सतना. मध्य प्रदेश के रीवा के एक महाराजा का मन भगवान की भक्ति में लगा रहता था. वहीं एक ऐसे संत, जिनके बारे में कहा जाता है कि वह अपनी बुखार को गुदड़ी में बांधकर रख देते थे और जरूरत पड़ने पर उफनती नदी का पानी पत्थर बना देते थे. यह कहानी है सतना जिले के जनार्दनपुर गांव में समाधि लेने वाले संत कंगाल दास बाबा की. स्थानीय किंवदंतियों के अनुसार, रीवा के महाराजा रघुराज सिंह जू देव को इन्हीं बाबा का पुनर्जन्म माना जाता है. इस बात का जिक्र महाराजा ने अपनी किताब रामरसिकावली यानी भक्तमाल में भी किया है. आज भी जनार्दनपुर में बाबा की समाधि पर लोग दर्शन करने पहुंचते हैं और उनसे जुड़ी पुरानी कहानियां सुनते हैं.
संत कंगाल दास बाबा का धाम सतना जिले के जनार्दनपुर गांव में स्थित है. यह जगह आसपास के गांवों के लोगों के लिए आस्था का बड़ा केंद्र है. यहां बाबा के साथ उनके शिष्य खरगु दास बाबा की समाधि भी बनी हुई है. स्थानीय लोगों के बीच बाबा के जीवन, उनकी भक्ति और उनसे जुड़े चमत्कारों की कई कहानियां प्रचलित हैं. इन्हीं किस्सों के चलते लोग दूर-दूर से यहां पहुंचते हैं.
250 साल पुराना इतिहास
लोकल 18 से बातचीत में कंगाल दास बाबा धाम में मौजूद पुजारी राम शुक्ला ने बताया कि बाबा की यह कहानी करीब 250 साल पुरानी है. बाबा भगवान राम की भक्ति में लीन रहते थे और उनके जीवन से जुड़े कई ऐसे किस्से हैं, जिन्हें आज भी गांव के बुजुर्ग सुनाते हैं. पुजारी ने बताया कि बाबा ने अपने शिष्य खरगु दास के साथ जीवित समाधि ली थी. आज दोनों की समाधियां एक ही स्थान पर बनी हुई हैं. श्रद्धालु यहां पहुंचकर दर्शन करते हैं और बाबा से अपनी मनोकामनाएं पूरी होने की प्रार्थना करते हैं.
अलग-अलग जगहों पर सोते थे अंग
पुजारी ने कहा कि बाबा के बारे में एक अनोखी कहानी प्रचलित है. कहा जाता है कि जब बाबा सोते थे, तो उनके शरीर के हिस्से अलग-अलग जगहों पर जाकर सो जाते थे. यह बात सुनने में भले ही हैरान करने वाली लगे लेकिन स्थानीय लोगों के बीच इसे बाबा की असाधारण शक्ति से जोड़कर देखा जाता है. ऐसी कहानियां पीढ़ियों से लोगों के बीच सुनाई जाती रही हैं.
जब महाराजा से मिलने के लिए बुखार को गुदड़ी में बांधा
बाबा से जुड़ा एक और किस्सा रीवा के महाराजा विश्वनाथ प्रताप सिंह से जुड़ा है. महाराजा अक्सर बाबा से मिलने आया करते थे. एक बार जब वह बाबा से मिलने पहुंचे, तब बाबा को तेज बुखार था. कहा जाता है कि महाराजा का सम्मान करने के लिए बाबा ने अपनी बुखार को कुछ समय के लिए आसन के पास पेड़ पर टंगी गुदड़ी में बांध दिया और उनसे मिलने चले गए. स्थानीय मान्यता के मुताबिक, बाबा ने ऐसा इसलिए किया ताकि महाराजा को उनके बीमार होने की वजह से इंतजार न करना पड़े.
उफनती गौरैया नदी को पत्थर बनाने की कहानी
कंगाल दास बाबा के चमत्कारों से जुड़ा एक किस्सा रीवा दरबार के राजा और उनकी सेना से संबंधित है. पुजारी राम शुक्ला ने बताया कि एक बार राजा देर रात दरबार लौट रहे थे. उस समय अंधेरा था और तेज बारिश हो रही थी. रास्ते में गौरैया नदी उफान पर थी, जिससे सेना के लिए उसे पार करना मुश्किल हो गया. ऐसी स्थिति में बाबा ने नदी के पानी को पत्थर बना दिया और उसके ऊपर पुल जैसा रास्ता तैयार हो गया. जिसके बाद राजा की सेना नदी पार कर सकी.
महाराजा रघुराज सिंह के जन्म को भी बाबा से जोड़ते हैं लोग
पुजारी ने आगे कहा कि रीवा के महाराजा विश्वनाथ प्रताप सिंह की कोई संतान नहीं थी. उन्होंने बाबा से अपने लिए एक प्रतापी संतान का आशीर्वाद मांगा था. बाबा ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की और बाद में महाराजा रघुराज सिंह जू देव का जन्म हुआ. इसी विश्वास के चलते रघुराज सिंह को संत कंगाल दास बाबा का पुनर्जन्म माना जाता है.
भक्तमाल में भक्ति और आध्यात्मिक अनुभवों का जिक्र
महाराजा रघुराज सिंह जू देव को राजा होने के साथ-साथ भगवान के भक्त, कवि और कला प्रेमी के रूप में भी याद किया जाता है. उनसे जुड़ी भक्तमाल पुस्तक को इस कहानी का अहम हिस्सा माना जाता है. मान्यता है कि इसमें उनके भक्ति भाव और आध्यात्मिक अनुभवों का वर्णन मिलता है.
आज जनार्दनपुर का कंगाल दास बाबा धाम स्थानीय आस्था, पुरानी कहानियों और इतिहास में रुचि रखने वाले लोगों के लिए खास महत्व रखता है. बाबा की समाधि और उनसे जुड़े किस्से इस इलाके की लोक परंपरा का हिस्सा हैं. यही वजह है कि करीब 250 साल पुरानी मानी जाने वाली यह कहानी आज भी लोगों की जुबान पर है.