navratri 2026 durga saptashati niyam maha saptami maha ashtami maha navami chandi path rules | महाअष्टमी और महानवमी पर चंडी पाठ करते समय इन नियमों का

navratri 2026 durga saptashati niyam maha saptami maha ashtami maha navami chandi path rules | महाअष्टमी और महानवमी पर चंडी पाठ करते समय इन नियमों का


Navratri Durga Saptashati Rules: नवरात्र अब अपने समापन की ओर बढ़ रहे हैं. ऐसे में 19 अक्टूबर दिन सोमवार को महाअष्टमी का व्रत किया जाएगा तो 20 अक्टूबर दिन मंगलवार को महानवमी की पूजा की जाएगी. कुछ घरों में महासप्तमी, महाअष्टमी और महानवमी तिथि को पूजा-अर्चना करने के बाद चंडी पाठ किया जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, हर दिन चंडी पाठ करने से सभी तरह की परेशानियों से मुक्ति मिलती है और ग्रह-नक्षत्र के अशुभ प्रभाव में भी कमी आती है. इस पाठ के करने से आसपास सकारात्मक माहौल रहता है और जीवन के हर क्षेत्र में माता की कृपा से सफलता भी मिलती है. लेकिन अगर आप महासप्तमी, महाअष्टमी और महानवमी तिथि को चंडी पाठ करते हैं तो कुछ बातों का आपको विशेष ध्यान रखने की आवश्यकता है क्योंकि यह साधारण पाठ नहीं है. इस पाठ में कई शक्तिशाली सिद्ध मंत्र भी हैं, जिनको जप करते समय कई सावधानियां बरतने की आवश्यकता है. आइए जानते हैं चंडी पाठ करते समय किन-किन नियमों का ध्यान रखने की आवश्यकता है…

चंडी पाठ में 13 अध्याय और 700 श्लोक
चंडी पाठ को दुर्गा सप्तशती या देवी माहात्म्य भी कहा जाता है. यह मार्कंडेय पुराण का एक भाग है, जिसकी रचना महर्षि वेदव्यास ने की है. इस ग्रंथ में 13 अध्याय और 700 श्लोक हैं. ‘सप्त’ का अर्थ है ‘सात’ और ‘शत’ का अर्थ है ‘सौ’, इसलिए ‘सप्तशती’ कहा जाता है. इस ग्रंथ में महिषासुर जैसे राक्षसों पर दुर्गा की विजय का वर्णन है. सही पाठ के लिए विशिष्ट विधि का पालन किया जाता है, जिसमें त्र्यंगम और नवांगम शामिल हैं, जिनका नवरात्र के दौरान या एक, तीन या सात बैठकों में श्रद्धापूर्वक पाठ किया जाता है.

पाठ करते समय इन दो विधियों का करें पालन
दुर्गा सप्तशती का पाठ विधि-विधान और शुद्धता के साथ करना चाहिए. आप इसे नवरात्र या किसी अन्य शुभ अवसर पर एक दिन में या नौ दिनों में पूरा कर सकते हैं. दुर्गा सप्तशती का सही पाठ करने के लिए एक पारंपरिक पाठ विधि का पालन करना आवश्यक है. भक्त समय, श्रद्धा और अवसर के अनुसार विभिन्न विधियों में से किसी एक को चुन सकते हैं. अगर आपको एक ही बार में दुर्गा सप्तशती का पाठ करने में सहायता की आवश्यकता है, तो आप दो विधियों का पालन कर सकते हैं: त्र्यंगम और नवांगम.

चंडी पाठ करने के विधि
पवित्र ग्रंथ का सही पाठ करने के लिए उचित विधि का पालन करना आवश्यक है. पूर्व दिशा में लाल वस्त्र बिछाकर उस पर मां दुर्गा की तस्वीर या मूर्ति स्थापित करनी चाहिए. श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ करने से पहले स्थान को शुद्ध करें और कुमकुम, चावल और फूलों से प्रार्थना करें. फिर माथे पर रोली लगाएं और तत्वों को शुद्ध करने के लिए चार बार आचमन करें. पाठ शुरू करने से पहले स्नान करें और साफ कपड़े पहनें. माता दुर्गा का ध्यान करते हुए दुर्गा सप्तशती का पाठ आरंभ करें. सबसे पहले दुर्गा कवच का पाठ करें. मान्यता है कि दुर्गा कवच का पाठ किए बिना सप्तशती पाठ आरंभ नहीं करना चाहिए. इसके साथ ही माता दुर्गा की तस्वीर के सामने घी का दीपक जलाएं. नियमित पाठ पूरा होने पर आरती अवश्य करें और माता दुर्गा से क्षमा याचना करें. आरती के बाद भोग या प्रसाद चढ़ाएं. माता दुर्गा को बताशे का भोग लगाना बहुत शुभ माना जाता है. आरती के बाद प्रसाद वितरण करें और माता से घर की खुशहाली की प्रार्थना करें.

सप्तशती के पहले अध्याय से लेकर छठवें अध्याय तक
सप्तशती के पहले अध्याय में दैत्य मधु कैटभ के वध, दूसरे अध्याय में देवताओं के तेज से मां दुर्गा के अवतरण और महिषासुर सेना के वध की कहानी है. तीसरे अध्याय में महिषासुर और उसके सेनापति के वध के बारे में बताया गया है. चौथा अध्याय इन्द्र आदि देवताओं के द्वारा मां की स्तुति, पांचवें अध्याय में चंड मुंड द्वारा राक्षस शुम्भ के सामने देवी की सुंदरता का वर्णन और छठे अध्याय में धुम्रलोचन वध का वर्णन है.

सातवें से लेकर 13वें अध्याय तक
सातवें अध्याय में चंड मुंड वध और आठवें में रक्तबीज के वध के बारे में बताया गया है. अध्याय नौ और दस में निशुम्भ शुम्भ वध की कथा है. ग्यारहवें अध्याय में देव और देवी की स्तुति करके वरदान के बारे में जानकारी दी गई है. बारहवें और तेरहवें अध्याय में देवी के चरित्र की महिमा और वैश्य सुरथ की कथा है, जिसे देवी का वरदान मिला था. देवी के ये प्रकटीकरण और उनके युद्ध के रूप ही आगे चलकर ‘नवदुर्गा’ की उपासना की परंपरा का आधार बने.

दुर्गा सप्तशती में 700 श्लोक
दुर्गा सप्तशती में 700 श्लोक हैं, जिन्हें तीन भागों में बांटा गया है. प्रथम चरित्र (महाकाली), मध्यम चरित्र (महालक्ष्मी) और उत्तर चरित्र (महासरस्वती). ये तीनों ही महाशक्ति के मूल स्वरूप हैं, जिनसे नौ अलग-अलग देवियों (नवदुर्गा) की आराधना का विधान पुष्ट होता है. मान्यता है कि दुर्गा सप्तशती का पाठ करने से भय, शोक और सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती जाती है. इसका पाठ विशेष रूप से नवरात्रों में किया जाता है और ये अचूक फल देने वाला होता है. दुर्गा सप्तशती के अलग-अलग श्लोकों का अलग महत्व है. इन श्लोकों को पढ़ने से भक्तों को कई लाभ होते हैं.

सिद्ध मंत्र
“सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके. शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते॥” यह मंत्र किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत, पारिवारिक सुख, और सभी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है.

“ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुते॥” इस मंत्र का जाप जीवन में विजय पाने, संकटों को टालने और मां दुर्गा की कृपा से उन्नति प्राप्त करने के लिए किया जाता है.

“शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके. घण्टास्वनेन नः पाहि चापज्यानिःस्वनेन च॥” यह मंत्र चारों ओर एक आध्यात्मिक सुरक्षा कवच बनाता है, जिससे नकारात्मक ऊर्जा, बुरी नजर, डर और शत्रुओं से रक्षा होती है.

“सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि. एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम्॥” इस मंत्र के जरिए तीनों लोकों की पीड़ा हरने वाली मां से गुप्त या प्रत्यक्ष शत्रुओं के विनाश और जीवन की बड़ी बाधाओं को शांत करने की प्रार्थना की जाती है.

“सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वितः. मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति नसंशयः॥” इस मंत्र के जाप से मां दुर्गा की अनुकंपा से घर में धन-धान्य, सुख-समृद्धि और संतान सुख की प्राप्ति होती है.

इस तरह रखें श्री दुर्गा सप्तशती पाठ की पुस्तक
श्री दुर्गा सप्तशती पाठ की पुस्तक को हमेशा लाल कपड़े से ढकी चौकी पर रखें. पाठ के दिनों में मांसाहारी भोजन, शराब, लहसुन और प्याज का सेवन नहीं करना चाहिए. पाठ के दौरान पूर्ण ब्रह्मचर्य और शारीरिक व मानसिक पवित्रता का पालन करें. सप्तशती पाठ करते समय किसी के प्रति बुरे भाव ना रखें.



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