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बांग्लादेश में तारिक रहमान सरकार और सेना प्रमुख जनरल वकार-उज-जमान के बीच तनाव की खबरें सामने आई हैं. सरकार ने सेना प्रमुख को विदेश मंत्रालय में डेपुटेशन पर भेजने की योजना बनाई थी, लेकिन सेना की कमान पर उनकी मजबूत पकड़ के कारण पीछे हटना पड़ा. इसके बाद राष्ट्रपति मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर सरकार के साथ उनके तनाव को कम करने में लगे हैं.
बांग्लादेश के आर्मी चीफ
Bangladesh PM News: बांग्लादेश में प्रधानमंत्री तारिक रहमान की सरकार और सेना प्रमुख जनरल वकार-उज-जमान के बीच टकराव की खबरें सामने आई हैं. नॉर्थ ईस्ट न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार ने सेना प्रमुख को उनके पद से हटाकर विदेश मंत्रालय (MoFA) में डेपुटेशन पर भेजने की योजना बनाई थी. लेकिन सेना की कमान पर वकार-उज-जमान की मजबूत पकड़ को देखते हुए सरकार को अपने कदम पीछे खींचने पड़े. इससे पहले पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दी के दबाव में इस्तीफे की बात सामने आई थी. वहीं दूसरी ओर राष्ट्रपति मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर की एक रिटायर्ड जनरल से मुलाकात ने इस पूरे घटनाक्रम को नया मोड़ दे दिया है.
रिपोर्ट में बांग्लादेश के राष्ट्रपति भवन बंगभवन और सेना से जुड़े दो सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि सेना प्रमुख को विदेश मंत्रालय भेजने का संदेश 7 अक्टूबर को दिया गया था. उस समय जनरल वकार-उज-जमान ऑस्ट्रेलिया में थे और वहां से अमेरिका जाने वाले थे. उन्हें यह जानकारी कथित तौर पर एक बांग्लादेश के एक बड़े सरकारी पद पर बैठे व्यक्ति ने फोन पर दी थी. हालांकि, सेना प्रमुख ने इसका विरोध किया और अपनी स्थिति मजबूत बनाए रखी. रिपोर्ट के मुताबिक, सेना की कमान पर उनका नियंत्रण कायम रहने के कारण सरकार और सशस्त्र बल प्रभाग (AFD) को इस फैसले पर दोबारा विचार करना पड़ा. फिलहाल जनरल वकार-उज-जमान सेना प्रमुख बने हुए हैं.
सेना प्रमुख को हटाने की तैयारी क्यों हुई?
नॉर्थ ईस्ट न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार और सेना प्रमुख के बीच तनाव की कहानी सिर्फ विदेश मंत्रालय में डेपुटेशन के प्रस्ताव से शुरू नहीं हुई थी. इससे पहले सेना में अहम अधिकारियों की नियुक्तियों और तबादलों को लेकर भी मतभेद सामने आए थे. 8 सितंबर को सेना मुख्यालय से जारी आदेशों में ढाका और उसके आसपास तैनात कई महत्वपूर्ण सैन्य इकाइयों के कमांड ढांचे में बदलाव किए गए. सेना से जुड़े सूत्रों का दावा है कि इन बदलावों से जनरल वकार-उज-जमान के ऑपरेशनल फैसले लेने के अधिकार और प्रभाव को सीमित करने की कोशिश हुई.
इनमें 46वीं इंडिपेंडेंट इन्फैंट्री ब्रिगेड के कमांडर की नियुक्ति भी शामिल थी. शुरुआत में ब्रिगेडियर मोहम्मद हुमायूं कबीर को यह जिम्मेदारी दी गई, लेकिन सेना प्रमुख की आपत्ति के बाद 20 सितंबर को आदेश बदलकर ब्रिगेडियर सैयद आशिकुर रहमान को कमांडर नियुक्त किया गया. इसी तरह, मीरपुर स्थित 6वीं इंडिपेंडेंट एयर डिफेंस ब्रिगेड, 33वीं इन्फैंट्री डिवीजन और सेना मुख्यालय की कुछ अहम नियुक्तियों में भी बदलाव हुए.
तारिक रहमान के रक्षा सलाहकार पर भी उठे सवाल
रिपोर्ट में रिटायर्ड ब्रिगेडियर एकेएम शमसुल इस्लाम की भूमिका का भी जिक्र है, जो प्रधानमंत्री तारिक रहमान के रक्षा सलाहकार हैं. सूत्रों का दावा है कि उन्होंने सेना प्रमुख को भरोसे में लिए बिना कुछ नियुक्तियों और तबादलों की प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाई. इस पूरी प्रक्रिया को तारिक रहमान का समर्थन मिला था. हालांकि, रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 8 सितंबर के आधिकारिक आदेशों में शमसुल इस्लाम का नाम नहीं है.
राष्ट्रपति ने रिटायर्ड जनरल से क्यों की मुलाकात?
इस घटनाक्रम के बीच राष्ट्रपति मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने 9 अक्टूबर को ढाका के मोहाखाली इलाके में रिटायर्ड जनरल नूरुद्दीन खान से मुलाकात की. नॉर्थ ईस्ट न्यूज के एक सूत्र के मुताबिक, राष्ट्रपति का मकसद सरकार और सेना प्रमुख के बीच बढ़ती दूरी कम करने के लिए उनकी मदद लेना था. नूरुद्दीन खान को जनरल वकार-उज-जमान का प्रमुख मार्गदर्शक माना जाता है. रिपोर्ट के मुताबिक, सेना प्रमुख पहले भी सार्वजनिक तौर पर कह चुके हैं कि देश में गतिरोध की स्थिति आने पर वह उनसे सलाह लेते हैं. नूरुद्दीन खान की अपनी राजनीतिक और सैन्य पकड़ भी अहम रही है. वह पूर्व राष्ट्रपति हुसैन मुहम्मद इरशाद के सैन्य शासन के अंतिम दौर में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके हैं. सेना से रिटायर होने के बाद वह अवामी लीग में शामिल हुए, सांसद बने और ऊर्जा एवं खनिज संसाधन मंत्री के रूप में भी काम किया.