पटना: नवरात्रि आते ही मां दुर्गा के दरबारों में भक्तों की भीड़ उमड़ने लगती है. हर मंदिर की अपनी परंपरा और मान्यता होती है. ज्यादातर मंदिरों में नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना की जाती है, लेकिन पटना के राजा बाजार स्थित खाजपुरा के दुर्गा मंदिर में ऐसा नहीं होता. जी हां, यह मंदिर अपनी दो खास बातों को लेकर बाकियों से अलग और अनोखा है. पहली, यहां नवरात्रि में कलश स्थापना प्रतिपदा को नहीं, बल्कि पंचमी के दिन की जाती है. दूसरी, मां को वस्त्र अर्पित करने के लिए श्रद्धालुओं को महीनों पहले अपनी बारी तय करानी पड़ती है. मंदिर के पुजारी ने बताया कि वस्त्र अर्पित करने की बुकिंग जनवरी 2027 तक हो चुकी है.
1939 से जुड़ी है आस्था, पंचमी को बैठता है कलश
नवरात्रि में आपने घरों और मंदिरों में पहले दिन कलश स्थापना होते देखी होगी, लेकिन खाजपुरा के इस मंदिर में पंचमी को कलश स्थापित करने की परंपरा है. मंदिर से जुड़े लोगों ने बताया कि 1939 से इस स्थान पर श्रद्धालुओं की आस्था बनी हुई है.
मंदिर समिति के अध्यक्ष उपेंद्र सिंह ने बताया कि एक बार पहले दिन कलश स्थापना करने का प्रयास किया गया था. उस दौरान पट खुलते ही पूरे पंडाल में आग लग गई. बहुत साल पहले जब पहले दिन कलश स्थापना हुआ तो कई लोगों की मौत भी हो चुकी है. इसीलिए उनका मानना है कि पहले दिन कलश स्थापना करना यहां के लिए सही नहीं है. दूसरी तरफ, जब पांचवें दिन कलश स्थापना होती है तो कई बार मां की चमत्कारी महिमा देखने को मिली है. एक घटना का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि विसर्जन के समय हाईटेंशन तार के चपेट में मूर्ति आ गई थी. यह एक बड़ी दुर्घटना हो सकती थी लेकिन मां ने अपना एक हाथ त्याग करते हुए कई लोगों की जान बचा ली.
इन घटनाओं को मंदिर से जुड़े लोग अपनी धार्मिक मान्यता से जोड़कर देखते हैं. यही वजह है कि उनके लिए पंचमी को कलश स्थापना केवल एक रस्म नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आस्था का हिस्सा है.
मां को वस्त्र चढ़ाना है तो पहले लगाइए नंबर
इस मंदिर की सबसे दिलचस्प परंपराओं में मां दुर्गा को वस्त्र अर्पित करना शामिल है. यहां भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार माता रानी को वस्त्र चढ़ाते हैं, लेकिन इसके लिए मन में इच्छा होने भर से काम नहीं चलता. अपनी बारी आने का इंतजार भी करना पड़ता है.
मंदिर के पुजारी अरविंद पांडे ने बताया कि मां को वस्त्र पहनाने के लिए बाकायदा नंबर सिस्टम चलता है. अगर कोई श्रद्धालु नवरात्रि के दौरान वस्त्र अर्पित करना चाहता है, तो संभव है कि उसे मार्च या अप्रैल तक इंतजार करना पड़े. पुजारी ने बताया कि मां एक बार जो वस्त्र धारण कर लेती हैं, उसे दोबारा नहीं पहन पाती हैं. इसका कारण है कि यहां दान में खूब वस्त्र आते हैं. हर बार नए वस्त्र तैयार होता है. इसी परंपरा के कारण वस्त्र अर्पित करने के लिए श्रद्धालुओं की बुकिंग आगे तक चलती रहती है. फिलहाल जनवरी 2027 तक नंबर लग चुका है.
साल के 365 दिन जलता है अखंड दीप
मां के दरबार में आस्था का एक और प्रतीक अखंड दीप है, जो पूरे साल जलता रहता है. मंदिर के पुजारी ने जानकारी देते हुए बताया कि इस दीप को जलाए रखने में किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं का सामूहिक सहयोग रहता है. कोई भक्त एक किलो घी अर्पित करता है, तो कोई आधा किलो या अपनी क्षमता के अनुसार योगदान देता है. इसी तरह श्रद्धालुओं की भागीदारी से अखंड दीप की परंपरा लगातार जारी है.
मंगलवार को खीर, शनिवार को खिचड़ी का भोग
मंदिर में हर मंगलवार को खीर का भोग और भंडारा आयोजित किया जाता है. वहीं, शनिवार को खिचड़ी का भोग लगाया जाता है. कई श्रद्धालु अपनी आस्था और मनोकामना के अनुसार इन आयोजनों में सहयोग करते हैं. यहां पूजा-पाठ के साथ सेवा और सामूहिक सहभागिता की परंपरा भी देखने को मिलती है. भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार मां के दरबार में योगदान देते हैं.
क्रोध नहीं, प्रसन्न मुद्रा में विराजती हैं मां
मंदिर के पुजारी अरविंद पांडे बताते हैं कि यहां मां दुर्गा की प्रतिमा क्रोध रूप में नहीं, बल्कि सौम्य और प्रसन्न मुद्रा में है. मां का स्वरूप अभय और वरदान देने वाला माना जाता है. श्रद्धालु इसी विश्वास के साथ यहां पहुंचते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि और अपनी मनोकामनाओं के लिए प्रार्थना करते हैं. आस पास अस्तपाल होने की वजह से अच्छी सेहत की मनोकामना के साथ लोग बड़ी संख्या में आते हैं.