मद्रास जा रहे थे, तभी आया महादेव का स्वप्न, रक्सौल के संजय नाथ महाराज की कहानी
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Raxaul Kali Temple Sanjay Nath Maharaj Story: रक्सौल के प्रसिद्ध दसमुखी काली मंदिर के पीठाधीश्वर सेवक संजय नाथ जी महाराज ने स्वामी विवेकानंद से प्रेरित होकर मात्र 17 वर्ष की उम्र में संन्यास लिया था. वे शिक्षा, चिकित्सा और भोजन के क्षेत्र में लगातार समाज सेवा कर रहे हैं. जानें इनकी अनकही कहानी.
आदित्य गौरव/ पूर्वी चंपारण: बिहार की धरती पर कई संत-महात्माओं ने अपनी साधना और समाज सेवा से अलग पहचान बनाई है. इसी कड़ी में पूर्वी चंपारण जिले के रक्सौल स्थित प्रसिद्ध दसमुखी काली न्यास मंदिर के पीठाधीश्वर सेवक संजय नाथ जी महाराज भी शामिल हैं. वे वर्षों से मां काली की आराधना के साथ शिक्षा, चिकित्सा, आवास और भोजन के क्षेत्र में समाज सेवा कर रहे हैं. स्वामी विवेकानंद को अपना आदर्श मानने वाले महाराज की संन्यास यात्रा काफी रोचक है.
सामान्य परिवार में जन्म, विवेकानंद से मिली प्रेरणा
सेवक संजय नाथ जी महाराज बताते हैं कि वे एक सामान्य कायस्थ परिवार से ताल्लुक रखते हैं. उनके पिता होम्योपैथिक चिकित्सक थे. आम युवाओं की तरह वे भी पढ़ाई-लिखाई में जुटे रहते थे. लेकिन स्वामी विवेकानंद के व्यक्तित्व और विचारों का उन पर गहरा प्रभाव था. वे भी उनके आदर्शों पर चलना चाहते थे. इसी प्रेरणा के बीच उन्होंने महज 17 वर्ष की उम्र में संन्यास धारण कर लिया.
पटना से मद्रास की यात्रा में आया शिवजी का स्वप्न
महाराज के अनुसार एक बार वे इंजीनियरिंग में दाखिला लेने के लिए पटना से मद्रास जा रहे थे. इसी यात्रा के दौरान उन्हें स्वप्न में भगवान शिव के दर्शन हुए. उनका कहना है कि शिवजी ने उन्हें संन्यास धारण करने और मंदिर निर्माण की दिशा में आगे बढ़ने का संकेत दिया. उन्होंने ऐसा स्वप्न दोबारा भी देखा और स्वप्न में ही भगवान शिव से एक मंत्र मिलने की बात भी बताते हैं. इन अनुभवों के बाद उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़कर संन्यास का मार्ग अपना लिया. उनके इस फैसले का परिवार में विरोध भी हुआ. महाराज बताते हैं कि उनकी मां को चिंता थी कि संन्यास लेने के बाद उनका बेटा भोजन के लिए भिक्षाटन करेगा. उनके मुताबिक उन्होंने कभी भिक्षा मांगकर भोजन नहीं किया. वे मां काली की भक्ति में लीन रहे. जो भोजन सहज रूप से उपलब्ध होता उसी से गुजारा करते थे.
सात बीघा जमीन पर बना दसमुखी काली मंदिर
संजय नाथ जी महाराज के मुताबिक रामकिशुन राम नाम के एक बड़े जमींदार ने उन्हें सात बीघा जमीन दान में दी. इसी जमीन पर वर्ष 1990 में मंदिर निर्माण शुरू हुआ. 1993 में मंदिर बनकर तैयार हो गया. आज यह मंदिर रक्सौल में श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है.
दान से जरूरतमंदों की मदद
महाराज के अनुसार मंदिर में प्राप्त दान का उपयोग शिक्षा, चिकित्सा, आवास और भोजन से जुड़े सामाजिक कार्यों में किया जाता है. धार्मिक साधना के साथ जरूरतमंदों की सहायता करना उनके सेवा कार्यों का अहम हिस्सा है. सामान्य परिवार से संन्यास तक का उनका सफर आज भी लोगों के बीच चर्चा का विषय है.