हरिद्वार में पितरों का श्राद्ध कहां करें? हर की पौड़ी से नारायणी शिला का महत्व
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Pitru Paksha Pind Daan in Haridwar: पितृ पक्ष में पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनके प्रति श्रद्धा के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान का विशेष महत्व माना जाता है. हरिद्वार में गंगा किनारे हर की पौड़ी को तो ज्यादातर लोग पितृ कर्म का प्रमुख स्थान मानते हैं, लेकिन धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शहर में कुछ ऐसे खास घाट और स्थान भी हैं, जहां पिंडदान और तर्पण का अलग महत्व बताया गया है. ज्योतिषी पंडित श्रीधर शास्त्री के अनुसार, इन स्थानों का उल्लेख धार्मिक ग्रंथों में भी मिलता है और हर जगह की अपनी अलग मान्यता है. कुछ स्थान भगवान श्री राम और प्राचीन ऋषियों से जुड़ी मान्यताओं के कारण भी खास माने जाते हैं.
Pitru Paksha Pind Daan in Haridwar: पितृ पक्ष में जब लोग अपने पूर्वजों को याद करते हैं तो सबसे पहले हरिद्वार और हर की पौड़ी का नाम सामने आता है. इस बार पितृ पक्ष 27 सितंबर से शुरू होगा जान10 अक्टूबर को समाप्त होगा. इस दौरान गंगा किनारे तर्पण, जलांजलि और पिंडदान करने के लिए दूर-दूर से लोग यहां पहुंचते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि हर की पौड़ी के अलावा हरिद्वार में कुछ ऐसे खास घाट भी हैं, जिन्हें पितृ कर्म के लिए विशेष माना गया है.
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृ पक्ष में इन जगहों पर श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने का विशेष महत्व है. माना जाता है कि विधि-विधान से किए गए पितृ कर्म से पूर्वजों को शांति मिलती है और परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहता है. हरिद्वार में पितृ कार्य से जुड़े कई स्थानों का उल्लेख धार्मिक ग्रंथों में भी मिलता है.
हर की पौड़ी के पास इन घाटों का भी है महत्व
हरिद्वार के ज्योतिषी पंडित श्रीधर शास्त्री ने Local18 को बताया कि आम तौर पर श्रद्धालु हर की पौड़ी को ही श्राद्ध कर्म का सबसे बड़ा केंद्र मानते हैं, लेकिन पिंडदान के लिए कुछ खास घाटों का भी धार्मिक महत्व बताया गया है. उनके मुताबिक, हर की पौड़ी के ब्रह्मकुंड के पास स्थित अस्थि प्रवाह घाट और कुशावर्त घाट पितृ कर्म के लिए विशेष माने जाते हैं. धार्मिक मान्यता है कि कुशावर्त घाट दत्तात्रेय ऋषि की तपस्थली रहा है. यह भी कहा जाता है कि भगवान श्रीराम ने यहां अपने पूर्वजों का श्राद्ध किया था.
मान्यता के अनुसार कुशावर्त घाट पर कुशा और काले तिल से तिलांजलि देने का विशेष महत्व है. श्रद्धालु यहां अपने पितरों की शांति के लिए तर्पण और पिंडदान करते हैं. इसके अलावा कनखल के शीतला माता घाट पर भी शांति हवन और तर्पण का विधान बताया गया है.
नारायणी शिला पर पिंडदान का खास महत्व
ज्योतिषी श्रीधर शास्त्री के अनुसार हरिद्वार की नील धारा यानी चंडी घाट और ऐतिहासिक नारायणी शिला को भी पितृ मोक्ष के लिए खास स्थान माना जाता है. धार्मिक ग्रंथों में नारायणी शिला का विशेष उल्लेख मिलता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार नारायणी शिला भगवान विष्णु का स्थान है. जिस तरह गया में पिंडदान का विशेष महत्व माना जाता है, उसी तरह नारायणी शिला पर पिंडदान करने की भी मान्यता है. कहा जाता है कि यहां पिंडदान करने से पितरों को शांति मिलती है और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है.
पितृ दोष में भी करते हैं विशेष पूजा
ज्योतिषी बताते हैं कि अगर किसी व्यक्ति की कुंडली में पितृ दोष बताया गया हो तो पितृ पक्ष के दौरान इन धार्मिक स्थानों पर विधि-विधान से पूजा कराई जाती है. इसमें ब्राह्मण भोज, पिंडदान, दीपदान और पितरों के लिए हवन शामिल हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन कर्मों से पितरों की शांति के लिए प्रार्थना की जाती है. यही वजह है कि पितृ पक्ष के दौरान हरिद्वार के इन घाटों पर देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु पहुंचते हैं और अपने पूर्वजों के लिए तर्पण और पिंडदान करते हैं.