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झांसी के बाजार में अब मशीनों से तैयार सामान की भरमार है. कई चीजें कम कीमत पर मिल जाती हैं और ग्राहक भी अक्सर सस्ता सामान खरीदना पसंद करते हैं. इसका असर उन कारीगरों पर पड़ता है जो हर चीज अपने हाथों से बनाते हैं. उन्हें सामान तैयार करने में ज्यादा समय लगता है. कच्चा माल खरीदने से लेकर तैयार सामान बेचने तक कई तरह के खर्च उठाने पड़ते हैं. ऐसे में कमाई और मेहनत के बीच तालमेल बैठाना उनके लिए मुश्किल हो जाता है.
झांसीः आज के समय में मशीनों ने काम करने का तरीका काफी बदल दिया है. कम समय में ज्यादा सामान तैयार होने लगा है और बाजार में भी कई तरह की चीजें मिलने लगी हैं. लेकिन इस बदलाव के बीच झांसी में कुछ कारीगर ऐसे भी हैं जो आज तक अपने हाथों के हुनर के सहारे काम कर रहे हैं. उनके लिए यह सिर्फ कमाई का रास्ता नहीं बल्कि उनके परिवार से जुड़ी एक पुरानी पहचान है.
पीढ़ियों से चले आ रहे इस काम को संभालना आसान नहीं है. इसे सीखने में समय लगता है और इसे अच्छी तरह करने के लिए लगातार मेहनत करनी पड़ती है. कारीगर अपने अनुभव के दम पर सामान तैयार करते हैं. उनके काम में हाथों की सफाई के साथ धैर्य भी जरूरी होता है. दिनभर मेहनत करने के बाद जब सामान तैयार होता है तो उसके बिकने और सही दाम मिलने की चिंता भी बनी रहती है.
हाथ से समान बनाने वाले कारीगरों पर पड़ रहा असर
बाजार में अब मशीनों से तैयार सामान की भरमार है. कई चीजें कम कीमत पर मिल जाती हैं और ग्राहक भी अक्सर सस्ता सामान खरीदना पसंद करते हैं. इसका असर उन कारीगरों पर पड़ता है जो हर चीज अपने हाथों से बनाते हैं. उन्हें सामान तैयार करने में ज्यादा समय लगता है. कच्चा माल खरीदने से लेकर तैयार सामान बेचने तक कई तरह के खर्च उठाने पड़ते हैं. ऐसे में कमाई और मेहनत के बीच तालमेल बैठाना उनके लिए मुश्किल हो जाता है.
बाबूलाल प्रजापति बताते हैं कि इस काम में लगातार मेहनत करनी पड़ती है. सामान बनाने के लिए समय देना पड़ता है और हर चीज को ध्यान से तैयार करना होता है. बाजार में मशीनों से बनी चीजें आने के बाद हाथ से काम करने वालों के सामने मुश्किलें बढ़ी हैं. ग्राहक कई बार कीमत देखकर सामान खरीदते हैं लेकिन हाथ से चीजें बनाने में लगने वाली मेहनत और समय को समझना भी जरूरी है. इसके बावजूद वह अपने काम को जारी रखे हुए हैं क्योंकि यह हुनर उनके परिवार से जुड़ा हुआ है.
कारीगरों को मिले समान की सही कीमत
बाबूलाल प्रजापति के लिए अपने काम को जारी रखना अपने परिवार की सीख को आगे ले जाने जैसा है. इस तरह के काम में केवल सामान बनाना ही नहीं होता बल्कि पुराने तरीके और अनुभव भी अगली पीढ़ी तक पहुंचते हैं. अगर यह काम बंद हो जाता है तो आने वाले समय में इस हुनर को जानने वाले लोगों की संख्या भी कम हो सकती है. आज की नई पीढ़ी के सामने रोजगार के कई विकल्प हैं. युवा ऐसे काम चुनना चाहते हैं जिनसे अच्छी कमाई हो सके. अगर पुश्तैनी काम में मेहनत ज्यादा हो और आमदनी कम हो तो उनके लिए इसे चुनना मुश्किल हो जाता है. ऐसे में इस हुनर को बचाए रखने के लिए जरूरी है कि कारीगरों को अपने सामान की सही कीमत मिले और उनके काम को बाजार में जगह मिले.
झांसी के इन कारीगरों की मेहनत यह दिखाती है कि पुराने हुनर को जिंदा रखना सिर्फ एक व्यक्ति की जिम्मेदारी नहीं है. इसके लिए ऐसे माहौल की जरूरत है जहां हाथ से बनी चीजों की पहचान हो और उन्हें बनाने वालों की मेहनत को भी समझा जाए. मशीनें सामान जल्दी बना सकती हैं लेकिन पुश्तैनी हुनर को सीखने में सालों लगते हैं. अब देखना यह है कि आने वाले समय में यह काम नई पीढ़ी तक पहुंच पाता है या बाजार की बदलती मांग के बीच धीरे धीरे पीछे छूट जाता है.