Bageshwar News : पहाड़ों पर लकड़ी की ठेकी में क्यों जमाते हैं दही? खाते ही हो जाओगे दीवाने

Bageshwar News : पहाड़ों पर लकड़ी की ठेकी में क्यों जमाते हैं दही? खाते ही हो जाओगे दीवाने


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Curd Making Wooden Theki : पहाड़ों में कभी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा रहे लकड़ी के बर्तन आज भी लोगों को आकर्षित करते हैं. इन्हीं बर्तनों में ठेकी भी है. लकड़ी से तैयार होने वाला यह बर्तन दही जमाने के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है. ठेकी लकड़ी को खोखला करके बनाई जाती है. ठेकी में जमने वाली दही की बनावट और स्वाद सबसे अलग होता है. पहाड़ों के खानपान में पारंपरिक तरीके से जमाई गई दही आज भी कई लोगों की पसंद है. इसे मंडुवे की रोटी और दूसरे पहाड़ी व्यंजनों के साथ बड़े चाव से खाया जाता है.

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बागेश्वर. उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों की संस्कृति और परंपराएं यहां के रहन-सहन और खानपान में आज भी देखने को मिलती हैं. आधुनिक दौर में जहां घरों में प्लास्टिक, स्टील और कांच के बर्तनों का इस्तेमाल बढ़ गया है, पहाड़ों में कभी रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा रहे लकड़ी के बर्तन आज भी लोगों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं. इन्हीं बर्तनों में ठेकी भी है. लकड़ी से तैयार होने वाला यह बर्तन पुराने समय में दूध, दही और घी रखने के साथ ही दही जमाने के लिए भी इस्तेमाल किया जाता था. लोकल 18 से बागेश्वर के दिनेश प्रसाद बताते हैं कि ठेकी लकड़ी को खोखला करके बनाई जाती है. ठेकी में दही जमाने के लिए रखा जाता है. उचित तापमान मिलने पर दही जम जाती है. ठेकी में जमने वाली दही की बनावट और स्वाद लोगों को खास पसंद आते हैं. हालांकि, दही का गाढ़ापन केवल बर्तन पर निर्भर नहीं करता है. इसमें दूध की गुणवत्ता, तापमान, जमाने की प्रक्रिया और समय की भी भूमिका है.

दही का पानी हो जाता अलग

ठेकी में जमी दही से पानी अलग दिखाई देने की बात अक्सर सुनने को मिलती है. दरअसल, दही जमने के दौरान दूध के प्रोटीन का जाल बनता है, जिसमें पानी और अन्य तरल पदार्थ भी मौजूद रहते हैं. समय, तापमान और दही की बनावट के अनुसार इसमें से कुछ तरल अलग हो सकता है. इसे मट्ठा या व्हे कहा जाता है. हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि लकड़ी की ठेकी अपने आप दही का पानी पूरी तरह अलग कर देती है. दही के गाढ़ेपन और पानी अलग होने पर दूध की प्रकृति तथा जमाने की परिस्थितियों का भी प्रभाव पड़ता है.

इस्तेमाल के बाद न भूलें ये काम

दिनेश प्रसाद बताते हैं कि पहले के समय में पहाड़ी गांवों में घरों में लकड़ी के बर्तनों का खूब इस्तेमाल होता था. दूध को संभालकर रखना, दही जमाना और पारंपरिक खानपान की दूसरी जरूरतें पूरी करना इनके प्रमुख उपयोगों में शामिल था. ठेकी बनाने में लकड़ी का चयन, उसे सही आकार देना और अंदर से चिकना करना कारीगर के अनुभव पर निर्भर करता है. इसकी मजबूती और उपयोगिता के लिए लकड़ी को सही तरीके से तैयार करना जरूरी होता है. इस्तेमाल के बाद इसकी सफाई और अच्छी तरह सुखाना भी जरूरी है, ताकि नमी और गंदगी जमा न हो.

पीढ़ियों के अनुभव का प्रतीक

दिनेश प्रसाद के मुताबिक समय के साथ रसोई में इस्तेमाल होने वाले बर्तनों का स्वरूप बदल गया है, लेकिन ठेकी जैसे पारंपरिक बर्तन उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत की याद दिलाते हैं. पहाड़ों के खानपान में पारंपरिक तरीके से जमाई गई दही आज भी कई लोगों की पसंद है. इसे स्थानीय भोजन, मंडुवे की रोटी और दूसरे पहाड़ी व्यंजनों के साथ खाया जाता है. ठेकी केवल दही जमाने का बर्तन नहीं, बल्कि पहाड़ों के पुराने जीवन, स्थानीय कारीगरी और पीढ़ियों से चले आ रहे अनुभव का प्रतीक भी है. जरूरत है कि ऐसी पारंपरिक वस्तुओं की पहचान और उनसे जुड़ी जानकारी को अगली पीढ़ी तक पहुंचाया जाए, ताकि उत्तराखंड की यह सांस्कृतिक धरोहर आधुनिकता के बीच भी अपनी जगह बनाए रख सके.



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