बागेश्वर: कभी मेल-मिलाप से महकते थे पहाड़ के गांव, आज बुजुर्गों के सहारे बची बस्तियां, जानिए पलायन की असली वजह

बागेश्वर: कभी मेल-मिलाप से महकते थे पहाड़ के गांव, आज बुजुर्गों के सहारे बची बस्तियां, जानिए पलायन की असली वजह


Bageshwar News: उत्तराखंड के बागेश्वर समेत कुमाऊं के कई पर्वतीय जिलों में पहाड़ी जीवन बीते कुछ दशकों में काफी बदल गया है. कभी गांवों में सुबह की शुरुआत पशुओं की घंटियों, महिलाओं की चहल-पहल, खेतों में काम करते किसानों और बच्चों की किलकारियों के साथ होती थी. गांव के हर घर में लोगों की आवाजाही रहती थी और सामूहिक मेल-मिलाप पहाड़ी जीवन की पहचान हुआ करता था, लेकिन आज कई गांवों की तस्वीर बदलती नजर आ रही है. रोजगार, शिक्षा और बेहतर सुविधाओं की तलाश में युवा और परिवार शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं. इसका असर गांवों की आबादी, खेती-बाड़ी और पारंपरिक जीवनशैली पर साफ दिखाई देने लगा है.

कभी गांवों में हर घर में रहती थी रौनक
स्थानीय जानकार प्रेमा कोरंगा बताती हैं कि पुराने समय में पहाड़ के गांवों में जीवन भले ही सुविधाओं के लिहाज से कठिन था, लेकिन सामाजिक जुड़ाव मजबूत हुआ करता था. लोग एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होते थे. शादी-ब्याह, त्योहारों और धार्मिक आयोजनों में पूरा गांव एक परिवार की तरह जुटता था. खेतों में रोपाई और कटाई के दौरान लोग मिलकर काम करते थे. महिलाओं के लोकगीत, बच्चों के खेल और बुजुर्गों की चौपाल गांव के रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा हुआ करते थे. उस दौर में आधुनिक सुविधाएं सीमित थीं. कई गांवों में सड़क, बिजली, पेयजल और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच आसान नहीं थी. इसके बावजूद स्थानीय संसाधनों, पारंपरिक खेती और पशुपालन के सहारे लोग अपना जीवन चलाते थे.

खेती-बाड़ी और पशुपालन था आजीविका का आधार
पहाड़ के पुराने जीवन में खेती और पशुपालन की महत्वपूर्ण भूमिका थी. लोग धान, गेहूं, मंडुवा, झंगोरा और अन्य स्थानीय फसलें उगाते थे. घरों में गाय, बैल और बकरियां पालना आम बात थी. पशुओं के लिए जंगलों और आसपास के क्षेत्रों से घास लाना, खेतों में खाद डालना और परिवार के सभी सदस्यों का खेती में सहयोग करना जीवन का हिस्सा था. समय के साथ खेती में भी बदलाव आया है. कई क्षेत्रों में पारंपरिक खेती का दायरा घटा है. गांवों से युवाओं के बाहर जाने और खेती के लिए पर्याप्त श्रम नहीं मिलने के कारण कुछ खेत बंजर पड़े हैं. जंगली जानवरों से फसलों को होने वाला नुकसान और खेती से सीमित आमदनी भी किसानों के सामने चुनौतियां हैं. कुछ ग्रामीण आज भी पारंपरिक खेती, बागवानी और पशुपालन के सहारे अपनी आजीविका चला रहे हैं.

अब गांवों में बुजुर्ग, युवा शहरों में
पहाड़ के गांवों में पलायन का असर सबसे अधिक सामाजिक जीवन पर दिखाई देता है. पढ़ाई और रोजगार के लिए युवा हल्द्वानी, देहरादून, दिल्ली और अन्य शहरों का रुख कर रहे हैं. कई परिवार बच्चों की बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए गांव छोड़ने को मजबूर हैं. इसका नतीजा यह है कि अनेक गांवों में बुजुर्ग ही रह गए हैं. घरों में ताले लटके हैं, आंगनों में पहले जैसी चहल-पहल नहीं है और कई गांवों में बच्चों की आवाजें कम सुनाई देती हैं. त्योहारों और छुट्टियों के दौरान बाहर रहने वाले लोग गांव लौटते हैं, जिससे कुछ समय के लिए रौनक बढ़ जाती है, लेकिन बाकी दिनों में कई बस्तियां सूनी नजर आती हैं.

आखिर क्यों खाली हो रहे हैं पहाड़ के गांव
गांवों से पलायन के पीछे कई कारण हैं. स्थानीय स्तर पर पर्याप्त रोजगार की कमी, उच्च शिक्षा के सीमित अवसर, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच की समस्या और खेती से कम आमदनी प्रमुख वजहों में शामिल हैं. सड़क और परिवहन की सुविधाओं में सुधार के बावजूद दूरस्थ गांवों में जरूरी सेवाएं हर जगह आसानी से उपलब्ध नहीं हैं. युवाओं के सामने अपने भविष्य को लेकर भी कई सवाल हैं. वे बेहतर नौकरी, नियमित आय और आधुनिक सुविधाओं की उम्मीद में शहरों में बस रहे हैं. ऐसे में गांवों में आबादी का संतुलन बदल रहा है और पारंपरिक आजीविका के साधनों को आगे बढ़ाने वाले लोगों की संख्या कम हो रही है.

क्या फिर लौट सकती है पहाड़ के गांवों की रौनक
पहाड़ के गांवों को दोबारा आबाद करने के लिए स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ाना जरूरी है. पर्यटन, होमस्टे, स्थानीय उत्पादों, बागवानी, पशुपालन और स्वरोजगार को बढ़ावा देकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत की जा सकती है. इसके साथ ही गांवों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, इंटरनेट और परिवहन जैसी सुविधाओं का विस्तार भी आवश्यक है. बागेश्वर जैसे पर्वतीय जिलों में प्राकृतिक सुंदरता, सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक खानपान की अपार संभावनाएं हैं. यदि इन संसाधनों को योजनाबद्ध तरीके से आजीविका से जोड़ा जाए, तो स्थानीय युवाओं के लिए अपने क्षेत्र में ही रोजगार के अवसर पैदा किए जा सकते हैं.



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