Bajra Cultivation: छत्तीसगढ के सरगुजा जिले के बंदना में इन दिनों बाजरे की खेती बालियां फूटने के कगार पर है. ऐसे में जब ये दाने पककर फुट जायेंगे तब इसे काटकर सुखाकर अलग अलग खान पान में इसका उपयोग किया जाएगा. खासतौर पर रोटी बनती है, जो स्वाद से भरपूर और चासनी की तरह मीठी होती है. वही लई बनाई जाती है. साथ में अपने भोजन में पेज बनाकर पीने से शरीर तंदुरुस्त होता है. इसके अलावा पारंपरिक पेय हड़िया बनाने में इसका उपयोग किया जाता हैं. इसकी खेती दो अलाग-अलग समय में की जाती हैं. एक खेती का समय निकल गया जबकि दूसरा अभी बाकी है. देखिए ये रिपोर्ट…
बाजरे से बनती है लई और स्वादिष्ट रोटी
महिला फूल कुंवर ने लोकल 18 को बताया कि बाजरे का इस्तेमाल कई तरह के पारंपरिक व्यंजन बनाने में किया जाता है. बाजरे के दानों को पीसकर आटा तैयार किया जाता है, जिससे रोटी बनाई जाती है. इसके अलावा बाजरे से लई भी बनाई जाती है. ग्रामीणों के अनुसार, बाजरे की रोटी का स्वाद बेमिसाल होता है और इसे खाने में अलग ही मिठास महसूस होती है. यही वजह है कि आज भी कई ग्रामीण परिवार अपने भोजन में बाजरे से बने व्यंजनों को प्राथमिकता देते हैं.
कार्तिक वाला बाजरा खेतों में तैयार, दानों को इकट्ठा कर बनाते हैं भोजन
एक बुजुर्ग ग्रामीण ने बताया कि खेतों में दिखाई दे रहा बाजरा कार्तिक वाला बाजरा है. इसके पौधों में बालियां आती हैं, जिनमें दाने तैयार होते हैं. पकने के बाद इन दानों को काटकर इकट्ठा किया जाता है और सुखाकर खाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. बाजरे से रोटी के साथ-साथ पेज और लई जैसे पारंपरिक खाद्य पदार्थ भी तैयार किए जाते हैं. ग्रामीणों का कहना है कि यह अनाज उनके पारंपरिक खानपान का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है और आज भी इसकी उपयोगिता बनी हुई है.
कार्तिक और भादो, दो मौसम में होती है बाजरे की खेती
ग्रामीण मनसाय ने बताया कि बाजरे की खेती दो अलग-अलग मौसमों में की जाती है. एक कार्तिक वाला बाजरा होता है, जबकि दूसरा भादो वाला बाजरा कहलाता है. दोनों की खेती का समय अलग-अलग होता है. उनके मुताबिक, कार्तिक वाले बाजरे की फसल तैयार हो चुकी है, जबकि भादो वाले बाजरे की खेती का दूसरा चक्र आने वाला है. खेतों में बाजरे की बालियां निकलने और दाने तैयार होने के साथ ही ग्रामीण इसके इस्तेमाल की तैयारी करने लगते हैं.
बाजरे की रोटी में दूध जैसी मिठास, पीठा और पेज भी बनाते हैं ग्रामीण
मनसाय के अनुसार, बाजरे से रोटी और पीठा जैसे कई व्यंजन तैयार किए जाते हैं. इसकी रोटी का स्वाद इतना अच्छा होता है कि खाने पर दूध जैसी मिठास महसूस होती है. ग्रामीण इसे अपने रोजमर्रा के भोजन में शामिल करते हैं. बाजरे का इस्तेमाल केवल रोटी तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे पेज और अन्य पारंपरिक खाद्य पदार्थ भी बनाए जाते हैं. इस तरह बाजरा ग्रामीण परिवारों के भोजन में विविधता लाने के साथ पुरानी खानपान परंपराओं को भी जीवित रखे हुए है.
पारंपरिक हड़िया बनाने में भी होता है बाजरे का इस्तेमाल
बाजरे का उपयोग केवल भोजन बनाने तक सीमित नहीं है. फूल कुंवर ने बताया कि इसका इस्तेमाल पारंपरिक पेय हड़िया तैयार करने में भी किया जाता है. बाजरे से तैयार हड़िया का स्वाद अलग होता है. ग्रामीण क्षेत्रों में पीढ़ियों से चले आ रहे पारंपरिक खानपान और पेय तैयार करने के तरीकों में इस अनाज की अपनी विशेष भूमिका रही है.
पहले बड़े पैमाने पर होती थी खेती, अब घट रहा रकबा
मनसाय ने बताया कि उनके पूर्वज बड़े पैमाने पर बाजरे की खेती किया करते थे, पहले ग्रामीण परिवार अपनी जरूरत के मुताबिक बाजरा उगाते थे और उसी से आटा तैयार कर रोटी बनाते थे. आज भी कुछ परिवार इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं, लेकिन बाजरे की खेती पहले की तुलना में कम हो गई है. ग्रामीणों के मुताबिक, घर में उगाए गए बाजरे से रोटी बनाने की परंपरा आज भी कायम है.बाजार से आटा खरीदने के बजाय अपने खेत के बाजरे का इस्तेमाल करना उनके लिए खानपान की पुरानी परंपरा को बनाए रखने का एक तरीका है.
पारंपरिक अनाज और ग्रामीण संस्कृति का अहम हिस्सा है बाजरा
सरगुजा के ग्रामीण इलाकों में बाजरा केवल खेती की उपज नहीं, बल्कि पारंपरिक भोजन और ग्रामीण जीवनशैली का भी हिस्सा है. इससे बनने वाली लई, रोटी, पीठा और पेज जैसे व्यंजन पीढ़ियों से लोगों के खानपान में शामिल रहे हैं. हालांकि, बदलते समय के साथ इसकी खेती में कमी आई है, फिर भी ग्रामीण परिवार आज तक इसकी परंपरा को संभाले हुए हैं. ऐसे में बाजरे की खेती और इससे जुड़े पारंपरिक व्यंजनों को पहचान देना ग्रामीण खानपान की विरासत को आगे बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है.