दिव्यांगों और बुजुर्गों के लिए बड़ी सौगात, 7 करोड़ की इस पहल से संवरेगी जिंदगी
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दिव्यांगजनों और वरिष्ठ नागरिकों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक बड़ा कदम उठाया गया है. एएलआईएमसीओ और एचयूआरएल के बीच 7 करोड़ रुपये के समझौते के तहत गोरखपुर केंद्र को मजबूत किया जाएगा. साथ ही, बिहार के बरौनी और झारखंड के सिंदरी में स्पेशल कैंप लगाए जाएंगे. इस पहल के जरिए जरूरतमंदों को कृत्रिम अंग, व्हीलचेयर और सुनने की मशीन जैसे उपकरण मुहैया कराए जाएंगे. साथ ही उपकरणों की मरम्मत और रखरखाव की सुविधा भी दी जाएगी.
दिव्यांगजनों और वरिष्ठ नागरिकों को सहायक उपकरण वितरित किए जाने की योजना के तहत गोरखपुर, बरौनी और सिंदरी में विशेष शिविर लगेंगे.
नई दिल्ली. दिव्यांगजनों और बुजुर्गों की जीवन को आसान बनाने के लिए एक बड़ी पहल की गई है. इस पहल के तहत दिव्यांगजनों और बुजुर्गों को उनकी जरूरत के हिसाब से व्हीलचेयर, कृत्रिम अंग, सुनने की मशीन सहित दूसरे जरूरी उपकरण मुहैया कराए जाएंगे. इस पहल को अमलीजामा पहनाने के लिए भारतीय कृत्रिम अंग निर्माण निगम (एएलआईएमसीओ) और हिंदुस्तान उर्वरक एवं रसायन लिमिटेड (एचयूआरएल) ने हाथ मिलाया है. दोनों कंपनियों ने 7 करोड़ रुपये के इस खास पहल के लिए एमओयू पर हस्ताक्षर भी किए हैं. दोनों संस्थाएं यह पहल को सीएसआर के तहत पूरा करेंगी. इस पहल का मकसद दिव्यांगजनों और उम्र बढ़ने के साथ चलने-फिरने या दूसरे काम करने में परेशानी का सामना कर रहे बुजुर्गों की मदद करना है. इस पहले के तहत उन्हें ऐसे उपकरण दिए जाएंगे, जिनसे उनकी रोजमर्रा की जिंदगी आसान हो सके. वे अपनी जरूरत के कई काम खुद कर सकें और दूसरों पर उनकी निर्भरता कम हो.
गोरखपुर, बरौनी और सिंदरी में मिलेगी मदद
इस प्रोजेक्ट के तहत उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में काम किया जाएगा. सबसे पहले गोरखपुर में बने प्रधानमंत्री दिव्याशा वयोश्री केंद्र को मजबूत किया जाएगा. इसके साथ ही बिहार के बरौनी और झारखंड के सिंदरी में कैंप लगाए जाएंगे. इन कैंपों में दिव्यांगजनों और उम्र से जुड़ी शारीरिक परेशानियों का सामना कर रहे बुजुर्गों को उनकी जरूरत के उपकरण दिए जाएंगे.इस पूरे प्रोजेक्ट के लिए एचयूआरएल अपने सीएसआर फंड से 7 करोड़ रुपये देगा. इस समझौते पर दोनों संस्थानों के बड़े अधिकारियों की मौजूदगी में साइन किए गए. इनमें एएलआईएमसीओ के चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर (सीएमडी) और एचयूआरएल के मैनेजिंग डायरेक्टर (एमडी) शामिल रहे.
किसी को व्हीलचेयर तो किसी को मिलेंगे कृत्रिम अंग
- इस योजना में सभी लोगों को एक जैसे उपकरण नहीं दिए जाएंगे. पहले यह देखा जाएगा कि किस व्यक्ति को किस तरह की मदद की जरूरत है. इसके लिए पात्र लोगों की पहचान की जाएगी.
- उनकी शारीरिक स्थिति का आकलन होगा और जरूरी दस्तावेजों की जांच की जाएगी. इसके बाद उनकी जरूरत के हिसाब से उपकरण दिए जाएंगे.
- इन उपकरणों में कृत्रिम अंग, ऑर्थोसिस, व्हीलचेयर और सुनने की मशीन शामिल हैं. ऑर्थोसिस ऐसे उपकरण होते हैं, जो शरीर के प्रभावित अंग को सहारा देते हैं. इसके अलावा दूसरे जरूरी उपकरण भी दिए जाएंगे.
- अगर किसी व्यक्ति को खास तरह के उपकरण की जरूरत है, तो उसमें जरूरी बदलाव भी किए जा सकेंगे. उपकरण को उस व्यक्ति की शारीरिक जरूरत के हिसाब से तैयार किया जाएगा. इससे उसे इस्तेमाल करने में आसानी होगी.
उपकरण मिलने के बाद भी मिलेगी मदद
- इस प्रोजेक्ट में सिर्फ उपकरण बांटकर जिम्मेदारी खत्म नहीं की जाएगी. उपकरणों के इस्तेमाल के बाद आने वाली परेशानियों का भी ध्यान रखा जाएगा.
- अगर किसी उपकरण की मरम्मत की जरूरत पड़ती है, तो उसमें मदद मिलेगी. इसके रखरखाव और बाद की सर्विस के लिए भी जरूरी सहायता दी जाएगी.
- इसका मकसद यह है कि लोगों को मिले उपकरण लंबे समय तक उनके काम आ सकें. उन्हें छोटी-मोटी परेशानी आने पर बार-बार नई व्यवस्था करने की जरूरत न पड़े.
कैसे होगा होगा लाभार्थियों का चयन?
योजना का फायदा किन लोगों को मिलेगा, इसका फैसला तय नियमों के आधार पर होगा. इसके लिए जिला प्रशासन, स्थानीय अधिकारियों और संबंधित एजेंसियों के साथ मिलकर काम किया जाएगा. पहले लोगों की जरूरत देखी जाएगी. इसके बाद उनकी पात्रता और दस्तावेजों की जांच होगी. इस प्रक्रिया के बाद ही उपकरण देने की व्यवस्था की जाएगी.
क्या इस मुहिम से आसान होगा रोजमर्रा के काम?
लआईएमसीओ और एचयूआरएल ने इस पहल के जरिए दिव्यांगजनों और बुजुर्गों की जिंदगी आसान बनाने पर जोर दिया है. सही उपकरण मिलने से उन्हें चलने-फिरने और रोज के काम करने में मदद मिल सकती है. वे ज्यादा आत्मविश्वास के साथ अपनी जिंदगी जी सकेंगे. दोनों संस्थानों का कहना है कि दिव्यांगजनों और बुजुर्गों तक उनकी जरूरत के उपकरण पहुंचाना जरूरी है. इससे उन्हें अपने काम करने में आसानी होगी और समाज में उनकी भागीदारी भी बढ़ेगी.