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Success Story : महेंद्र के कारोबारी सफर की शुरुआत नवंबर 2009 में बेंगलुरु के गांधी बाजार से हुई थी. एक इमारत की सीढ़ियों के नीचे मुश्किल से 30 वर्ग फुट की जगह में यूएस महेंद्र ने एक छोटा सा कॉफी काउंटर खोला. वे केवल पांच रुपये में कॉफी बेचते थे.
महेंद्र के कारोबारी सफर की शुरुआत नवंबर 2009 में बेंगलुरु के गांधी बाजार से हुई थी.
नई दिल्ली. बेंगलुरु के गांधी बाजार में सीढियों के नीचे महज 30 वर्ग फुट की जगह और हाथ में 5 रुपये का एक छोटा सा कप. आज 180 करोड़ रुपये के एंपायर में बदल चुकी हट्टी कापी की शुरुआत कुछ ऐसे ही हुई थी. जिस दौर में लोग अपनी दुकान के इंटीरियर और फैंसी नामों के पीछे भाग रहे थे, वहीं कर्नाटक के हासन से आए यूएस महेंद्र ने सिर्फ एक चीज पर भरोसा किया. वह था असली देसी फिल्टर कॉफी का दम. और आज उसी भरोसे का नतीजा है कि उनकी फिल्टर कॉफी हट्टी कापी (Hatti Kaapi) इंफोसिस के टेक पार्कों से लेकर एयरपोर्ट्स तक अपना जलवा बिखेर रही है. कन्नड़ भाषा में हट्टी का अर्थ होता है घर और कापी का मतलब कॉफी है.
महेंद्र के कारोबारी सफर की शुरुआत नवंबर 2009 में बेंगलुरु के गांधी बाजार से हुई थी. एक इमारत की सीढ़ियों के नीचे मुश्किल से 30 वर्ग फुट की जगह में यूएस महेंद्र ने एक छोटा सा कॉफी काउंटर खोला. इसका रेट तब था मात्र ₹5. महेंद्र का विजन साफ था कि पारंपरिक दक्षिण भारतीय फिल्टर कॉफी का स्वाद हर आम इंसान की पहुंच में हो. एक कप बेहतरीन कॉफी पीने के लिए महंगे या लग्जरी कैफे में जाने की जरूरत न पड़े. महंगे इंटीरियर और तड़क-भड़क के बजाय उन्होंने सिर्फ स्वाद और सर्विस पर.
वीजी सिद्धार्थ से मिली प्रेरणा
महेंद्र का कॉफी से नाता बचपन से ही रहा है. वह कर्नाटक के प्रमुख कॉफी उत्पादक जिले हासन में पले-बढ़े. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत कॉफी ट्रेडिंग और ब्रोकिंग से की थी, जिससे उन्हें जमीन पर काम करने वाले किसानों और बीन्स की बारीकियों की गहरी समझ मिली. कैफे कॉफी डे (CCD) के संस्थापक दिवंगत वीजी सिद्धार्थ के विजन से भी वे बहुत प्रभावित हुए. उन्होंने साकलेशपुर के जंबराडी गांव के करीब 15 से 20 स्थानीय कॉफी उत्पादकों को अपने साथ जोड़ा और सीधे उनसे क्वालिटी बीन्स की खरीद शुरू की.
2014 में की इंफोसिस में एंट्री
महेंद्र की कॉफी अपनी क्वालिटी की वजह से बहुत तेजी से लोकप्रिय हुई और उनका कारोबार देखते ही देखते बढ़ गया. 2014 में देश की दिग्गज आईटी कंपनी इंफोसिस ने अपने कैंपस में हट्टी कापी को आउटलेट खोलने की जगह दी. इसके बाद डेलॉइट और SAP जैसी दिग्गज बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दफ्तरों में हट्टी कापी के काउंटर खुलते चले गए. इसके बाद एयरपोर्ट पर कारोबार जमाया. एयरपोर्ट्स पर कंपनी ने खास स्ट्रैटेजी अपनाई. एग्जिट और अराइवल एरिया के पास आउटलेट खोले गए, ताकि सफर से थके यात्री बाहर निकलते ही तुरंत गर्म फिल्टर कॉफी की चुस्की ले सकें. रिटेल से आगे बढ़कर ब्रांड ने लग्जरी होटल चेन मैरियट इंटरनेशनल के साथ साझेदारी की और पैकेज्ड प्रोडक्ट्स के जरिए ई-कॉमर्स सेक्टर में भी कदम रखा.
लंदन तक फैला कारोबारी
बेंगलुरु से शुरू हुआ यह देसी ब्रांड अब सात समंदर पार भी पहुंच चुका है. लंदन में मौजूदगी के बाद अब कंपनी एम्स्टर्डम, अमेरिका, दुबई और यूरोप के अन्य प्रमुख शहरों में विस्तार की तैयारी कर रही है.
₹180 करोड़ है वैल्यूएशन
2016 तक बूटस्ट्रैप्ड रहने के बाद कंपनी ने संस्थागत निवेशकों से फंड जुटाना शुरू किया है. एंजेल राउंड और फिर गीतम शेयर्स एंड सिक्योरिटीज से निवेश मिला. इसके बाद ग्रुहास, ब्लू वुल्फ कैपिटल और एनबी वेंचर्स जैसे बड़े नाम जुड़े. मई 2024 में अन्या वेंचर्स के नेतृत्व में 21.9 लाख डॉलर और अप्रैल 2025 में नाबवेंचर्स (NABVENTURES) व बीकेएस होल्डिंग्स के नेतृत्व में 10.2 लाख डॉलर का फंड आया. Tracxn के आंकड़ों के मुताबिक, 13 चरणों में करीब ₹66.83 करोड़ जुटाने के बाद कंपनी का ताजा वैल्यूएशन लगभग ₹180 करोड़ है.