पटना. बिहार विधान परिषद की आठ सीटों पर होने वाला चुनाव इस बार सामान्य चुनावी मुकाबले से कहीं आगे निकल गया है. चार स्नातक और चार शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में होने वाले चुनाव के लिए एनडीए से लेकर राजद, कांग्रेस, वाम दल और जन सुराज तक पूरी ताकत लगा रहे हैं. इसका कारण केवल विधान परिषद में सीटें जीतना नहीं, बल्कि बांकीपुर उपचुनाव के बाद बदले राजनीतिक माहौल में अपनी ताकत साबित करना भी है. राजनीति के जानकार कहते हैं कि ऐसा इसलिए भी है क्योंकि इस चुनाव में एनडीए की एकजुटता, राजद-कांग्रेस के रिश्ते और प्रशांत किशोर की राजनीतिक पकड़ की परीक्षा होने वाली है.
बांकीपुर उपचुनाव के बाद बदला समीकरण
दरअसल, कुछ दिन पहले ही बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव हुआ था, जिसके परिणाम के बाद बिहार की सियासत में काफी हलचल मच गी थी. इस परिणाम के बाद एनडीए की कमजोरी और लोकप्रियता में कमी की चर्चा तेज हुई, जिससे एनडीए की परेशानी बढ़ी. वहीं, विरोधी दलों पर भी बड़ा असर पड़ा और प्रशांत किशोर एक खिलाड़ी की तरह उभर कर आए हैं और बदलाव की बात कह इस बार भी एमएलसी चुनाव के मैदान में उतरे हैं. ऐसे में इस चुनाव के परिणाम से आने वाले समय की राजनीति के प्रभावित होने की पूरी संभावना बताई जा रही है, जिसकी आहट सियासी दलों को सुनाई पड़ रही है.
8 सीट के लिए NDA ने झोंकी ताकत, साझा रैली
बता दें कि सभी आठ सीटों पर जीत हासिल हो, इसे लेकर एनडीए ने पूरी ताकत लगा रखी है. एनडीए के पांचों दल एक साथ बैठक कर न सिर्फ रणनीति बना रहे हैं, बल्कि 13 अक्टूबर और 15 अक्टूबर को एनडीए के तमाम बड़े नेता एक साथ एक मंच पर आकर चुनावी प्रचार करेंगे. मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, दोनों डिप्टी सीएम, जदयू-भाजपा-लोजपा-हम-रालोमो के प्रमुख नेता शिक्षक और स्नातक वोटरों को साधेंगे. वहीं, प्रशांत किशोर भी लगातार चुनावी प्रचार में लगे हैं और विरोधियों पर निशाना साध रहे हैं.
दो सीट पर NDA में ही घमासान, अनंत सिंह और रामपुकार फैक्टर
एनडीए की एकजुटता दिखाने की एक और बड़ी वजह दो सीट पर अंदरूनी घमासान है. सारण और पटना स्नातक सीट पर एनडीए के ही नेता एनडीए उम्मीदवार के लिए परेशानी का कारण बने हैं. पटना स्नातक में जदयू के नीरज कुमार के खिलाफ मोकामा विधायक अनंत सिंह ने जन सुराज के अनुज सिंह को समर्थन दे दिया है. सारण शिक्षक में भाजपा के पुष्कर आनंद के खिलाफ बीजेपी के ही पूर्व एमएलसी रामपुकार सिन्हा निर्दलीय ताल ठोक रहे हैं. इससे समर्थकों में असमंजस है, जिसे दूर करने के लिए एनडीए को एक मंच पर आना पड़ रहा है.
महागठबंधन बिखरा, कांग्रेस-आरजेडी अलग, साख का सवाल
महागठबंधन के लिए भी यह एमएलसी चुनाव बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि कांग्रेस राजद से अलग होकर अपने उम्मीदवार उतार चुकी है, वहीं राजद ने 7 उम्मीदवार उतारकर कांग्रेस और वामदल को झटका दे दिया है. अगर आरजेडी जीती तो विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार से उबरने का मौका मिलेगा और कांग्रेस पर दबाव बना रहेगा. वहीं, कांग्रेस ने अकेले लड़कर सम्मानजनक सीट जीत ली तो राजद के लिए परेशानी खड़ी हो सकती है और बिहार में बगैर राजद एक नए विपक्ष के निर्माण की चर्चा तेज हो सकती है. यही वजह है कि पहली बार स्नातक-शिक्षक जैसा सीमित वोटर वाला चुनाव इतना महत्वपूर्ण हो गया है.
नतीजों से आगे बिहार की राजनीति के संकेत
बहरहाल, आगामी 23 अक्टूबर को होने वाले मतदान और 27 अक्टूबर को आने वाले नतीजों से यह पता चलेगा कि शिक्षक और स्नातक मतदाताओं के बीच किस दल की पकड़ मजबूत है. यह चुनाव अपने आप में विधानसभा चुनाव का विकल्प नहीं है, लेकिन इसके नतीजे राजनीतिक दलों के मनोबल, संगठन और आपसी संबंधों पर असर डाल सकते हैं. यही कारण है कि आठ सीटों का यह मुकाबला बिहार की राजनीति में खास महत्व रखता है. एनडीए के लिए एकजुटता दिखाना, राजद-कांग्रेस के लिए अपनी ताकत साबित करना और जन सुराज के लिए बांकीपुर की जीत के बाद राजनीतिक विस्तार का संकेत देना, तीनों ही इस चुनाव की बड़ी कसौटियां हैं.