पत्नी ने साथ रहने के लिए मांगा अलग घर और खर्च, हाईकोर्ट ने खारिज की अर्जी
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में महिला की उस मांग को खारिज कर दिया जिसमें वाह पति के साथ रहने के लिए मेंटीनेंस और अलग घर की मांग कर रही थी. फर्रुखाबाद परिवार न्यायालय पहले ही पति के पक्ष में फैसला सुना चुका था. जानिए क्या है पूरा मामला और इस मामले में क्या कहता है कानून?
इलाहाबाद कोर्ट ने महिला की मांग खारिज कर दी है.
किसी भी पति और पत्नी के बीच विवाद के दौरान सबसे बड़ी लड़ाई मेंटीनेंस को लेकर होती है. ज्यादातर मामलों में अगर पत्नी भरण पोषण की मांग करती है तो पति को उसे देना पड़ता है. हालांकि अगर पति रखने को तैयार है, पत्नी साथ रहना चाहती है, फिर भी अलग घर और खर्चे की मांग करे तो कानून उसे ठुकरा भी सकता है. हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक ऐसे ही मामले में कोर्ट ने महिला की अर्जी खारिज कर दी. वह अपने पति के साथ रहने के लिए अलग घर और खर्च की मांग कर रही थी.
मामले में फर्रुखाबाद की फैमिली अदालत ने पत्नी के दावे को खारिज कर पति के पक्ष में फैसला सुनाया था. इसके बाद महिला ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में फैसले के पुनरीक्षण की अर्जी दाखिल की थी, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया. पीड़ित पति ने यहां भी दोहराया कि वह पत्नी को साथ रखने के लिए तैयार है, मगर पत्नी ऐसा करने के लिए मकान और अतिरिक्त खर्च मांग रही है. मामले की सुनवाई जस्टिस लक्ष्मी कांत शुक्ल ने की.
क्या है पूरा मामला
मामला फर्रुखाबाद का है. यहां फैमिली कोर्ट में पति-पत्नी के बीच विवाद चल रहा था. पति महिला को साथ रखने के लिए तैयार था. मगर महिला साथ रहने के लिए सेक्शन-125 के तहत एक अलग घर और मेंटीनेंस की मांग कर रही थी. फर्रुखाबाद परिवार न्यायालय ने इस मामले में पति के पक्ष में फैसला सुनाया था. इसके बाद महिला ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी. यहां पीड़ित पति की ओर से अधिवक्ता रवितेंद्र प्रताप चंदेल और अंकिता तिवारी ने दलीलें दीं. हाईकोर्ट ने निचली अदालत के आदेश में हस्तक्षेप को जरूरी नहीं माना और महिला की याचिका खारिज कर दी.
क्या है भरण पोषण का कानून?
अधिवक्ता अंकिता तिवारी ने बताया कि CrPC सेक्शन-125 के तहत दिए जाने वाले भरण पोषण का उद्देश्य ऐसे व्यक्ति को सहायता देना है जो अपनी जरूरतें पूरी नहीं कर सकता. चाहे पति-पत्नी साथ रहें या अलग. भारतीय न्याय संहिता में इसे सेक्शन 144 के तौर पर बताया गया है. इसमें पत्नी ही नहीं बच्चों और माता-पिता के लिए भी भरण पोषण की व्यवस्था है. जब कोई वाद दायर करता है तो अदालत यह देखती है कि दावा करने वाले व्यक्ति की आर्थिक स्थिति क्या है. दूसरे पक्ष के पास सहायता देने के पर्याप्त साधन हैं या नहीं.
पति के साथ रहने से खत्म हो जाता है मेंटीनेंस का अधिकार?
एडवोकेट अंकिता तिवारी के मुताबिक अगर पति अपनी पत्नी को साथ रखने के लिए तैयार है तो पत्नी का मेंटीनेंस का अधिकार खत्म नहीं होता. असल में कोर्ट ये देखती है कि क्या पत्नी बिना पर्याप्त कारण पति के साथ रहने से इनकार कर रही है या साथ रहने पर भी बिना कारण ही मेंटीनेंस मांग रही है. घरेलू हिंसा, उत्पीड़न, असुरक्षा व अन्य कारण भी हो सकते हैं. इसलिए अदालत को दोनों पक्षों की दलीलें और उपलब्ध साक्ष्य देखने होते हैं. केवल पति के बयान या पत्नी की किसी एक मांग के आधार पर निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता.
क्या पत्नी अलग घर मांग सकती है?
कानून में ऐसा कोई नियम नहीं है जो पत्नी को अलग घर मांगने का अधिकार देता है. यह परस्थितियों पर निर्भर करता है. यदि वैवाहिक घर में कोई खतरा है, गंभीर विवाद है तो महिला अलग रहने की मांग कर सकती है. हालांकि अदालत इसके पीछे मंशा देखती है, कि आखिर दोनों पक्षों की आर्थिक स्थिति क्या है और कानून के तहत किस तरह की सहातया दी जानी चाहिए.