2.5 किलोमीटर चौड़े महाकाय एस्टेरॉयड की खोज, सिर्फ 4 मिनट में पूरा घूम जाता है!
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वेरा सी. रुबिन ऑब्जर्वेटरी के डेटा से वैज्ञानिकों ने अब तक का सबसे बड़ा और सबसे तेज घूमने वाला एस्टेरॉयड खोज निकाला है. 491384 नाम का यह एस्टेरॉयड करीब 2.53 किलोमीटर चौड़ा है और महज 4.18 मिनट में अपना एक चक्कर पूरा कर लेता है. यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन के वैज्ञानिकों ने नए सॉफ्टवेयर की मदद से यह खोज की है.
Vera Rubin ऑब्जर्वेटरी ने की दुर्लभ एस्टेरॉयड की खोज. (AI Generated Photo)
यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन के वैज्ञानिकों ने एक बेहद अजीब एस्टेरॉयड खोजा है. 491384 नाम का यह विशालकाय पत्थर करीब 2.53 किलोमीटर चौड़ा है. यह दैत्याकार चट्टान महज 4.18 मिनट में अपनी धुरी पर एक चक्कर पूरा कर लेती है. विज्ञान के नियमों के मुताबिक इतने बड़े एस्टेरॉयड को घूमने में कम से कम सवा दो घंटे का समय लगना चाहिए. अगर कोई बड़ा पिंड इससे तेज गति से घूमे तो वह अंतरिक्ष में बिखर जाता है. इसके बावजूद यह भारी भरकम पत्थर इतनी भयंकर रफ्तार पर भी खुद को साबुत बनाए हुए है. चिली में मौजूद वेरा सी. रुबिन वेधशाला के ताजा डेटा में इस एस्टेरॉयड का पता चला. वैज्ञानिकों की टीम ने एक खास कंप्यूटर सॉफ्टवेयर की मदद से इस रहस्यमय पिंड की पहचान की है.
अंतरिक्ष के स्पिन बैरियर को इस विशाल चट्टान ने कैसे तोड़ा?
150 मीटर से बड़े एस्टेरॉयड के घूमने की एक तय सीमा है. इस सीमा को वैज्ञानिक स्पिन बैरियर कहते हैं. इस नियम के तहत कोई भी बड़ा पिंड 2.2 घंटे से पहले एक चक्कर पूरा नहीं कर सकता. अंतरिक्ष में मौजूद ज्यादातर एस्टेरॉयड धूल और पत्थरों के कमजोर मलबे से बने होते हैं. इन्हें वैज्ञानिक भाषा में रूबल पाइल कहा जाता है.
यह मलबा सिर्फ अपने हल्के गुरुत्वाकर्षण के सहारे आपस में टिका रहता है. अगर ऐसा कोई पिंड सवा दो घंटे से तेज रफ्तार में घूमेगा, तो उस पर बाहर की तरफ भारी खिंचाव पड़ेगा. इस खिंचाव की वजह से पत्थर के टुकड़े अंतरिक्ष में छितरा जाएंगे. एस्टेरॉयड 491384 का आकार ढाई किलोमीटर से भी ज्यादा है. स्पिन बैरियर के नियम को धता बताते हुए यह महज सवा चार मिनट में अपनी धुरी पर घूम रहा है.
2.53 किलोमीटर का एस्टेरॉयड हर 4.18 मिनट में लगा रहा चक्कर. (AI वीडियो)
हजारों किलोमीटर दूर घूमते पत्थरों की रफ्तार कैसे नापते हैं वैज्ञानिक?
धरती पर बैठे वैज्ञानिक अंतरिक्ष में तैरते पत्थरों को सीधे घूमते हुए नहीं देख सकते. इसके लिए वे सूरज से आने वाली रोशनी के परावर्तन की मदद लेते हैं. सौर मंडल में घूमने वाले ज्यादातर एस्टेरॉयड का आकार पूरी तरह गोल नहीं होता. जब यह बेडौल चट्टानें घूमती हैं, तो इनकी सतह से टकराकर लौटने वाली रोशनी घटती और बढ़ती रहती है.
दूरबीन इस रोशनी के उतार-चढ़ाव को समय के साथ एक ग्राफ में दर्ज करती है. खगोलविद इसी पैटर्न के आधार पर इनके घूमने की रफ्तार का हिसाब लगाते हैं. हालांकि दूरबीन से किसी पिंड को लगातार देखना संभव नहीं हो पाता. अवलोकनों के बीच लंबे अंतराल की वजह से गणना में भारी गलतियां होने का खतरा बना रहता है. कई बार अधूरा डेटा मिलने से वैज्ञानिक गलत नतीजों पर पहुंच जाते हैं.
गलत डेटा को छांटकर नए सॉफ्टवेयर ने इस एस्टेरॉयड को कैसे पकड़ा?
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