9 बच्चे, 5 कक्षाएं और रोज 4KM की चढ़ाई… सैलरी का 15% बच्चों पर खर्च कर भविष्य संवार रहे इकलौते शिक्षक हर्षित, जंगल के रास्ते पहुंचते हैं पढ़ाने

9 बच्चे, 5 कक्षाएं और रोज 4KM की चढ़ाई… सैलरी का 15% बच्चों पर खर्च कर भविष्य संवार रहे इकलौते शिक्षक हर्षित, जंगल के रास्ते पहुंचते हैं पढ़ाने


Harshit Sanguri Inspiring Story: घना जंगल… 4 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई, कदम-कदम पर गुलदार का खौफ और बुनियादी सुविधाओं से कोसों दूर एक प्राथमिक विद्यालय. यह कोई फिल्मी कहानी नहीं, बल्कि उत्तराखंड के नैनीताल जिले में तैनात 27 वर्षीय शिक्षक हर्षित सांगुड़ी की हकीकत है. जंगली जानवरों के खतरे को पीछे छोड़ते हुए हर्षित हर रोज समय से स्कूल पहुंचते हैं, ताकि पहाड़ के नौनिहालों की तालीम न छूटे. वे न केवल इकलौते शिक्षक के तौर पर कक्षा 1 से 5 तक के बच्चों को सभी विषय पढ़ाते हैं, बल्कि अपनी सैलरी का 10 से 15 फीसदी हिस्सा भी इन्हीं मासूमों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में खुशी-खुशी खर्च कर देते हैं.

27 वर्षीय हर्षित सांगुड़ी रोज करीब 4 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई और घने जंगलों का जोखिम भरा रास्ता पार कर प्राथमिक विद्यालय पहुंचते हैं. दैनिक भास्कर की खबर के मुताबिक, बच्चों के लिए हर्षित ने दो लैपटॉप का भी इंतजाम किया है. वे बताते है कि स्कूल पहुंचने के दौरान कई बार रास्ते में गुलदार की आवाजें भी सुन चुके हैं. इतना ही नहीं कि कुछ साल पहले पास के इलाके में एक बच्चे को गुलदार घर के बाहर से उठा ले गया था. हर्षित फिलहाल नैनीताल के रामगढ़ के जीपीएस करखोली में तैनात हैं.

2019 में शुरू हुआ सफर, नहीं मानी हार…2026 में मिली तैनाती
हर्षित सांगुड़ी की शुरुआती पढ़ाई केंद्रीय विद्यालय भीमताल से हुई. इसके बाद साल 2019 में उन्होंने डीएसबी कैंपस नैनीताल से बीकॉम की डिग्री हासिल की. स्नातक के बाद उन्होंने एसएससी, लोअर/अपर पीसीएस और पटवारी जैसी कई प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की. कड़े परिश्रम के बावजूद जब अंतिम चयन नहीं हो सका, तो उन्होंने हार मानने के बजाय अपना रुख बदला. साल 2022-23 की उत्तराखंड डीएलएड प्रवेश परीक्षा में हर्षित ने नैनीताल जिले में प्रथम स्थान और पूरे उत्तराखंड में चौथा स्थान प्राप्त किया. डीएलएड की ट्रेनिंग पूरी करने के बाद जनवरी 2026 में उन्हें नैनीताल के रामगढ़ ब्लॉक स्थित राजकीय प्राथमिक विद्यालय (जीपीएस) करखोली में इकलौते शिक्षक के तौर पर पहली तैनाती मिली.

जंगल में रोज 1 घंटे का पैदल सफर, बरसात के मौसम में फिसलन और गुलदार
जीपीएस करखोली मुख्य सड़क से करीब 45 मिनट से 1 घंटे की पैदल दूरी पर है. स्कूल तक पहुंचने का रास्ता कच्चा, बेहद उबड़-खाबड़ और बरसात के मौसम में फिसलन भरा हो जाता है. स्कूल समय पर पहुंचने के लिए हर्षित ने गांव में ही एक किराए का कमरा ले रखा है. स्कूल का रास्ता और उनके कमरे का पिछला हिस्सा घने जंगलों से सटा है, जहां अक्सर गुलदार की दहाड़ सुनाई देती है. हर्षित खुद कई बार रास्ते में गुलदार की आवाजें सुन चुके हैं. कुछ साल पहले इसी इलाके में गुलदार एक बच्चे को उसके घर के बाहर से ही उठाकर ले गया था, जिससे यहां हमेशा जंगली जानवरों का डर बना रहता है.

5 कक्षाएं, 9 बच्चे और सभी विषयों की जिम्मेदारी अकेले कंधों पर
पहाड़ों में बुनियादी सुविधाओं के अभाव और लगातार हो रहे पलायन के चलते इस प्राथमिक विद्यालय में कक्षा 1 से 5 तक कुल मिलाकर सिर्फ 9 बच्चे ही बचे हैं. स्कूल में अकेले शिक्षक होने के कारण हर्षित पर पांचों कक्षाओं के सभी विषय अंग्रेजी, हिंदी, गणित, पर्यावरण अध्ययन और संस्कृत पढ़ाने की जिम्मेदारी है. अकेले होने की वजह से उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह रहती है कि यदि वे बीमार पड़ जाएं या कोई आपात स्थिति आ जाए, तो भी स्कूल से छुट्टी लेना बेहद मुश्किल हो जाता है.

फटे जूते और अधूरी पेंसिलें देख पसीजा दिल, सैलरी से उठाई जिम्मेदारी
स्कूल में बच्चों की स्थिति देखकर हर्षित काफी भावुक हो गए. कई बच्चों के पास फटे जूते, ठंड में बिना स्वेटर के कपड़े और लिखने के लिए अधूरी पेंसिलें थीं. बच्चों की यह हालत देखकर उन्होंने खुद पहल की और अपनी मासिक सैलरी का करीब 10% से 15% (लगभग ₹5,000 से ₹10,000) बच्चों की जरूरतों पर खर्च करना शुरू कर दिया.

सोशल मीडिया पर वीडियो साझा किए तो देशभर से मिला सहयोग
हर्षित ने जब गांव और बच्चों के संघर्ष के वीडियो सोशल मीडिया पर साझा किए, तो उनकी यह मुहिम लोगों के दिलों तक पहुंची. देशभर से कई लोग आगे आए और बच्चों की मदद के लिए नए बैग, जूते, पानी की बोतलें, स्वेटर, पूरी स्टेशनरी किट और 2 सेकंड-हैंड लैपटॉप भेजे. इन लैपटॉप्स की मदद से बच्चों को डिजिटल तकनीक से भी जोड़ा जा रहा है. इसके अलावा, जो अतिरिक्त स्टेशनरी और बैग्स बचते हैं, हर्षित उन्हें अपनी बहन (जो खुद एक शिक्षिका हैं) के स्कूल के जरूरतमंद बच्चों तक पहुंचाते हैं, ताकि कोई भी बच्चा साधनों की कमी के कारण शिक्षा से वंचित न रहे.





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