MP में बीजेपी से क्यों नाराज कोर आदिवासी वोट बैंक‍? भोपाल तक निकाल रहे मार्च, कैसे होगा डैमेज कंट्रोल

MP में बीजेपी से क्यों नाराज कोर आदिवासी वोट बैंक‍? भोपाल तक निकाल रहे मार्च, कैसे होगा डैमेज कंट्रोल


मध्य प्रदेश देश के बिल्कुल बीचों-बीच मौजूद है. इस राज्य को देश का दिल कहा जाता है. लेकिन आदिवासी समुदाय के बिना इस राज्य की कहानी पूरी नहीं होती है. राज्य में आदिवासी समुदाय सिर्फ एक वोटर नहीं, बल्कि सत्ता के सिंहासन तक पहुंचने वाली चाबी होती है. सालों तक एमपी में बीजेपी की राजनीतिक सफलता में आदिवासी वोटर रीढ़ रहा है. आदिवासी वोटर्स के दम पर ही बीजेपी ने कई बार प्रदेश में सत्ता हासिल की. लेकिन अब राजनीति की हवा बदल रही है और आदिवासी भोपाल तक पैदल मार्च निकाल रहे हैं. अब सबसे बड़ा सवाल यही सिर उठाए खड़ा है कि आदिवासी बीजेपी से क्यों नाराज हो गए हैं और बीजेपी इसको किस तरह डैमेज कंट्रोल करेगी.

आदिवासियों से गिराए गए थे घर
हाल ही में सीहोर जिले के वन विकास निगम ने कार्रवाई करते हुए 12 आदिवासियों के घर गिरा दिए. इसको लेकर फिर भोपाल से लेकर दिल्ली तक हो हल्ला मचा. यह घटना कोसमी गांव में हुई, जो शिवराज सिंह चौहान के लोकसभा क्षेत्र में ही आता है. बाद में शिवराज खुद आदिवासियों से मिलने पहुंचे थे और उन्होंने कहा कि किसी नरपिशाच ने कार्रवाई की है. इसके बाद वह धरने पर भी बैठ गए थे. सोशल मीडिया पर कई ऐसे वीडियो वायरल हुए थे, जिसमें आदिवासी रोते-बिलखते नजर आए थे. इसको लेकर प्रदेश में खूब राजनीति गरमाई थी, कांग्रेस को बीजेपी पर हमला करने का एक मौका मिला था और उसने वह किया भी. जीतू पटवारी और उमंग सिंघार ने बीजेपी में फूट पड़ने के भी आरोप लगाए.

सीएम से मिलने के लिए भोपाल तक पैदल मार्च निकाल रहे आदिवासी
लेकिन जिन आदिवासियों के घर गिराए गए. वह पिछले चार दिनों से धरने पर बैठे हैं. अब उन्होंने अपना मन बदल लिया है और सैकड़ों की संख्या में आदिवासियों ने सीहोर से भोपाल तक पैदल यात्रा शुरू कर दी है. उनकी तरफ से बताया गया है कि वह मुख्यमंत्री निवास तक जाएंगे और सीएम से इंसाफ की गुहार लगाएंगे.

इससे पहले भोपाल में आदिवासी संगठन के छात्र-छात्राएं अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे, तब एक छात्र ने पुलिस को जय जोहार कहा था. इसके बाद टीआई रतन सिंह परिहार बुरी तरह से गुस्सा हो गए और उन्होंने आदिवासी छात्रों के साथ गाली-गलौच भी की. इसे भी कांग्रेस ने आदिवासी सम्मान का मुद्दा बनाया और बीजेपी पर हमलावर हो गई. इन घटनाओं के बाद से आदिवासी समुदाय में नाराजगी देखी गई.

एमपी की राजनीति में आदिवासी वोटर क्यों है खास?
मध्य प्रदेश की राजनीति में आदिवासी वोटर अहम भूमिका निभाते हैं. राज्य में इनकी हिस्सेदारी करीब 21 प्रतिशत है. राजनीतिक गलियारों में यह माना जाता है कि एमपी में जो पार्टी आदिवासियों को साधती है, ताज उसी के सिर सजता है. राज्य में कुल 230 विधानसभा सीट मौजूद हैं. इनमें से 47 सीटें एसटी के लिए और 45 सीटें एससी के लिए रिजर्व हैं. राज्य में कम से कम 35 से 40 सीटें ऐसी हैं, जहां आदिवासी वोटर जीत और हार का फैसला करते हैं.

साल 2000 के बाद मध्य प्रदेश विधानसभा में बीजेपी का प्रदर्शन:

साल 2003 के चुनाव में बीजेपी ने कुल 173 सीटें जीती
साल 2008 के चुनाव में बीजेपी ने 143 सीटें जीती
साल 2013 के चुनाव में बीजेपी ने 165 सीटें जीती
साल 2018 के चुनाव में बीजेपी ने 109 सीटें जीती
साल 2023 के चुनाव में बीजेपी ने 163 सीटें जीती

ऊपर लिखे आंकड़ों के हिसाब से कह सकते हैं कि हर विधानसभा चुनाव में बीजेपी के लिए आदिवासी वोटर्स ने खूब वोट किया और तभी वह सत्ता में आई. शिवराज सिंह के लंबे कार्यकाल में बीजेपी ने आदिवासी बहुल क्षेत्रों में मजबूत पैठ बनाई थी. वह खुद यह बात मान चुके हैं कि प्रदेश में बार-बार कमल खिलने के पीछे इन्हीं आदिवासियों का सबसे बड़ा योगदान है.

डैमेज को कैसे कंट्रोल करेगी बीजेपी?
आदिवासियों का विरोध प्रशासनिक सख्ती से उपजा हुआ है. जब आदिवासियों के घर और रोजी-रोटी पर संकट आया, तो उन्होंने पैदल मार्च निकाल लिया है. मुख्यमंत्री मोहन यादव पहले ही कह चुके हैं कि उन्होंने अधिकारियों से इस सिलसिले में बात की है और जांच रिपोर्ट मांगी है. जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा. उन्होंने यह भी कहा कि सरकार आदिवासियों के प्रति संवेदनशील है.

अगर एमपी सरकार आदिवासियों के घर गिराने में दोषी अधिकारियों पर गाज गिराती है, तो इससे उनके जख्मों पर कुछ हद तक मरहम लग सकता है. इसके अलावा आदिवासियों से बात करके उनके गुस्से को शांत किया जा सकता है. सरकार यह पक्का करने में जुटी है कि इस एक घटना से पूरे प्रदेश के आदिवासी समुदाय में गलत संदेश न जाए.



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