बागेश्वर: उत्तराखंड में पहाड़ की महिलाओं की मेहनत और हिम्मत की मिसाल अक्सर देखने को मिलती है. बागेश्वर समेत आसपास के पर्वतीय इलाकों में महिलाएं घर के कामकाज के साथ पशुपालन और खेती की जिम्मेदारी भी संभालती हैं. इन्हीं कामों में एक बेहद मेहनत भरा काम जंगल से घास काटकर घर लाना है. पहाड़ की महिलाएं रोजाना कठिन रास्तों पर चलकर घास की भारी गट्ठर अपनी पीठ पर लादकर घर तक पहुंचाती हैं. उनका यह तरीका देखने में भले ही नार्मल लगे, लेकिन इसके पीछे काफी मेहनत और शारीरिक ताकत लगती है.
पीठ पर 50 से 60 किलो तक घास का बोझ
स्थानीय जानकार प्रेमा कोरंगा बताती है कि पहाड़ी गांवों में कई परिवार पशुपालन पर निर्भर हैं. गाय, भैंस और बैलों के लिए चारे की व्यवस्था करना गांव के जीवन का अहम हिस्सा है. इसके लिए महिलाएं सुबह या दिन के समय जंगलों, खेतों के आसपास घास लेने जाती हैं. वहां से घास काटकर एक बड़ा गट्ठर तैयार करती हैं. कुछ जगहों में इस गट्ठर का वजन 50 से 60 किलो तक बताया जाता है.
घास को घर तक लाने के लिए महिलाएं पारंपरिक तरीका यूज करती हैं. वे घास को एक जगह इकट्ठा करके रस्सी से अच्छी तरह बांधती हैं. इसके बाद गट्ठर को पीठ पर टिकाती हैं, और रस्सी का सहारा लेकर उसे सर पर संभालती हैं. कई महिलाएं सिर के ऊपर से गुजरने वाली पट्टी या रस्सी की मदद से भार को मेंटेन करती हैं. इस तकनीक से चलते समय गट्ठर को संभालने में मदद मिलती है.
5 से 15 किलोमीटर तक पैदल सफर
पहाड़ी क्षेत्रों में कई गांवों के आसपास चारा कम मात्रा में होने के कारण महिलाओं को दूर-दूर तक जाना पड़ता है. कुछ स्थानों पर जंगल या घास के मैदान घर से 5 से 15 किलोमीटर तक की दूरी पर होती हैं. ऐसे में महिलाओं को ऊबड़-खाबड़ रास्तों, चढ़ाई और उतराई से गुजरते हुए घास लेकर लौटना पड़ता है. बारिश के मौसम में फिसलन, गर्मियों में पानी की कमी जैसी तमाम परेशानियां इस काम को और कठिन बना देती है.
पहाड़ की अर्थव्यवस्था में महिलाओं की अहम भूमिका
कुमाऊं की महिलाएं केवल घास ही नहीं लातीं, बल्कि खेती, पशुपालन, बच्चों की देखभाल और घरेलू जिम्मेदारियां भी निभाती हैं. उनका योगदान पहाड़ के ग्रामीण जीवन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को चलाने में विशेष है. कई बार उनकी इस मेहनत को रोजमर्रा की जिंदगी का सामान्य हिस्सा मान लिया जाता है, जबकि इसके लिए काफी समय और ऊर्जा की जरूरत होती है.
कुमाऊं की महिलाओं का घास लाने का यह पारंपरिक तरीका उनकी मेहनत, अनुभव और पहाड़ी दिनचर्या को दिखाता है. उनकी दिनचर्या हमें बताती है कि पहाड़ का जीवन जितना सुंदर दिखाई देता है, उसे संभालने में उतनी ही मेहनत लगती है.