कोडरमा में 501 सीढ़ियां चढ़कर भक्त करते हैं माता चंचला देवी के दर्शन, सिंदूर चढ़ाना वर्जित, जानें मान्यता

कोडरमा में 501 सीढ़ियां चढ़कर भक्त करते हैं माता चंचला देवी के दर्शन, सिंदूर चढ़ाना वर्जित, जानें मान्यता


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501 सीढ़ियां चढ़कर होते हैं माता चंचला देवी के दर्शन, सिंदूर चढ़ाना वर्जित

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कोडरमा जिला मुख्यालय से करीब 33 किलोमीटर दूर नवलशाही स्थित माता चंचला देवी का धाम श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र है. करीब 500 फीट ऊंचे पहाड़ पर स्थित इस धाम तक पहुंचने के लिए भक्तों को लगभग 501 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं. यहां माता की कन्या रूप में पूजा होती है, इसलिए सिंदूर चढ़ाना वर्जित है. नवरात्र में विशेष पूजा और कलश स्थापना की जाती है.

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कोडरमा: जिले में कई ऐसे धार्मिक स्थल हैं. जहां लोगों की अटूट आस्था और अनोखी परंपराएं देखने को मिलती हैं. इन्हीं में से एक है नवलशाही स्थित शक्तिपीठ माता चंचला देवी का धाम. जिला मुख्यालय से करीब 33 किलोमीटर दूर जंगलों और पहाड़ियों के बीच स्थित यह धाम श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र है. करीब 500 फीट ऊंचे पहाड़ के मध्य में विराजमान माता चंचला देवी के दर्शन के लिए नवरात्र के दौरान बड़ी संख्या में भक्त पहुंचते हैं. झारखंड के विभिन्न जिलों के अलावा बिहार, बंगाल, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश से भी श्रद्धालु यहां अपनी मनोकामनाएं लेकर आते हैं.

कन्या रूप में होती है माता की पूजा, सिंदूर चढ़ाना है वर्जित
चंचलिनी धाम की सबसे खास परंपरा यहां माता की कन्या रूप में पूजा-अर्चना करना है. इसी मान्यता के कारण मंदिर में पूजा के दौरान सिंदूर चढ़ाना पूरी तरह वर्जित है. श्रद्धालु माता को नारियल, चुनरी और प्रसाद अर्पित कर अपनी मनोकामनाएं रखते हैं. भक्तों का विश्वास है कि सच्चे मन से माता की आराधना करने पर उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं. यही वजह है कि सालभर यहां श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है. जबकि नवरात्र के दिनों में धाम का माहौल विशेष रूप से भक्तिमय हो जाता है.

501 सीढ़ियां चढ़कर पहुंचते हैं भक्त
पहाड़ पर स्थित माता के दरबार तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को करीब 501 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं. जंगलों के बीच ऊंचाई पर स्थित यह धाम भक्तों के लिए आस्था के साथ-साथ एक चुनौतीपूर्ण चढ़ाई का अनुभव भी प्रदान करता है. पहाड़ के मध्य में माता का मंदिर स्थित है. जबकि यहां एक गुफा भी है. गुफा के भीतर मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों के दर्शन होते हैं. श्रद्धालु इस स्थान को धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष महत्व देते हैं. पहाड़ पर चढ़कर माता की पूजा करने के दौरान आज तक किसी भक्त को किसी प्रकार की परेशानी नहीं हुई है. श्रद्धालु इसे माता का आशीर्वाद मानते हैं.

संतान प्राप्ति से कारोबार में उन्नति तक की मन्नत
धाम के पुजारी पवन पांडेय ने बताया कि माता चंचला देवी के दरबार में लोग संतान प्राप्ति, कारोबार में उन्नति और जीवन की दूसरी समस्याओं से मुक्ति की कामना लेकर पहुंचते हैं. श्रद्धालुओं का विश्वास है कि माता उनकी पुकार सुनती हैं और मनोकामनाएं पूरी करती हैं. उन्होंने बताया कि कुछ श्रद्धालु अपनी मन्नत लेकर मंदिर परिसर में ही धरना देते हैं. इसके लिए परिसर में अलग-अलग कमरे बनाए गए हैं. कोई सात दिन, कोई 15 दिन, तो कोई एक महीने तक यहां रहकर माता की सेवा में जुटा रहता है. इस दौरान श्रद्धालु मंदिर परिसर की साफ-सफाई करते हैं और पूजा-पाठ में शामिल होते हैं. पुजारी ने बताया कि इस अवधि में कुछ श्रद्धालुओं को सपने में माता से जुड़े संकेत मिलते हैं. जिन्हें वे अपने संकट दूर होने और मनोकामना पूरी होने का संदेश मानते हैं. इसके बाद वे अपने घर लौट जाते हैं. मनोकामना पूरी होने पर कुछ श्रद्धालु दोबारा धाम पहुंचकर अपनी परंपरा के अनुसार बकरे की बलि भी देते हैं.

पहाड़ की चोटी पर विराजते हैं बुढ़वा महादेव
माता चंचला देवी के धाम की धार्मिक विशेषता केवल माता के मंदिर तक सीमित नहीं है. पहाड़ की चोटी पर बुढ़वा महादेव का शिवलिंग भी स्थापित है. यहां पहुंचने के लिए श्रद्धालु लोहे के पाइप से बनी रेलिंग का सहारा लेकर ऊपर चढ़ते हैं. चोटी पर पहुंचकर भक्त भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं और पूजा-अर्चना करते हैं.

नवरात्र में पहाड़ पर स्थापित होता है कलश
नवरात्र के दौरान चंचलिनी धाम में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है. इस अवसर पर पहाड़ पर ही कलश स्थापित कर विधि-विधान से पूजा-पाठ किया जाता है. श्रद्धालु माता के दर्शन करने, चुनरी और नारियल चढ़ाने तथा अपनी मनोकामनाएं रखने के लिए पहुंचते हैं.



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