माई नेम इज शमी एंड आई एम ए बॉलर, अब सेलेक्टर्स के सामने होगा ये तख्ती
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my name is shami: बॉलीवुड में बहुत पहले शाहरुख खान की एक फिल्म आई थी जिसमें वो चीख-चीखकर कहते है माई नेम इज खान एंड आई एम नॉट ए टेररिस्ट. ठीक वैसे ही इन दिनों देश के हर मैदान पर शमी जोर जोर से कह रहे है कि माई नेम इज शमी एंड आई एम ए बॉलर पर किसी के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही. अब सवाल ये खड़ा होता है कि शमी ने ऐसा क्या किया है जो उनका नाम आते ही सेलेक्टर्स मुंह फेर ले रहे है
शमी के सेलेक्शन पर नहीं रिजेक्शन पर उठने लगे है बड़े सवाल
नई दिल्ली. कभी काम से पहचान बनाने की बात होती थी और इंसान तभी औरों से अलग माना जाता था जब उनका काम बड़ा होता था पर ये बात इन दिनों क्रिकेट के मैदान पर लागू नहीं होती क्योंकि अब तो ये लगने लगा है कि नाम की वजह से उनके काम को तब्जो नहीं मिल रही है. तीनों फार्मेट के लिए 40 दिन के दौरे पर भारतीय टीम न्यूजीलैंड में रहेगी और इस दौरान हर मैच के बाद एक शक्स पर लगातार चर्चा होती रहेगी. वैसे तो इस शख्सियत को पहचान की जरूरत नहीं है फिर भी जान लीजिए बात मोहम्मद शमी की हो रही है.
बॉलीवुड में बहुत पहले शाहरुख खान की एक फिल्म आई थी जिसमें वो चीख-चीखकर कहते है माई नेम इज खान एंड आई एम नॉट ए टेररिस्ट. ठीक वैसे ही इन दिनों देश के हर मैदान पर शमी जोर जोर से कह रहे है कि माई नेम इज शमी एंड आई एम ए बॉलर पर किसी के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही. अब सवाल ये खड़ा होता है कि शमी ने ऐसा क्या किया है जो उनका नाम आते ही सेलेक्टर्स मुंह फेर ले रहे है और किसी भी कप्तान को उनकी जरूरत नहीं लग रही है.
माई नेम इज़ मोहम्मद शमी बट नॉट ए ओल्डमैन?
एक बात स्वीकार करनी होगी 36 साल की उम्र में तेज़ गेंदबाज़ की फिटनेस पर सवाल उठना जायज़ है. टेस्ट क्रिकेट में लगातार लंबे स्पेल डालना और पाँच दिन तक शारीरिक दबाव झेलना आसान नहीं होता. रणजी ट्रॉफ़ी में चार विकेट लेना उनकी मौजूदा गेंदबाज़ी की क्षमता का प्रमाण है, लेकिन इससे यह अपने आप साबित नहीं होता कि वह अंतरराष्ट्रीय टेस्ट क्रिकेट का पूरा दबाव झेलने के लिए पूरी तरह तैयार हैं. चयनकर्ताओं के पास फिटनेस, चोट और कार्यभार से जुड़ी ऐसी जानकारियाँ हो सकती हैं, जो आम प्रशंसकों के पास नहीं हैं. आकाशदीप और अंशुल कंबोज जैसे गेंदबाज़ों को मौक़ा देना भी ग़लत नहीं है. युवा खिलाड़ियों को तैयार करना ज़रूरी है लेकिन अनुभवी गेंदबाज़ की दावेदारी पर सवाल उठाना भी उतना ही जायज़ है.
शमी का मौजूदा फॉर्म
भारत में नए सीजन का आगाज हो चुका है है और रणजी ट्रॉफ़ी में दिल्ली के ख़िलाफ़ शमी ने 17.3 ओवर में 30 रन देकर चार विकेट लिए नौ ओवर मेडन रहे. यह किसी भी तेज़ गेंदबाज़ के लिए प्रभावशाली प्रदर्शन है. इससे पहले 2025-26 के रणजी सीज़न में उन्होंने सात मैचों में 37 विकेट लिए. औसत 16.72 रहा और तीन बार एक पारी में पाँच विकेट हासिल किए. घरेलू क्रिकेट में यह प्रदर्शन उनकी गेंदबाज़ी की धार का मज़बूत प्रमाण है. हालाँकि, सीमित ओवरों की तस्वीर कुछ अलग है. सैयद मुश्ताक़ अली ट्रॉफ़ी में उन्होंने 16 विकेट और विजय हज़ारे ट्रॉफ़ी में 15 विकेट लिए यानी शमी का हालिया प्रदर्शन हर फ़ॉर्मेट में शानदार रहा लेकिन सेलेक्टर्स का उनके बारे में चर्चा करना किसी को भी नहीं पच रहा.
किवी टीम के खिलाफ शमी का रिकॉर्ड
मोहम्मद शमी ने तीन बार न्यूज़ीलैंड 2014 और 2020 का दौरा किया और इन दौरो पर उन्होंने चार टेस्ट खेले. कीवी परिस्थितियों में टेस्ट क्रिकेट खेलने का अनुभव उनके पास है. 2019 के न्यूज़ीलैंड वनडे दौरे पर भी उन्होंने नौ विकेट लेकर अपनी उपयोगिता साबित की थी. 2023 वर्ल्ड कप का सेमीफ़ाइनल कौन भूल सकता है? न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ 7/57 के उनके स्पेल ने भारत को फ़ाइनल में पहुँचाने में निर्णायक भूमिका निभाई. पूरे टूर्नामेंट में 24 विकेट लेकर शमी सबसे ज़्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाज़ बने थे. शमी ने ऑस्ट्रेलिया में 2014-15, 2018-19 और 2020-21 के दौरों पर शमी ने कुल आठ टेस्ट खेले और 31 विकेट हासिल किए. पर्त में 2018 के टेस्ट में 6/56 का उनका प्रदर्शन उनकी बेहतरीन गेंदबाज़ी की मिसाल है.
ये रिकॉर्ड बताते हैं कि बड़े मुक़ाबलों में शमी ने भारत को बार-बार विकेट दिलाए हैं.
शमी का चयन होना चाहिए था या नहीं, इस पर बहस हो सकती है. उनका IPL प्रदर्शन उनके पक्ष में नहीं जाता, लेकिन रणजी ट्रॉफ़ी का हालिया प्रदर्शन और 2025-26 का शानदार प्रथम श्रेणी रिकॉर्ड उनकी दावेदारी को मज़बूत करते हैं. उनके पूरे करियर को देखें, तो ऑस्ट्रेलिया में विकेटों का रिकॉर्ड, न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ टेस्ट अनुभव और 2023 वर्ल्ड कप में उनका ऐतिहासिक प्रदर्शन भी सामने आता है. आख़िर क्रिकेट में चयन सिर्फ़ अतीत के नाम पर नहीं, मौजूदा प्रदर्शन, फिटनेस और भविष्य की तैयारी पर होता है लेकिन किसी खिलाड़ी के अतीत और वर्तमान, दोनों का ईमानदारी से आकलन करना भी उतना ही ज़रूरी है जो शायद के केस में नहीं हो रहा जिसकी वजह से संशय के बादल सेलेक्टर्स पर लगातार मंडरा रहे है.