जंतर-मंतर धरना स्थल कब से, पहले कहां होते थे प्रोटेस्ट, 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?


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Jantar Mantar Denotify As Protest Site: केंद्र सरकार ने जंतर-मंतर की आधिकारिक प्रदर्शन स्थल की मान्यता खत्म कर दी है. अब दिल्ली में रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और सीबीडी ग्राउंड को नए धरना स्थल के रूप में तय किया गया है. 1990 के दशक से जंतर-मंतर की पहचान प्रोटेस्थ स्थल की रही है. 2017 में एनजीटी ने यहां प्रोटेस्ट पर रोक लगा दी थी. लेकिन, 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शन के अधिकार को बहाल कर दिया था.

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जंतर-मंतर धरना स्थल कब से, पहले कहां होते थे विरोध, 2018 में SC ने क्या कहा?Zoom

जंतर-मंतर इलाके में तैनात पुलिस बल. फोटो- रायटर

Jantar Mantar Denotify As Protest Site: मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जारी विरोध प्रदर्शनों के बीच केंद्र सरकार ने जंतर-मंतर को आधिकारिक प्रदर्शन स्थल के रूप में मिली मान्यता खत्म कर दी है. विपक्षी दल और कॉकरोच जनता पार्टी लगातार जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति मांग रहे थे. इसी बीच केंद्र सरकार का यह फैसला आया है. अब दिल्ली में आधिकारिक तौर पर तीन धरना-प्रदर्शन स्थल तय किए गए हैं. इनमें रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली का सीबीडी ग्राउंड शामिल हैं. लेकिन इन सभी जगहों में सबसे चर्चित स्थल जंतर-मंतर ही रहा है. करीब तीन दशक से यह दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों की पहचान बना हुआ था. आखिर जंतर-मंतर कब धरना-प्रदर्शन का केंद्र बना? इससे पहले लोग कहां विरोध जताते थे और अब कहां प्रदर्शन कर सकेंगे?

कब प्रदर्शन स्थल बना जंतर-मंतर?

1990 के दशक की शुरुआत से पहले दिल्ली में बड़े प्रदर्शनों का प्रमुख केंद्र बोट क्लब हुआ करता था. यह इंडिया गेट और मौजूदा कर्तव्य पथ के पास का इलाका है. 1988 में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में करीब पांच लाख किसानों ने यहां भारी विरोध प्रदर्शन किया. इस कारण पूरी सेंट्रल दिल्ली ठप हो गई. इसके बाद बड़े जमावड़ों और सुरक्षा संबंधी चिंताओं के बीच बोट क्लब पर प्रदर्शन सीमित कर दिए गए. 1993 के आसपास जंतर-मंतर विरोध प्रदर्शनों की प्रमुख जगह के रूप में उभरा. हालांकि, इसे किसी एक औपचारिक घोषणा के जरिए प्रदर्शन स्थल नहीं बनाया गया था. धीरे-धीरे होने वाले प्रदर्शनों की वजह से उसको यह पहचान मिली.

वेधशाला से विरोध प्रदर्शनों के केंद्र तक

जंतर-मंतर का निर्माण जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने 1724 में कराया था. इसका मूल उद्देश्य खगोलीय गणनाएं और ग्रहों की स्थिति का अध्ययन करना था. लेकिन समय के साथ यह राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों का प्रमुख केंद्र बन गया. 2011 में अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और 2023 में पहलवानों का प्रदर्शन इसकी पहचान से जुड़े बड़े उदाहरण हैं. संसद और केंद्र सरकार के दफ्तरों के करीब होने के कारण यहां होने वाले प्रदर्शनों को मीडिया का ध्यान भी मिलता रहा. हालांकि, सीमित जगह, यातायात, शोर और आसपास के लोगों की परेशानियों को लेकर विवाद भी होते रहे.

2017 में रोक, 2018 में SC का फैसला

अक्टूबर 2017 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने ध्वनि प्रदूषण और स्थानीय लोगों की परेशानियों का हवाला देते हुए जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों पर रोक लगा दी थी. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. 23 जुलाई 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने के खिलाफ फैसला दिया. अदालत ने स्पष्ट किया कि शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने के मौलिक अधिकार और स्थानीय लोगों के अधिकारों के बीच संतुलन जरूरी है. हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं था कि बिना अनुमति कहीं भी प्रदर्शन किया जा सकता है. पुलिस की अनुमति और संबंधित नियमों का पालन जरूरी बना रहा. इसके बाद फिर से जंतर-मंतर पर छोटे-मोटे प्रदर्शन होने लगे. दिल्ली पुलिस की नियमावली के मुताबिक जंतर-मंतर पर 1000 की अधिकतम संख्या तक ही लोगों को प्रदर्शन की अनुमति थी. लेकिन, अब केंद्र सरकार ने प्रदर्शन स्थल के रूप में इसकी पहचान खत्म करने का फैसला किया है.

अब कहां होंगे प्रदर्शन?

दिल्ली में अब तीन वैकल्पिक प्रदर्शन स्थल निर्धारित किए गए हैं.

  • रामलीला मैदान: दिल्ली में बड़े राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों का पुराना केंद्र. अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान भी यहां बड़ी संख्या में लोग जुटे थे.
  • बुराड़ी मैदान: राजधानी के उत्तरी हिस्से में स्थित यह मैदान बड़े जमावड़ों के लिए वैकल्पिक जगह होगा.
  • सीबीडी ग्राउंड: पूर्वी दिल्ली में स्थित इस मैदान को भी निर्धारित प्रदर्शन स्थलों में शामिल किया गया है.

इन जगहों पर प्रदर्शन के लिए भी पुलिस की अनुमति और सुरक्षा संबंधी नियमों का पालन करना होगा.

क्या जंतर-मंतर से विरोध की आवाज कमजोर होगी?

जंतर-मंतर की सबसे बड़ी खासियत संसद और सत्ता के केंद्रों के करीब होना थी. यहां प्रदर्शन करने वाले समूह अपनी मांगें केंद्र सरकार और राष्ट्रीय मीडिया तक आसानी से पहुंचाने की कोशिश करते थे. अब दूसरे स्थलों पर जाने से प्रदर्शनकारियों की रणनीति और मीडिया तक पहुंच प्रभावित हो सकती है. दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों का भूगोल पहले भी बदलता रहा है. बोट क्लब के बाद रामलीला मैदान और फिर जंतर-मंतर प्रमुख केंद्र बने.



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