पृथ्वी लोक पर आती हैं और विजयादशमी के दिन भगवान शिव के धाम लौट जाती हैं. इसी भाव के साथ दुर्गा पूजा के अंतिम दिन कई स्थानों पर विशेष विदाई अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं.

‘सिंदूर खेला’ की परंपरा में विवाहित महिलाएं मां दुर्गा की प्रतिमा के चरणों और मस्तक पर सिंदूर अर्पित करती हैं. इसके बाद वे एक-दूसरे को भी सिंदूर लगाकर सुख, सौभाग्य और समृद्धि की कामना करती हैं. इस अनुष्ठान के दौरान पान के पत्ते से देवी के मुख का स्पर्श कर उन्हें भावपूर्ण विदाई दी जाती है. इस रस्म को ‘देवी बोरोन’ कहा जाता है.

देवी मां को सिंदूर चढ़ाने के बाद महिलाएं एक-दूसरे के माथे, गालों और चेहरे पर सिंदूर लगाती हैं और एक-दूसरे के सुहाग के सौभाग्य की कामना करते हैं. ‘सिंदूर खेला’ के दौरान महिलाएं पारंपरिक तौर पर लाल रंग की बॉर्डर वाली सफेद साड़ी और चूड़ी पहनती हैं. ‘सिंदूर खेला’ बंगाली संस्कृति में ‘स्त्री शक्ति’, एकता और उत्साह का प्रतीक है. ‘सिंदूर खेला’ रस्म की परंपरा लगभग 400 वर्षों पुरानी है. अब यह रस्म बंगाल ही नहीं, देश और विदेशों में बंगाली समुदायों के बीच पहुंच चुकी है.

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इस उत्सव में विधवा, किन्नर, या तलाकशुदा महिलाओं को शामिल नहीं किए जाने की परंपरा रही, लेकिन सामाजिक बदलाव के कारण कुछ वर्षों से सभी महिलाएं ‘सिंदूर खेला’ उत्सव में शामिल होती हैं. इस दौरान धुनुची नृत्य किया जाता है. धुनुची नृत्‍य भी धीरे-धीरे पूरे देश में मनाया जाने लगा है. मान्यता है कि इस नृत्य से मां दुर्गा प्रसन्न होती हैं. मां की विदाई के वक्त बंगाल में मुंबई में सेलिब्रिटी भी बड़े पैमाने पर ‘सिंदूर खेला’ रस्म का हिस्सा बनते हैं.

दुर्गा पूजा में सिंदूर खेला, धुनुची नृत्य और देवी बोरोन की परंपराओं का विशेष महत्व होता है. सिंदूर खेला विजयादशमी के दिन विवाहित महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करने के बाद एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं. धुनुची नृत्य में भक्त धूप और नारियल की भूसी से भरे धुनुची पात्र को लेकर मां दुर्गा के सामने नृत्य करते हैं. यह भक्ति और श्रद्धा की अभिव्यक्ति है. वहीं, देवी बोरोन में महिलाएं मां दुर्गा को मिठाई, पान और सिंदूर अर्पित कर भावपूर्ण विदाई देती हैं. यह परंपरा मां के मायके से विदा होने का प्रतीक मानी जाती है.

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