महिला मोची देख लोग होते हैरान! 12 साल की उम्र से काम कर रहीं रामबाई, पति की मौत के बाद संभाली घर की जिम्मेदारी

महिला मोची देख लोग होते हैरान! 12 साल की उम्र से काम कर रहीं रामबाई, पति की मौत के बाद संभाली घर की जिम्मेदारी


बिलासपुर. छत्तीसगढ़ के बिलासपुर के कलेक्टर कार्यालय के पास एक छोटी सी दुकान लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचती है. दुकान भले ही छोटी हो लेकिन यहां बैठने वाली रामबाई के हौसले किसी से कम नहीं हैं. रामबाई महज 12 साल की उम्र से मोची का काम कर रही हैं. बूट पॉलिश करने से लेकर जूते-चप्पल सिलने और उनकी मरम्मत करने तक का काम वह वर्षों से अपने हाथों से करती आ रही हैं. पति के निधन के बाद घर की जिम्मेदारी और भी बढ़ गई, उनका बेटा भी दिव्यांग है. इसके बावजूद रामबाई ने किसी के सामने हाथ फैलाने के बजाय मेहनत को अपना सहारा बनाया. आज वह अपनी छोटी सी पेटी और दुकान के सहारे रोज मेहनत करती हैं और जितनी कमाई होती है, उसी से घर का खर्च चलाती हैं. उनकी जिंदगी का संघर्ष बताता है कि हालात चाहें कितने भी मुश्किल क्यों न हों, हौसला हो तो इंसान अपने पैरों पर खड़ा रह सकता है.

रामबाई ने लोकल 18 से कहा कि उनका जन्म गरीब परिवार में हुआ था. बचपन में जब उन्होंने देखा कि आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण उनकी पढ़ाई नहीं हो पा रही है, तो उन्होंने मन में ठान लिया कि वह किसी पर निर्भर नहीं रहेंगी और अपना काम खुद करेंगी. इसी सोच के साथ उन्होंने करीब 12 साल की उम्र में मोची का काम शुरू किया. इसके बाद यही काम उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गया और आज भी वह पूरी मेहनत के साथ इसे कर रही हैं.

जूते-चप्पल से लेकर सैंडल तक की मरम्मत
रामबाई सिर्फ बूट पॉलिश ही नहीं करतीं बल्कि जूते, चप्पल, सैंडल और स्लीपर की मरम्मत भी करती हैं. जरूरत पड़ने पर नए सामान भी तैयार कर लेती हैं. वर्षों के अनुभव के कारण इस काम में उनके हाथ पूरी तरह से सधे हुए हैं. पुरुषों के इस पारंपरिक काम को एक महिला द्वारा इतने लंबे समय से करते देख कई लोग हैरान भी होते हैं लेकिन रामबाई ने कभी इसे अपने रास्ते की बाधा नहीं बनने दिया.

पति के निधन के बाद बढ़ी जिम्मेदारी
रामबाई के पति भी उनके साथ इसी काम में हाथ बंटाते थे. दोनों मिलकर मेहनत करते और जो कमाई होती, उसी से परिवार का गुजारा चलता था. रामबाई बताती हैं कि एक समय ऐसा भी था, जब पति-पत्नी मिलकर दिनभर में बहुत कम पैसे कमाते थे लेकिन उसी कमाई से राशन और जरूरत का सामान लाकर घर चलाते थे. पति के निधन के बाद परिवार की जिम्मेदारी पूरी तरह रामबाई के कंधों पर आ गई.

दिव्यांग बेटे के साथ परिवार की जिम्मेदारी
रामबाई का एक बेटा और तीन बेटियां हैं. बेटियां अपने-अपने ससुराल में हैं जबकि उनका बेटा दिव्यांग है. ऐसे में घर की जिम्मेदारी काफी हद तक रामबाई पर ही है. उम्र बढ़ने के बावजूद वह आज भी रोज अपनी दुकान पर बैठती हैं और मेहनत करके परिवार का खर्च चलाती हैं.

रोज की कमाई तय नहीं, फिर भी मेहनत जारी
रामबाई बताती हैं कि उनकी रोज की कमाई तय नहीं होती. कभी 100 से 200 रुपये मिल जाते हैं, तो कभी 400-500 रुपये तक की कमाई हो जाती है. जिस दिन जितना काम मिलता है, उसी हिसाब से आमदनी होती है. इसके बावजूद वह अपनी मेहनत से खुश हैं और कहती हैं कि मेहनत से कमाए पैसे में ही उन्हें संतोष मिलता है.

छोटी पेटी ही रामबाई की पूंजी और सहारा
रामबाई की दुकान में बड़ी सजावट या महंगा सामान नहीं है. उनके पास एक छोटी सी पेटी और मोची के काम का जरूरी सामान है. यही पेटी उनके लिए सिर्फ सामान रखने का डिब्बा नहीं बल्कि उनकी मेहनत, आत्मसम्मान और रोजी-रोटी का सहारा है. वर्षों से वह इसी के सहारे अपना काम कर रही हैं.

महिलाओं के लिए प्रेरणा बनीं रामबाई
रामबाई की कहानी उन महिलाओं के लिए प्रेरणा है, जो मुश्किल परिस्थितियों के सामने हार मान लेती हैं. सीमित साधनों, उम्र और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बावजूद वह आज भी अपने पैरों पर खड़ी हैं. उनकी छोटी सी दुकान यह संदेश देती है कि काम छोटा या बड़ा नहीं होता, मेहनत और आत्मसम्मान सबसे बड़ी पूंजी होती है.



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