मंडला. महाराजपुर थाना क्षेत्र के सेमरकोल गांव से एक गंभीर मामला सामने आया है. यहां चंद्रजोत का बीज खाने से 7 बच्चे बीमार हो गए. इनमें से 5 बच्चे एक ही घर के हैं और 2 पड़ोस के बच्चे हैं. खेल-खेल में बच्चों ने चंदरजोत के बीज खाए थे. उल्टी और दस्त होने की शिकायत पर परिजन बच्चों को लेकर जिला अस्पताल पहुंचे. बच्चे गंभीर हालत मे अस्पताल मे भर्ती हैं. सभी का ईलाज जारी है. अस्पताल में भर्ती बच्चों की मांओं ने पूरे घटना क्रम को विस्तार से बताया है.
एक पीड़ित बच्चे की मां ने कहा, “इन लोगों ने चंद्रजोत के बीज खाए हैं. हम घर में नहीं थे. बाहर चले गए थे. मतलब खेत-बाड़ी में. शाम को हम घर आए तो फिर इन्हीं लोगों ने बताया था. तब हमें मालूम हुआ. सात बच्चे हैं. खेल-खेल में खाए थे.” चंदरजोत के बीज खाकर बीमार पड़ने का यह पहला मामला नहीं है. इससे पहले भी चंदरजोत के फल और बीज खाने से कई बच्चों के बीमार होने की खबरें आती रही हैं. नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के मुताबिक इसका असर 6-8 घंटे तक रहता है. डॉक्टर्स 24 घंटे तक पीड़ितों को ऑब्जर्वेशन में रखते हैं. हम आपको चंदरजोत के बारे में विस्तार से बता रहे हैं. यह बच्चों के लिए इतनी आसानी से उपलब्ध कैसे है? चंदरजोत कहां-कहां मिलता है? इसके फायदे या नुक्सान क्या-क्या है? बायोडीजल फ्यूल से इसका कनेक्शन है?
चंदरजोत क्या है?
चंद्रजोत को कई जगह पर रतनजोत कहा जाता है. इसका साइंटिफिक नाम जैट्रोफा कर्कस (Jatropha curcas) है. इस पौधे की गिनती झाड़ी के तौर पर उगती है. कही पर भी आसानी से उग जाती है. इसके लिए मिट्टी की गुणवत्ता मायने रखती है. उपजाऊ और खराब, दोनों ही तरह की जमीनों पर उग जाता है. इसलिए इस पौधे तक बच्चों की पहुंच आसान होती है. इसका पौधा ज्यादा बड़ा नहीं होता. दुनियाभर में पाया जाता है. कई जहों पर इसे बगीचों और खेतों के चारों ओर सिक्योरिटी बाड़ के रूप में उगाया जाता है, क्योंकि इसे जानवर नहीं खाते हैं.
चंदरजोत के पौधे की पहचान कैसे करें
जैट्रोफ़ा की पत्तियां कटी-फटी (lobed), हरी और चिकनी होती हैं. इसके फूल छोटे और पीले होते हैं और ज़्यादातर पत्तियों के नीचे छिपे रहते हैं. इसका तना मोटा, हरा और चिकना होता है, जो नीचे की तरफ़ लकड़ी जैसा हो जाता है. इसके बीज साइज में अरंडी (castor) के बीज जैसे और काले रंग के होते हैं. इसके फल में तीन हिस्सों वाला हरा कैप्सूल होता है, जिसमें तीन बीज वाले हिस्से (cocci) होते हैं. जब कैप्सूल का रंग हरे से पीला हो जाता है, तो बीज पक जाते हैं.
जहरीला होता है चंदरजोत का पौधा
नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के मुताबिकक टॉक्सिकोलॉजी और फोरेंसिक मेडिसिन की किताबों में इस पौधे के बारे में ज़्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है. कहा जाता है कि भारतीय आयुर्वेद में इसके फायदे गिनाए गए हैं. कहा जाता है जैट्रोफ़ा के बीजों का इस्तेमाल ठंड लगने पर पसीना आने, पेट दर्द (colic), ऐंठन, कब्ज़ आदि के इलाज के तौर पर किया जाता है. लेकिन इसका इस्तेमाल उचित तरीके और मात्रा में करना होता है. चंद्रजोत में कर्सिन (curcin), रिसिन (ricin) और सायनिक एसिड (cyanic acid) जैसे टॉक्सएल्ब्यूमिन (toxalbumin) होते हैं, जो रिसिनोलिक एसिड से जुड़े होते हैं.
चंदरजोत का फल या बीज खाने के असर
रिसिन के कई कार्डियोटॉक्सिक (दिल पर बुरा असर डालने वाले) और लाल रक्त कोशिकाओं को नष्ट करने वाले प्रभाव देखे गए हैं. पौधे के सभी हिस्से ज़हरीले होते हैं, लेकिन बीजों में रिसिन की मात्रा सबसे ज़्यादा होती है और इसलिए ये बहुत ज़हरीले होते हैं. बीज खाने के बाद होने वाले बुरे असर में उल्टी, दस्त, पेट दर्द और गले में जलन शामिल हैं. बीज खाने के पंद्रह मिनट के अंदर ही उल्टी और दस्त शुरू हो सकते हैं. बीज खाने के लगभग आधे घंटे बाद पेट में तेज़ दर्द महसूस होता है. डिप्रेशन और सर्कुलेटरी कोलैप्स (रक्त संचार प्रणाली का काम करना बंद कर देना) की भी खबरें आई हैं और कहा जाता है कि बच्चों में ऐसा अक्सर होता है.
चंदरजोत के बीज से बनाया जा रहा बायोफ्यूल
जैट्रोफ़ा के बीज के तेल को बायोफ्यूल के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश की जा रही है. सरकार के औद्योगिक अनुसंधान संस्थान, सेंट्रल सॉल्ट एंड मरीन केमिकल्स रिसर्च इंस्टीट्यूट (CSMCRI) का लक्ष्य बायोडीज़ल बनाने के लिए जैट्रोफ़ा का पौधा उगाना है. एक रिपोर्ट के मुताबिक, चंदरजोत के बीजों में अन्य फसलों की बीजों से 37 प्रतिशत ज्यादा तेल होता है. इसके बीजों से निकले 5 किलों तेल से 1Kg बायोडीजल निकलता है. यह जलने पर धुआं नहीं छोड़ता, जो पर्यावरण के लिए भी फायदेमंद होता है. वाहनों से नुकसान नहीं होता. इसके अलावा, इसके तेल को डायरेक्ट लालटेन में डालकर भी जलाया जा सकता है. खाना बनाने वाले स्टोव में इसके तेल का इस्तेमाल किया जा चुका है.