नैनीताल में सजेगा मां दुर्गा का दरबार, 16 से 20 अक्टूबर तक गूंजेंगे जयकारे, बंगाल से लेकर कश्मीर तक की दिखेगी संस्कृति

नैनीताल में सजेगा मां दुर्गा का दरबार, 16 से 20 अक्टूबर तक गूंजेंगे जयकारे, बंगाल से लेकर कश्मीर तक की दिखेगी संस्कृति


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Nainital Durga Puja Mahotsav 2026: उत्तराखंड की सरोवर नगरी नैनीताल में इस बार शारदीय नवरात्र के अवसर पर 70वें भव्य दुर्गा पूजा महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है. 16 से 20 अक्टूबर तक चलने वाले इस पांच दिवसीय आयोजन में धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ देश के विभिन्न राज्यों से आने वाले सांस्कृतिक दल अपनी कला की अनूठी प्रस्तुतियां देंगे. मल्लीताल स्थित डीएसए मैदान में लगने वाले मेले और बंगाली पर्यटकों की बढ़ती आवाजाही से शहर का माहौल पूरी तरह उत्सवमय हो चुका है.

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नैनीताल: उत्तराखंड की सरोवर नगरी नैनीताल में शारदीय नवरात्र के बीच दुर्गा पूजा महोत्सव की रौनक देखने को मिलेगी. शहर में 16 से 20 अक्टूबर तक 70वें मां दुर्गा पूजा महोत्सव का आयोजन किया जाएगा. पांच दिवसीय यह महोत्सव धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक विरासत और आपसी मेलजोल का अनूठा संगम बनने जा रहा है. महोत्सव के दौरान जहां मां दुर्गा की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाएगी, वहीं देश के विभिन्न राज्यों से आने वाले सांस्कृतिक दल अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से भारत की विविध परंपराओं और लोककलाओं की झलक पेश करेंगे. इसके साथ ही मल्लीताल स्थित डीएसए मैदान में लगने वाले मेले को लेकर भी स्थानीय लोगों और पर्यटकों में उत्साह है.

दुर्गा पूजा कमेटी के उपाध्यक्ष त्रिभुवन फर्त्याल ने बताया कि महोत्सव का शुभारंभ 16 अक्टूबर को सुबह 11 बजे कलश यात्रा के साथ किया जाएगा. इसके बाद पांच दिनों तक धार्मिक अनुष्ठानों का सिलसिला जारी रहेगा. इस दौरान मां दुर्गा की पूजा-अर्चना, पुष्पांजलि, देवी भोग और संध्या आरती जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे. महोत्सव में महाष्टमी का विशेष महत्व रहेगा. इस दिन दीपदान और अर्धरात्रि पूजा आकर्षण का केंद्र होंगे. वहीं 20 अक्टूबर को विजयदशमी के अवसर पर पूजा-अर्चना के समापन के बाद देवी प्रतिमा का विसर्जन किया जाएगा. पांच दिनों तक शहर में भक्तिमय माहौल के साथ उत्सव की रौनक बनी रहेगी.

जम्मू-कश्मीर से राजस्थान तक दिखेगी संस्कृति की झलक

नैनीताल का दुर्गा पूजा महोत्सव केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अलग-अलग राज्यों की संस्कृति को करीब लाने का भी माध्यम बनता है. इस बार जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा समेत विभिन्न राज्यों के सांस्कृतिक दल अपनी कला और परंपराओं का प्रदर्शन करेंगे. इन प्रस्तुतियों के जरिए स्थानीय लोगों और पर्यटकों को देश की विविध सांस्कृतिक विरासत को जानने और समझने का अवसर मिलेगा. अलग-अलग क्षेत्रों के लोकनृत्य, पारंपरिक वेशभूषा और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियां महोत्सव को खास बनाएंगी. यही वजह है कि दुर्गा पूजा का यह आयोजन नैनीताल की सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा माना जाता है.

बंगाली पर्यटकों की बढ़ती है आवाजाही, बाजारों में भी रौनक

दुर्गा पूजा को लेकर पर्यटकों के साथ ही स्थानीय लोगों में भी काफी उत्साह देखा जा रहा है. स्थानीय निवासी डॉ. सरोज पालीवाल ने बताया कि शारदीय नवरात्र और दुर्गा पूजा के दौरान नैनीताल में बंगाली पर्यटकों की आवाजाही बढ़ जाती है. इस दौरान बाजारों में भी उनकी पसंद और जरूरतों के अनुरूप सामान उपलब्ध कराया जाता है. शहर में त्योहार के साथ पर्यटन गतिविधियां बढ़ने से बाजारों की रौनक भी अलग दिखाई देती है. उन्होंने बताया कि यह समय सांस्कृतिक आदान-प्रदान के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है. बंगाल से आने वाले लोग अपनी परंपराओं, खानपान और त्योहार मनाने के तरीकों के जरिए एक-दूसरे की संस्कृति को करीब से समझते हैं. इन दिनों नैनीताल में उत्साह और उमंग का माहौल बना हुआ है, जो त्योहार की खुशियों को और खास बना रहा है.

डीएसए मैदान में लगने वाले मेले का भी इंतजार

डॉ. सरोज बताती हैं कि दुर्गा पूजा महोत्सव के दौरान मल्लीताल स्थित डीएसए मैदान में लगने वाला मेला भी लोगों के आकर्षण का केंद्र रहता है. स्थानीय लोगों के साथ ही पर्यटक भी मेले में खरीदारी और घूमने का आनंद लेते हैं. मेले को लेकर लोगों में पहले से ही उत्सुकता बनी रहती है. कई लोग पिछले मेले में छूट गई खरीदारी को इस बार पूरा करने की योजना बनाते हैं. ऐसे में यह मेला धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन के साथ खरीदारी तथा मेलजोल का अवसर भी प्रदान करता है. उन्होंने बताया कि नैनीताल में इन दिनों मौसम में भी बदलाव महसूस किया जा रहा है. बारिश के बाद ठंड बढ़ने से शहर में सर्दी का अहसास होने लगा है. ऐसे मौसम के बीच दुर्गा पूजा महोत्सव और मेले का आयोजन उत्सव के माहौल को और खास बना रहा है. डॉ. सरोज पालीवाल ने कहा कि समय के साथ लोगों की जीवनशैली और त्योहार मनाने के तरीकों में बदलाव आया है. इसके बावजूद ऐसे आयोजन लोगों को अपनी परंपराओं से जोड़ने और विभिन्न संस्कृतियों को समझने का अवसर देते हैं.



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