दुनिया के ‘RBI’ को सिखाया काम का तरीका, इन 2 अर्थशास्त्रियों को मिलेगा नोबेल
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Economics Nobel Prize: अमेरिकी अर्थशास्त्रियों रॉबर्ट ई. हॉल और माइकल वुडफोर्ड को अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा हुई है. इन दोनों का शोध अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने और केंद्रीय बैंकों की नीतियों की नींव मजबूत करने पर आधारित था. इन्होंने अपने शोध से साबित किया कि परिवारों और कंपनियों के फैसले पूरी अर्थव्यवस्था को कैसे प्रभावित करते हैं.
अमेरिकी अर्थशास्त्रियों रॉबर्ट ई. हॉल और माइकल वुडफोर्ड को अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया है.
Economics Nobel Prize: महंगाई क्यों बढ़ती है? रोजगार पर आर्थिक मंदी का क्या असर पड़ता है? संकट के समय सरकार और केंद्रीय बैंकों को कब और कैसे कदम उठाने चाहिए? इन सवालों के जवाब तलाशने वाले दो अमेरिकी अर्थशास्त्रियों रॉबर्ट ई. हॉल और माइकल वुडफोर्ड को अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया है. उन्हें यह सम्मान अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने वाली नीतियों की सैद्धांतिक नींव मजबूत करने के लिए दिया गया है. उनके शोध से भारत के रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया यानी आरबीआई सहित दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों और सरकारों को आर्थिक झटकों से निपटने के बेहतर तरीके मिले हैं.
दुनिया के ‘RBI’ को क्या सिखाया?
भारत में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) महंगाई पर काबू पाने के लिए ब्याज दरों में बदलाव करता है. सरकार भी टैक्स, खर्च और दूसरी आर्थिक नीतियों के जरिए अर्थव्यवस्था को संभालने की कोशिश करती है. दुनिया के दूसरे देशों में भी केंद्रीय बैंक और सरकारें ऐसे कदम उठाते हैं. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि किस परिस्थिति में कौन-सा कदम उठाया जाए और उसका असर अर्थव्यवस्था पर कैसे पड़ेगा?
रॉबर्ट हॉल और माइकल वुडफोर्ड का शोध इसी सवाल से जुड़ा है. दोनों ने ऐसे आर्थिक मॉडल विकसित करने में योगदान दिया, जिनमें यह समझने की कोशिश की जाती है कि परिवारों और कंपनियों के फैसले पूरी अर्थव्यवस्था को कैसे प्रभावित करते हैं. लोग कितना खर्च करेंगे, कितना बचाएंगे और कंपनियां निवेश को लेकर क्या निर्णय लेंगी, इन सबका असर उत्पादन, रोजगार और महंगाई पर पड़ता है. इन फैसलों को समझे बिना केवल ब्याज दर या सरकारी खर्च में बदलाव करना हमेशा प्रभावी नहीं हो सकता. दोनों अर्थशास्त्रियों के काम ने नीतियां बनाने वालों को यह समझने में मदद की कि आर्थिक बदलावों का असर किस तरह फैलता है और उन्हें कम करने के लिए कब हस्तक्षेप करना चाहिए.
महंगाई और रोजगार से जुड़ा है शोध?
मान लीजिए दुनिया में पेट्रोल-डीजल की कीमतें अचानक बढ़ जाती हैं. इससे कंपनियों की उत्पादन लागत बढ़ सकती है. कंपनियां अपने उत्पाद महंगे कर सकती हैं, जिससे महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा होता है. दूसरी ओर, बढ़ती लागत और कमजोर मांग के कारण कंपनियां निवेश या नई भर्ती में कटौती भी कर सकती हैं.
ऐसी स्थिति में केंद्रीय बैंक के सामने मुश्किल फैसला होता है. ब्याज दरें बढ़ाने से महंगाई पर काबू पाने में मदद मिल सकती है, लेकिन कर्ज महंगा होने से निवेश और खपत पर दबाव भी पड़ सकता है. दूसरी तरफ ब्याज दरें घटाने से आर्थिक गतिविधियों को सहारा मिल सकता है, मगर महंगाई बढ़ने का जोखिम भी रहता है.
सरकार के सामने भी इसी तरह की चुनौती होती है. उसे तय करना पड़ता है कि अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए कितना खर्च किया जाए और किन क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जाए. हॉल और वुडफोर्ड के शोध ने ऐसे फैसलों के पीछे काम करने वाले आर्थिक सिद्धांतों को मजबूत किया. इससे नीतियां बनाने वालों को यह समझने का बेहतर आधार मिलता है कि आर्थिक झटकों के दौरान कौन-से कदम उपयोगी हो सकते हैं. हालांकि, उनका शोध कोई ऐसा तय नुस्खा नहीं देता जिसे हर देश में एक ही तरीके से लागू किया जा सके. किसी नीति का असर उस देश की आर्थिक स्थिति, महंगाई, रोजगार और लोगों के व्यवहार पर भी निर्भर करता है.
कौन हैं रॉबर्ट हॉल और माइकल वुडफोर्ड
रॉबर्ट ई. हॉल अमेरिका की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं. उनके शोध का एक अहम पहलू यह समझना है कि परिवार अपने खर्च और बचत के फैसले कैसे लेते हैं और इन फैसलों का व्यापक अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ता है. माइकल वुडफोर्ड कोलंबिया यूनिवर्सिटी में राजनीतिक अर्थव्यवस्था के प्रोफेसर हैं. उनका काम मौद्रिक नीति और आर्थिक सिद्धांतों से जुड़ा है. उन्होंने यह समझने में योगदान दिया कि केंद्रीय बैंक की नीतियों और भविष्य को लेकर उसके संकेतों का कंपनियों, परिवारों और बाजारों के फैसलों पर क्या असर पड़ता है.