अमेठी: जनपद के संग्रामपुर विकासखंड स्थित भौसिंहपुर गांव में विराजमान मां कालिका धाम न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यह एक प्राचीन ऐतिहासिक धरोहर भी है. इस मंदिर का इतिहास अयोध्या की राजकुमारी सुकन्या और महर्षि च्यवन मुनि से जुड़ा हुआ है. कहा जाता है कि मंदिर परिसर में स्थित अमृत कुंड के जल का स्पर्श मात्र से भक्तों के दुख-कष्ट दूर हो जाते हैं. यही कारण है कि यह स्थल आज भी हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है.
अमृत कुंड पर विराजमान है मां कालिका धाम
अमेठी के भौसिंहपुर गांव में स्थित सिद्धपीठ मां कालिका धाम की महिमा प्राचीन काल से प्रसिद्ध है. यह मंदिर अमृत कुंड के समीप स्थित है, जहां का जल चमत्कारी माना जाता है. मान्यता है कि इस कुंड के शीतल जल का स्पर्श मात्र ही सभी प्रकार के दुखों और कष्टों को समाप्त कर देता है. देवी पुराण, कालिका पुराण और श्रीमद्भागवत महापुराण जैसे ग्रंथों में भी इस मंदिर का उल्लेख मिलता है. भक्त अपनी-अपनी मान्यता के अनुसार यहां माता से मनोकामनाएं मांगते हैं. कोई टिकरी चढ़ाता है तो कोई घंटे बांधकर अपनी आस्था व्यक्त करता है. श्रद्धालुओं की भीड़ वर्षभर यहां बनी रहती है.
2000 साल पहले हुआ करता था घना जंगल
कहानी आज के 2000 वर्ष पूर्व की है जहां पौराणिक काल में मंदिर परिसर में घना जंगल था. यह स्थान महर्षि च्यवनमुनि की तपोस्थली थी. महर्षि तपस्या में इस कदर लीन हो गए कि उन्हें आसपास की गतिविधियों का कोई ध्यान ही नहीं रह गया. उनके शरीर पर दीमक लग गई. ऐसे में जंगल में राजा शरियाद आए. उनकी बेटी ने महर्षि की आंख में तिनका डाल दिया इससे उनका ध्यान भंग हो गया. नाराज महर्षि ने राजा की बेटी को श्राप दे दिया. इसके बाद राजा के सैनिकों में महामारी फैल गई. राजा को जब पता चला तो उन्होंने माफी मांगी. बाद में ऋषियों के निर्णय के अनुसार राजा ने अपनी राजकुमारी सुकन्या को च्यवन मुनि की सेवा के लिए छोड़ दिया. इसके बाद प्रजा व सैनिक महामारी से ठीक हो गए. यहां पर मां की प्रतिमा स्थापित की गई है. देवताओं के बाद अश्विन कुमार ने जब इस कुंड पर मां की आराधना की तो उन्हीं से प्रसन्न होकर मां अमृत कुंड पर स्वयं विराजमान हो गई और आज भी यहां पर मां की स्वयंभू मूर्ति विराजमान है.
पुरातत्व विभाग ने दी धरोहर की मान्यता
लोकल 18 से खास बातचीत में मंदिर के पुजारी महंत श्री महाराज ने कहा कि यह मंदिर पुरातत्व विभाग द्वारा धरोहर में दर्ज है. देश-विदेश से यहां पर भक्ति दर्शन पूजन करने आते हैं. वैदिक पुराण के साथ गीता में भी मां कालिका का जिक्र किया गया है. उन्होंने कहा कि यह महर्षि चमन जी की तपस्या का प्रभाव है. यह स्थान कालिकन के नाम से विख्यात है. गंगा और सरयू के मध्य में स्थित है. उत्तर में जितनी दूरी पर सरयू जी हैं, दक्षिण में उतनी ही दूरी पर गंगा जी हैं. इसीलिए ये ऋषियों की तपस्थली बनी. इसका वर्णन सुख सागर में है, बालिका पुराण में है, देवी भागवत में है, और श्रीमद्भागवत के नवें स्कंध के तीसरे अध्याय में भी वर्णित है.
माँ भगवती के चरित्र का पहला इतिहास नवें स्कंध के तीसरे अध्याय में ही मिलता है. यहां पर च्यवन ऋषि ने तपस्या की थी. च्यवन जी की आंखें राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या के द्वारा फोड़ दी गई थीं, इससे उन्हें बड़ी वेदना हुई. बाद में राजा आए, क्षमा याचना की और यहीं पर च्यवन जी की शादी सुकन्या के साथ हुई. मां कालिका का आवाहन उन्होंने किया. यहाँ पर सोम यज्ञ हुआ था, जिसमें अश्विनी कुमार आए थे और यज्ञ में उनको हिस्सा और अधिकार यहीं पर प्राप्त हुआ. इसीलिए इस स्थान का बहुत महत्व है.
अमृत कुंड में स्थापित हुईं कालिका धाम
संतों, मनुष्यों और देवताओं की आराधना पर माँ भगवती प्रसन्न होकर अपने गणों सहित इस अमृत की रक्षा के लिए अमृत कुंड पर एक शिला के रूप में स्थापित हो गईं. तब से यहाँ माँ भगवती की पूजा-अर्चना चली आ रही है. यहां के अमृत कुंड के जल का बड़ा महत्व है. सुबह का नीर लगाने से कई लोगों के चश्मे उतर गए हैं, कई लोगों की फुंसियां ठीक हो गई हैं. जिनको चर्मरोग होता है वो सवेरे स्नान करते हैं, चर्मरोग ठीक हो जाता है अमेठी ही नहीं, देश-विदेश के लोग भी यहां माता के दरबार में मत्था टेकने आते हैं.