फरीदाबाद एनआईटी दशहरा ग्राउंड: झूला लगाने की नहीं मिली मंजूरी, ट्रॉलियों में बंधा सामान, 15 दिन से बेहाल 200 मजदूर परिवार

फरीदाबाद एनआईटी दशहरा ग्राउंड: झूला लगाने की नहीं मिली मंजूरी, ट्रॉलियों में बंधा सामान, 15 दिन से बेहाल 200 मजदूर परिवार


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Dussehra Mela Faridabad: फरीदाबाद के एनआईटी दशहरा ग्राउंड में इस बार त्योहार की खुशियों पर सन्नाटा पसरा है. फिरोजाबाद और ग्वालियर से आए करीब 200 झूला कर्मियों को प्रशासन ने झूले लगाने की अनुमति नहीं दी. पिछले 15 दिनों से परिवार और बच्चों संग खुले आसमान नीचे फंसे इन मजदूरों की जमा-पूंजी खत्म हो चुकी है. अब दाने-दाने और घर लौटने के किराये के लिए मोहताज इन परिवारों के सामने रोजी-रोटी का गंभीर संकट खड़ा है.

Dussehra Mela Faridabad: 20 अक्टूबर को पूरे देश में दशहरा जहां पूरे देश में धूमधाम और उत्साह के साथ मनाया जाएगा. वहीं फरीदाबाद के एनआईटी दशहरा ग्राउंड में इस बार सन्नाटा और बेबसी पसरी है. दरअसल, दूर-दराज के जिलों से रोजी-रोटी की उम्मीद लेकर पहुंचे सैकड़ों झूला कर्मियों के त्योहार पर प्रशासनिक पाबंदियों ने पानी फेर दिया है. न जेब में पैसे बचे हैं, न सिर पर छत, और 15 दिनों से ट्रॉलियों में बंद पड़े झूलों के बीच ये मजदूर परिवार अब दाने-दाने और घर वापसी के किराए के लिए मोहताज हैं.

प्रशासन की रोक और खुले आसमान के नीचे बेबसी
किसी को झूले लगाने की इजाजत नहीं मिली, तो किसी के सामने घर लौटने के खर्च की चिंता है. पिछले 15 दिनों से ये लोग खुले आसमान के नीचे रह रहे हैं. झूले ट्रॉलियों में रखे हैं और कमाई का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा है. लोकल18 की टीम ने एनआईटी दशहरा ग्राउंड पहुंचकर इन लोगों से बातचीत की.

पैसे खत्म, मंदिरों के प्रसाद पर गुजारा: अरविंद
झूला लगाने आए अरविंद बताते हैं कि मैं करीब 15 से 16 दिन पहले यहां आया हूं. हर साल दशहरे के दौरान झूले लगाकर ही हमारा खर्च चलता है. इस बार प्रशासन ने झूले लगाने से मना कर दिया है. मेरे पास जो पैसे थे, वे भी खत्म हो चुके हैं. अब मंदिरों में प्रसाद खाकर गुजारा करना पड़ रहा है. वापस जाने के लिए भी हजारों रुपये किराया देना होगा.

कमाई नहीं हुई तो कैसे चलेगा घर: मौसम देवी
झूला लगाने आईं मौसम देवी बताती हैं कि वे हर साल यहां आती हैं, लेकिन इस बार झूले लगाने की अनुमति नहीं मिली. आने में करीब 10 हजार रुपये खर्च हो चुके हैं. अब कमाई नहीं होगी, तो घर कैसे चलेगा. परिवार के लोग झूले समेटने में लगे हैं और बच्चे भी हमारे साथ परेशानियों के बीच रह रहे हैं.

बीमारी और खर्च के दोहरे संकट में मीना का परिवार
मीना बताती हैं कि परिवार के साथ यहां आए 15 दिन हो चुके हैं. खाने-पीने और रहने की परेशानी है. पति झूले खोलने के दौरान बीमार पड़ गए हैं. छोटे बच्चों के साथ खुले आसमान के नीचे रहना मुश्किल हो रहा है. घर लौटने और परिवार का खर्च चलाने की चिंता है.

किराया भी डूबा, कमाई पूरी तरह बंद: हरीबाबू
ग्वालियर से आए हरीबाबू नाव वाला झूला लगाने पहुंचे थे. वे बताते हैं कि आने-जाने और किराये में करीब 12 हजार रुपये खर्च हो चुके हैं. दशहरे के दौरान झूले लगाना ही मेरा रोजगार है, लेकिन इस बार झूले नहीं लगा पाने से कमाई बंद हो गई है.



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