नीला ड्रम केस: मुस्कान-साहिल को सजा-ए-मौत, दोषियों के लिए आगे क्या हैं रास्ते
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Meerut Blue Drum Murder Case: मेरठ के चर्चित सौरभ राजपूत हत्याकांड में जिला अदालत ने दोषियों मुस्कान और साहिल को सजा-ए-मौत सुनाई है. मुस्कान ने अपने प्रेमी साहिल के साथ मिलकर पति सौरभ की हत्या की थी और शव को नीले ड्रम में सीमेंट से बंद किया गया था. दोषियों के पास हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति तक का रास्ता बचा है. जिला अदालत के फैसले भर से इन दोनों को फांसी पर नहीं लटकाया जा सकता.
सौरभ राजपूत हत्याकांड में मुस्कान-साहिल को सजा-ए-मौत की सजा मिली है.
Meerut Blue Drum Murder Case: मेरठ के चर्चित सौरभ राजपूत हत्याकांड में निचली अदालत का फैसला आ गया है. मेरठ की जिला और सत्र अदालत ने हत्याकांड के दोषियों मुस्कान और साहिल को सजा-ए-मौत सुनाई है. मुस्कान-साहिल ने जिस दरिंदगी से सौरभ की हत्या की थी, उसे भुलाया नहीं जा सकता. बुधवार, 14 अक्टूबर को अदालत में मुस्कान और साहिल को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश किया गया. जिला जज अरविंद कुमार मिश्रा ने यह सजा सुनाई. पुलिस ने मुस्कान और उसके प्रेमी साहिल शुक्ला को 19 मार्च 2025 को गिरफ्तार किया था. इस हत्याकांड को 3 मार्च 2025 को अंजाम दिया गया था. सौरभ की हत्या के बाद शव के टुकड़े कर उसे एक नीले ड्रम में भर दिया गया और उसमें सीमेंट डालकर बंद कर दिया गया था.
लेकिन क्या अदालत से मौत की सजा मिलते ही मुस्कान और साहिल को फांसी दे दी जाएगी? ऐसा नहीं है. दोनों के पास फैसले को चुनौती देने के कानूनी रास्ते मौजूद हैं. हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति के पास दया याचिका तक की प्रक्रिया बाकी है. इस मामले में मुस्कान की बेटी और परिवार के भविष्य को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं.
क्या था नीला ड्रम हत्याकांड?
मेरठ के सौरभ राजपूत हत्याकांड ने मार्च 2025 में पूरे देश को झकझोर दिया था. सौरभ मर्चेंट नेवी में काम कर चुके थे और लंदन से भारत लौटे थे. पुलिस के मुताबिक 3 मार्च 2025 को उनकी हत्या की गई. आरोप था कि मुस्कान और साहिल ने मिलकर वारदात को अंजाम दिया. इसके बाद शव के टुकड़े कर उसे नीले ड्रम में रखा गया और सीमेंट से बंद कर दिया गया. पुलिस जांच के दौरान दोनों की भूमिका सामने आई. 19 मार्च 2025 को मुस्कान और साहिल को गिरफ्तार कर लिया गया. मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने परिस्थितिजन्य साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर अपना पक्ष रखा. रिपोर्टों के मुताबिक मुकदमे में 22 गवाहों के बयान दर्ज हुए और 126 सुनवाइयां हुईं.
30 सितंबर 2026 को जिला अदालत ने दोनों को हत्या समेत संबंधित अपराधों में दोषी करार दिया था. इसके बाद अदालत ने सजा तय करने के लिए अलग से सुनवाई की. 14 अक्टूबर को दोनों को मौत की सजा सुनाई गई. अभियोजन पक्ष ने भी दोनों के लिए मृत्युदंड की मांग की थी.
अब मुस्कान-साहिल के सामने क्या हैं रास्ते?
मौत की सजा सुनाए जाने का मतलब यह नहीं है कि अब अगला कदम सीधे फांसी है. भारतीय कानून में मृत्युदंड के मामलों में कई स्तरों पर न्यायिक समीक्षा का प्रावधान है.
- पहला रास्ता हाईकोर्ट का है. जिला एवं सत्र अदालत की ओर से सुनाई गई मौत की सजा को हाईकोर्ट की पुष्टि के बिना लागू नहीं किया जा सकता. संबंधित कानूनी प्रक्रिया के तहत मामला हाईकोर्ट के पास जाएगा. वहां सजा और उससे जुड़े साक्ष्यों की जांच होगी. हाईकोर्ट सजा की पुष्टि कर सकता है, उसे बदल सकता है या कानून के मुताबिक अन्य आदेश दे सकता है.
- दूसरा रास्ता सुप्रीम कोर्ट का है. हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने पर दोषी सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकते हैं. अदालत में वे फैसले और सजा को चुनौती दे सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद भी कुछ सीमित न्यायिक विकल्प, जैसे समीक्षा याचिका उपलब्ध हो सकते हैं.
- तीसरा रास्ता दया याचिका का है. दोषी संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति और अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल के समक्ष दया याचिका देने का रास्ता अपना सकते हैं. इन संवैधानिक शक्तियों के तहत सजा में राहत देने, उसे कम करने या माफ करने जैसे फैसले लिए जा सकते हैं.
इसलिए अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि मुस्कान और साहिल को फांसी कब दी जाएगी. इसके लिए पहले मृत्युदंड की न्यायिक पुष्टि और उसके बाद उपलब्ध अपील तथा दया याचिका की प्रक्रिया का पूरा होना जरूरी है.
मुस्कान की बेटी का क्या होगा?
इस मामले का एक संवेदनशील पहलू मुस्कान की बेटी का भविष्य भी है. रिपोर्टों के मुताबिक मुस्कान की एक बेटी है. सजा सुनाए जाने से पहले मुस्कान ने अपनी बेटी से मिलने की इच्छा जताई थी. टाइम्स ऑफ इंडिया की 14 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक वह कई दिनों से बेटी से मिलने की मांग कर रही थीं, लेकिन बच्ची को जेल नहीं लाया गया था. मां को मौत की सजा मिलने से बच्चे की अभिरक्षा अपने आप किसी एक व्यक्ति को नहीं मिल जाती. बच्ची किसके साथ रहेगी, इसकी व्यवस्था उसके सर्वोत्तम हित को ध्यान में रखकर की जाएगी. परिवार के सदस्य उसकी देखभाल कर सकते हैं. यदि परिवार में उपयुक्त देखभाल की व्यवस्था नहीं बनती या बच्चे की सुरक्षा को लेकर सवाल उठते हैं, तो बच्ची को संबंधित बाल कल्याण विभाग के हवाले किया जा सकता है. इस मामले में बच्ची की उम्र, वर्तमान अभिरक्षा, परिवार की परिस्थितियों और किसी अदालत या बाल कल्याण प्राधिकरण के आदेश की पुष्टि जरूरी है.