1 साल तक प्रदर्शन नहीं कर सकेंगे अभिजीत दिपके? शर्तें तोड़ीं तो क्या होगा
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CJP Protest: अभिजीत दिपके, आशुतोष रांका और सौरव दास को स्पेशल एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की अदालत ने रिहा कर दिया है. उनसे धारा 126 के तहत मुचलका भरवाया गया है, जिसके तहत वह एक साल तक कोई ऐसा काम नहीं करेंगे जिससे शांति भंग का खतरा हो. ऐसे में सवाल ये है कि क्या सीजेपी के ये तीनों नेता अब एक साल तक किसी प्रदर्शन में हिस्सा नहीं ले पाएंगे? अधिवक्ता अंकिता तिवारी से जानते हैं.
CJP protest : अभिजीत दिपके, आशुतोष रांका और सौरव दास (फाइल-फोटो)
अभिजीत दिपके, आशुतोष रांका और सौरव दास को छोड़ दिया गया है. तीनों से एक स्पेशल बांड भरवाया गया है. यह एक तरह का मुचलका है. तीनों पर शर्त है कि वह एक साल तक कोई ऐसा काम नहीं करेंगे जिससे शांति भंग हो. इसके अलावा तीनों के जंतर-मंतर पर जाने पर रोक लगाई गई है. यह फैसला दिल्ली कैंट स्थित स्पेशल एग्जीयूटिव मजिस्ट्रेट की अदालत ने दिया है. इन शर्तों का पालन करने की सख्त हिदायत भी दी गई है. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या CJP के तीनों नेता 1 साल तक कोई प्रदर्शन नहीं कर सकेंगे? अगर शर्तें तोड़ी गईं तो आखिर क्या होगा?
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन बुलाया गया था. अनुमति न होने की वजह से पुलिस ने यहां प्रदर्शनकारियों के जुटने पर पाबंदी लगा दी थी. 10 अक्टूबर को सीजेपी के अभिजीत दिपके, आशुतोष रांका और सौरव दास को विमान से उतरने से पहले ही हिरासत में ले लिया गया था. उन पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 126/170 के तहत कार्रवाई की गई थी. इस धारा के तहत पुलिस बिना वारंट के तब गिरफ्तारी कर सकती है जब उसे ये आशंका हो कि संबंधित व्यक्ति शांति व्यवस्था के लिए खतरा हो सकता है. रविवार को सुबह स्पेशल कार्यकारी मजिस्ट्रेट की अदालत ने तीनों को पेश किया गया और वहां से सशर्त रिहा कर दिया गया.
क्या है BNS की धारा 126 और 170
इलाहाबाद हाईकोर्ट की अधिवक्ता अंकिता तिवारी के मुताबिक भारतीय न्याय संहिता की धारा 126 और 170 शांति व्यवस्था बनाए रखने से संबंधित है. खासतौर से धारा 170 पुलिस को बिना वारंट के गिरफ्तार करने का अधिकार देती है, तब जब लगे कि कोई व्यक्ति गंभीर अपराध करने वाला है. इस धारा के तहत हिरासत में लिए गए या गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को 24 घंटे के अंदर एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना होता है. जैसा अभिजीत, आशुतोष और सौरव के मामले में किया गया.
इसके अलावा धारा 126 के तहत आरोपी व्यक्ति से मुचलका यानी बॉन्ड भरवाया जाता है. दरअसल जब धारा 170 के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाता है और कोर्ट को लगता है कि शांति भंग की आशंका है तो कोर्ट उसे धारा 126 के तहत नोटिस जारी करती है. आरोपी का पक्ष सुना जाता है और उस व्यक्ति से एक तय राशि का बॉन्ड भरवाया जाता है. यह अधिकतम 1 साल तक के लिए होता है जिसमें व्यक्ति को इस बात की गारंटी देनी होती है कि वह इस अवधि में शांति भंग नहीं करेगा और न ही कोई कानून तोड़ेगा.
कानून में क्या है शांति भंग की परिभाषा?
भारत के संविधान में शांति भंग की कोई सटीक परिभाषा नहीं है. हालांकि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय न्याय संहिता में सामान्य कानूनी भाषा में इसके बारे में बताया गया है. इसके मुताबिक शांति भंग उस स्थिति को माना जाता है जब किसी सार्वजिनक स्थान पर अभद्र भाषा का प्रयोग किया जाता है, मारपीट या दंगे के हालात पैदा किए जाते हैं. ऐसी किसी भाषा का इस्तेमाल किया जाता है जिससे दो समुदायों के बीच तनाव या नफरत पैदा हो. कानून व्यवस्था के लिए खतरा बने या किसी व्यक्ति को धमकी देना जिससे सार्वजिनक शांति को खतरे की संभावना हो.
अगर नियम तोड़े तो क्या होगा?
अगर किसी व्यक्ति से धारा 126 के तहत बांड भरवाया गया है और वह उसका उल्लंघन करता है तो पुलिस उसे गिरफ्तार कर जेल भेज सकती है. इसके अलावा बांड की वो राशि भी जब्त कर ली जाती है जितने का मुचलका भरा गया था. शर्तें तोड़ने के दौरान जिस तरह का अपराध किया गया है उसके हिसाब से नई धाराओं के तहत कानूनी कार्रवाई की जाती है.
तो क्या 1 एक साल प्रदर्शन नहीं कर पाएंगे अभिजीत दिपके?
कॉकरोच जनता पार्टी के संयोजक अभिजीत दिपके, आशुतोष रांका और सौरव दास से एक साल तक का बॉन्ड भरवाया गया है. इसमें शर्त ये है कि वह ऐसी किसी भी गतिविधि में शामिल नहीं होंगे जो शांति भंग का कारण बने. इलाहाबाद हाईकोर्ट की अधिवक्ता अंकिता तिवारी के मुताबिक इसका ये अर्थ कतई नहीं है कि बॉन्ड भरने वाला व्यक्ति प्रदर्शन नहीं कर सकता.
वह शांतिपूर्वक प्रदर्शनों में हिस्सा ले सकता है. हालांकि उसे ये ध्यान रखना होगा कि ऐसी स्थिति न बने जो कानून व्यवस्था के लिए खतरा हो. वह किसी तरह से कानून हाथ में नहीं ले सकता और न ही ऐसी कोई बात बोल सकता है जिससे सार्वजनिक शांति भंग होने के हालात बनें. हालांकि शांतिपूर्वक प्रदर्शन से पहले भी उन्हें प्रशासन की अनुमति अनिवार्य रूप से लेनी होगी.