2018 की वो डरावनी फिल्म, जिसका खौफ 8 साल से है कायम | सिर्फ 7 बातें, जिसने बदल डाले हॉरर मूवीज के मायने

2018 की वो डरावनी फिल्म, जिसका खौफ 8 साल से है कायम | सिर्फ 7 बातें, जिसने बदल डाले हॉरर मूवीज के मायने


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8 Years Movie ‘Tumbbad’: कुछ फिल्में अपने समय से इतनी आगे की होती हैं कि बॉक्स ऑफिस पर शुरुआती भीड़ में वे धुंधली पड़ सकती हैं. लेकिन, समय के साथ उनका जादू दर्शकों को अपनी ओर खींचने लगता है. डायरेक्टर राही अनिल बर्वे की 12 अक्तूबर 2018 में रिलीज हुई ‘तुम्बाड’ ऐसी ही एक अनोखी सिनेमाई मास्टरपीस है. जब यह फिल्म पहली बार थिएटर में आई, तो इसे वह कमर्शियल सक्सेस नहीं मिली जिसकी यह हकदार थी, लेकिन धीरे-धीरे वर्ड-ऑफ-माउथ और इसकी असाधारण दुनिया ने इसे कल्ट क्लासिक का दर्जा दिलाया. जब इसे 2024 में फिर से रिलीज किया गया, तो जो दर्शक इसे देखने आए और इसने जो नए रिकॉर्ड बनाए, उन्होंने साबित कर दिया कि सच्ची कला कभी पुरानी नहीं होती. जैसे ही ‘तुम्बाड’ ने अपनी रिलीज के 8 शानदार साल पूरे किए और सिनेफाइल्स इसके मोस्ट अवेटेड सीक्वल ‘तुम्बाड 2’ का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं. यह देखना दिलचस्प है कि इस फिल्म को इतना खास क्या बनाता है. सिर्फ वेस्टर्न हॉरर फिल्मों की नकल करने के बजाय भारतीय जड़ों और लोककथाओं से जुड़ी इस कहानी ने फिल्ममेकिंग के हर पहलू पर नई राह दिखाई. तो आइए, उन 7 खास बातों और अनोखी फिल्म बनाने की टेक्नीक के बारे में विस्तार से जानते हैं.

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नई दिल्ली. ‘तुम्बाड’ बॉलीवुड की उन खास फिल्मों में से एक है, जिसने बड़े पर्दे पर लोककथा और फैंटेसी की दुनिया को एक अलग अंदाज में पेश किया. सालों के दौरान इस फिल्म ने अपनी एक मजबूत फैन फॉलोइंग बनाई है और समय के साथ इसकी लोकप्रियता लगातार बढ़ती गई है. 2024 में दोबारा रिलीज होने पर भी फिल्म को शानदार रिस्पॉन्स मिला. यह भारतीय सिनेमा की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली री-रिलीज फिल्मों में शामिल हुई और इसने नए रिकॉर्ड भी बनाए. अब जब ‘तुम्बाड’ अपनी रिलीज के 8 साल पूरे कर रही है और ‘तुम्बाड 2’ को लेकर भी दर्शकों की उत्सुकता बढ़ रही है, तो फैंस एक बार फिर इस अनोखी दुनिया को बड़े पर्दे पर देखने के लिए उत्साहित हैं. उम्मीद है कि इसका सीक्वल कहानी और विजुअल्स को एक और बड़े स्तर पर लेकर जाएगा. फिल्म की आठवीं सालगिरह और फ्रेंचाइजी को लेकर बढ़ती चर्चाओं के बीच, यह देखना दिलचस्प है कि आखिर ऐसा क्या था जिसने पहली ‘तुम्बाड’ को एक खास फिल्म बना दिया.

1. पारंपरिक हॉरर से अलग, भारतीय लोककथाओं पर आधारित कहानी: जहां ज्यादातर भारतीय हॉरर फिल्में भुतहा हवेली, शैतानी गुड़िया या बदला लेने वाली आत्माओं जैसे जाने-पहचाने तरीकों पर निर्भर रहती हैं. वहीं ‘तुम्बाड’ ने भारतीय लोककथाओं की एक गहरी और डरावनी दुनिया को चुना. फिल्म में देवी की संतान हस्तर की कथा दिखाई गई है, जिसे कभी पूजा न किए जाने का श्राप मिला था. इस कहानी के जरिए फिल्म ने अपनी एक अलग पौराणिक दुनिया बनाई. इसकी कहानी ने प्रेरणा के लिए वेस्टर्न हॉरर फिल्मों की तरफ देखने के बजाय मराठी लोकपरंपराओं और भारतीय लोककथाओं का सहारा लिया. यही वजह है कि फिल्म की दुनिया अपनी जड़ों से जुड़ी हुई और बेहद डरावनी महसूस होती है.

2. अचानक डराने वाले सीन नहीं, माहौल से पैदा होता है डर: हॉरर फिल्मों में अक्सर अचानक तेज आवाजों और चौंका देने वाले कैमरा शॉट्स के जरिए डर पैदा किया जाता है. लेकिन, ‘तुम्बाड’ ने इसके लिए एक अलग रास्ता चुना. फिल्म धीरे-धीरे तनाव पैदा करती है और अपने माहौल, खामोशी और रहस्य के जरिए दर्शकों को डर की दुनिया में ले जाती है. पुरानी हवेली के गलियारे हों, छिपे हुए गर्भगृह जैसा रहस्यमयी स्थान हो या आसपास की हर छोटी-बड़ी चीज, सब मिलकर फिल्म की दुनिया को और गहरा बनाते हैं. यहां दर्शक सिर्फ एक हॉरर फिल्म नहीं देखते, बल्कि खुद को एक ऐसी डरावनी दुनिया में फंसा हुआ महसूस करते हैं, जिससे बाहर निकलना आसान नहीं है.

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3. प्रोडक्शन डिजाइन, जो खुद कहानी कहता है: ‘तुम्बाड’ की दुनिया को पर्दे पर उतारने में कई साल लगे और इसकी मेहनत फिल्म के हर फ्रेम में दिखाई देती है. फिल्म का प्रोडक्शन डिजाइन सिर्फ कहानी की पृष्ठभूमि नहीं है, बल्कि यह समय के गुजरने, रहस्यों और धीरे-धीरे बढ़ते पतन को भी दिखाता है. आजादी से पहले के महाराष्ट्र की पत्थर की इमारतों से लेकर पुश्तैनी हवेली के बारीक इंटीरियर तक, नितिन जिहानी चौधरी और राकेश यादव ने मिलकर एक ऐसी दुनिया बनाई, जो अपने भीतर कई रहस्य छिपाए हुए महसूस होती है. फिल्म का हर कोना अपने आप में एक कहानी कहता है.

4. बारिश, कीचड़ और धुंध भी हैं कहानी का अहम हिस्सा: बहुत कम फिल्में मौसम का इस्तेमाल ‘तुम्बाड’ की तरह करती हैं. फिल्म में लगातार होती बारिश सिर्फ एक विजुअल इफेक्ट नहीं है, बल्कि ऐसा लगता है जैसे बारिश भी कहानी के किरदारों में से एक हो. गीली दीवारें, फिसलन भरी मिट्टी, ठंडी धुंध और आसमान में छाए बादल, ये सब मिलकर एक ऐसा माहौल बनाते हैं, जिसमें किरदार और दर्शक दोनों घिरे हुए महसूस होते हैं. सिनेमैटोग्राफर पंकज कुमार ने इस उदास और रहस्यमयी माहौल को इतनी खूबसूरती से कैमरे में कैद किया कि पर्दे पर गीली मिट्टी और पुरानी लकड़ी तक का एहसास होने लगता है.

5. लालच की ऐसी कहानी, जो इंसान को अंदर तक झकझोर देती है: ‘तुम्बाड’ की असली कहानी सिर्फ एक राक्षस या किसी रहस्यमयी गड्ढे की नहीं है. यह इंसान के भीतर छिपे लालच की कहानी है. फिल्म लालच को सिर्फ एक बुरी आदत के रूप में नहीं दिखाती, बल्कि इसे एक ऐसे अभिशाप की तरह पेश करती है, जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचता है. यह दिखाती है कि जरूरत से ज्यादा पाने की चाह किस तरह इंसान की समझ, उसके परिवार और उसकी इंसानियत को खत्म कर सकती है. यही विषय फिल्म को सिर्फ एक सामान्य मॉन्स्टर फिल्म तक सीमित नहीं रहने देता, बल्कि इसे इंसानी कमजोरी और इच्छाओं पर एक ऐसी कहानी बना देता है, जो हर दौर में प्रासंगिक रहती है.

6. विनायक के किरदार में सोहम शाह का जबरदस्त बदलाव: सोहम शाह ने सिर्फ विनायक राव का किरदार नहीं निभाया, बल्कि फिल्म के लंबे प्रोडक्शन के दौरान इस किरदार को पूरी तरह जिया. विनायक कोई पारंपरिक हीरो नहीं है. वह चालाक है, अपने फायदे के बारे में सोचता है और अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए जुनूनी है. इसके बावजूद उसके किरदार में एक अलग आकर्षण है. सोहम शाह ने विनायक के घमंड, उसकी जिद और उसके भीतर छिपी इंसानी कमजोरियों को बेहद बारीकी से पर्दे पर उतारा. उनका दमदार अभिनय और किरदार के प्रति शारीरिक समर्पण फिल्म की काल्पनिक दुनिया को भी असली और विश्वसनीय बना देता है.

7. फिल्म खत्म होने के बाद भी दिमाग में बनी रहती है इसकी दुनिया: ज्यादातर हॉरर फिल्में खत्म होने के साथ ही अपना असर छोड़ देती हैं, लेकिन ‘तुम्बाड’ का अनुभव अलग है. फिल्म देखने के काफी समय बाद भी इसके दृश्य, इसका संगीत और इसके पीछे छिपे अर्थ दर्शकों के दिमाग में बने रहते हैं. रिलीज के 8 साल बाद भी फैंस इसके प्रतीकों और कहानी की परतों पर चर्चा करते हैं, इसके डरावने माहौल की तारीफ करते हैं और इसके शानदार विजुअल्स को दोबारा देखना पसंद करते हैं. ‘तुम्बाड’ ने साबित किया कि भारतीय सिनेमा में भी बड़े विचारों और अनोखी कहानियों पर आधारित फिल्में बनाई जा सकती हैं, वो भी अपनी कलात्मक सोच से समझौता किए बिना. यही वजह है कि इस फिल्म ने भारतीय सिनेमा में अपनी एक खास जगह बनाई है. ‘तुम्बाड 2’ को लेकर बढ़ती उम्मीदों के साथ अब सबकी नजरें इस फ्रेंचाइजी पर टिकी हैं. लेकिन अगर पहली फिल्म ने कुछ साबित किया है, तो वह यह कि एक यादगार सिनेमाई अनुभव बनाने के लिए दमदार कहानी, बेहतरीन तकनीक और कुछ नया करने का साहस सबसे ज्यादा मायने रखता है.

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