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Bageshwar ki local news : उत्तराखंड के पहाड़ों में जगह-जगह निकलने वाले प्राकृतिक जलस्रोत आपने भी देखे होंगे. यहां के गांवों में धारे, नौले और छोटे-छोटे झरने आज भी आम जीवन का हिस्सा हैं. इनकी निरंतरता के पीछे प्रकृति का जलचक्र, पहाड़ों की भूगर्भीय संरचना और जमीन के भीतर पानी के संग्रह की प्रक्रिया काम करती है. बागेश्वर के किशन मलड़ा लोकल 18 से बताते हैं कि बारिश के दौरान जमीन के अंदर पहुंचने वाला पानी चट्टानों की दरारों और मिट्टी की पारगम्य परतों में जमा हो जाता है. जब यह पानी पहाड़ की ढलान से बाहर निकलता है, तो धारा या झरने का रूप ले लेता है.
बागेश्वर. उत्तराखंड के पहाड़ों में जगह-जगह निकलने वाले प्राकृतिक जलस्रोत सदियों से लोगों की प्यास बुझाते आए हैं. गांवों में धारे, नौले और छोटे-छोटे झरने आज भी ग्रामीण जीवन का हिस्सा हैं. कई प्राकृतिक जलस्रोत गर्मियों में भी पानी देते रहते हैं. इसके पीछे प्रकृति का जलचक्र, पहाड़ों की भूगर्भीय संरचना और जमीन के भीतर पानी के संग्रह की प्रक्रिया काम करती है. हालांकि, सभी जलस्रोत सालभर चलते रहें, यह जरूरी नहीं है. बागेश्वर के किशन मलड़ा लोकल 18 से बताते हैं कि पहाड़ों पर मानसून के दौरान होने वाली बारिश और सर्दियों में गिरने वाली बर्फ प्राकृतिक जलस्रोतों को पानी उपलब्ध कराते हैं. बारिश का कुछ पानी नदियों और नालों के माध्यम से बह जाता है, जबकि एक हिस्सा मिट्टी, जंगलों की जमीन और चट्टानों की दरारों से रिसकर धरती के भीतर पहुंचता है. जमीन के अंदर पहुंचने वाला पानी चट्टानों की दरारों और मिट्टी की पारगम्य परतों में जमा हो सकता है. इसे भूजल भंडारण की प्रक्रिया कहा जाता है. जब यह पानी पहाड़ की ढलान पर किसी उपयुक्त स्थान से बाहर निकलता है, तो प्राकृतिक धारा या झरने का रूप ले लेता है.
गर्मियों में भी क्यों नहीं सूखते
किशन मलड़ा कहते हैं कि गर्मियों में बारिश कम होने के बावजूद कुछ प्राकृतिक जलस्रोतों से पानी निकलता रहता है. इसकी प्रमुख वजह यह है कि जमीन के भीतर जमा पानी धीरे-धीरे बाहर आता रहता है. सर्दियों और मानसून के दौरान जमा हुआ पानी कुछ समय तक इन जलस्रोतों के प्रवाह को बनाए रख सकता है. घने जंगल, मिट्टी में नमी और चट्टानों की बनावट भी पानी के जमीन में समाने और उसके प्रवाह को प्रभावित करती है. जिन क्षेत्रों में भूजल का भंडारण बेहतर होता है, वहां धारे लंबे समय तक चलते रह सकते हैं.
संस्कृति से क्या कनेक्शन
किशन मलड़ा कहते हैं कि उत्तराखंड में नौले और धारे केवल पेयजल के साधन नहीं, बल्कि लोकजीवन, परंपरा और आस्था से भी जुड़े हैं. पुराने समय में गांवों में नौलों के आसपास पत्थरों से विशेष संरचनाएं बनाई जाती थीं. कई स्थानों पर धार्मिक प्रतीक और देवी-देवताओं की मूर्तियां भी स्थापित की जाती थीं. इन जलस्रोतों को पवित्र मानने की परंपरा ने लोगों को इनके प्रति जिम्मेदारी का एहसास कराया. सामुदायिक स्तर पर इनकी सफाई और देखभाल की जाती थी. इस तरह जल संरक्षण स्थानीय संस्कृति और सामाजिक जीवन का हिस्सा बना रहा.
क्या आगे भी बच पाएंगे
बदलते मौसम, अनियमित बारिश, वनों के क्षरण और बढ़ते निर्माण के बीच प्राकृतिक जलस्रोतों का संरक्षण जरूरी हो गया है. इनके आसपास कचरा फेंकने, गंदा पानी छोड़ने और जलग्रहण क्षेत्र को नुकसान पहुंचाने से बचना चाहिए. जंगलों और स्थानीय वनस्पतियों का संरक्षण भी पानी के प्राकृतिक चक्र को बनाए रखने में मदद कर सकता है. हालांकि प्राकृतिक रूप से साफ दिखने वाले पानी में भी हानिकारक सूक्ष्मजीव या दूसरे दूषित पदार्थ हो सकते हैं. इसलिए नियमित सफाई, पानी की गुणवत्ता की जांच और जरूरत के अनुसार पानी को सुरक्षित तरीके से उपचारित करना जरूरी है. धारे और नौले पहाड़ों की अनमोल जल विरासत हैं. इन्हें बचाना जरूरी है.